
विनोद उपाध्याय
सच्ची आजादी, लोकतंत्र में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी तथा सत्ता का सही अर्थो में विकेंद्रीकरण जैसी घोषणाओं के साथ 15 वर्ष पूर्व देश में नए पंचायती राज को बहुत उत्साह और उम्मीद से लागू किया गया था। तब से लेकर अब तक विभिन्न राज्यों में इस घोषणा को कार्यरूप में अमलीजामा पहनाने की कोशिश अपने-अपने तरीके से की जाती रही है। यह कोशिश कितनी ईमानदारी के साथ हुई और यह कितनी सफल या असफल रही इस पर कई तरह के मतभेद हैं। कुल मिलाकर सच यही है कि जिस सोच और सपने के साथ नया पंचायती राज लाया गया है वह सफलता अभी कोसों दूर है। हालांकि इसके कारण भी कम नहीं हैं, लेकिन इसमें एक जो सबसे बड़ा कारण है वह लोगों की उदासीनता है। यह उदासीनता इस अर्थ में नहीं कि पंचायत के चुनाव में लोगों की भागीदारी कम है, बल्कि इस अर्थ में कि पंचायतों के कामकाज में लोगों की कोई खास रुचि नहीं है। यह अरुचि जहां एक ओर पंचायतों में व्याप्त अनियमितताओं का कारण है तो दूसरी ओर पंचायत के प्रति लोगों में स्वामित्व और अपनत्व का जो भाव आना चाहिए था वह अभी तक नहीं आ पाया है।
पंचायती राज के माध्यम से आम लोगों की सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी का प्रयास करते हुए पंचायती व्यवस्था को तीसरी सरकार यानी लोकल सेल्फ गवर्नमेंट का दर्जा दिया गया है और इसके लिए 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से कई महत्वपूर्ण प्रावधान भी किए गए हैं। जैसे दायित्वों के निर्धारण के लिए 11वीं अनुसूची का प्रावधान, स्थानीय निकायों के चुनावों को नियमित एवं व्यवस्थित करने के लिए राज्य चुनाव आयोग का गठन, संसाधनों को निश्चित करने के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन, पंचायत व्यवस्था को पूर्ण संवैधानिक दर्जा दिया गया, जिस कारण राज्यों के लिए यह एक बाध्यकारी प्रावधान बना। तीसरी सरकार को चरितार्थ करने के लिए ग्राम सभा को सांविधानिक मान्यता दी गई। आदर्श रूप में ग्राम सभा का वही स्थान होता है जो केंद्र सरकार में लोकसभा का और राज्यों में विधानसभा का है। भारत में सरकार के तीन मुख्य अंग होते हैं- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। केंद्र में विधायिका लोकसभा, कार्यपालिका केंद्रीय मंत्रिमंडल और न्यायपालिका सुप्रीम कोर्ट है। इसी प्रकार राज्य स्तर पर भी सरकार की एक व्यवस्था है, जिसमें विधानसभा, राज्य मंत्रिमंडल और हाईकोर्ट बनाया गया है।
ग्राम सरकार को तीसरी सरकार का दर्जा दिया गया है, इसे स्थानीय स्वशासन की संज्ञा भी दी गई है। इस स्तर पर विधायिका ग्रामसभा है, कार्यपालिका चुने हुए सदस्यों से बनने वाली ग्राम पंचायत और न्यायपालिका का स्थान ग्राम कचहरी या न्याय पंचायत होती है, लेकिन यहां महत्वपूर्ण अंतर यह है कि ऊपर की दोनों सरकारों के स्तर पर चुनाव में मतदाता लोकसभा अथवा विधानसभा के लिए अपना प्रतिनिधि चुनता है। अर्थात वह इन दोनों ही विधायिका के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से करता है, जबकि तीसरी सरकार के स्तर पर वह विधायिका के सदस्यों का नहीं, बल्कि मंत्रिमंडल यानी ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करता है, क्योंकि वह तो तीसरी सरकार की विधायिका का स्वयंभू स्थाई सदस्य है। जहां वह केंद्र और राज्य सरकार के लिए मतदाता की हैसियत से विधायिका के सदस्यों का अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनाव करता है, वहीं तीसरी सरकार में वह ग्राम विधायिका के सम्मानित सदस्य की हैसियत से कार्यपालिका यानी मंत्रिमंडल का चुनाव करता है। निश्चित रूप से उसकी यह भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण और गौरवशाली होती है, लेकिन क्या गांव के इस आम आदमी को अपनी इस हैसियत और महत्वपूर्ण भूमिका का कहीं से कोई अहसास या समझ होता है? यह एक बड़ा प्रश्न है। इसी प्रश्न को लेकर पंचायत चुनाव में गांव के नागरिकों के बीच में जाने की आवश्यकता है। पंचायत चुनाव के दौरान लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए इस सवाल को केंद्रीय विषय के रूप में लेना होगा। इसी के इर्द-गिर्द लोकतंत्र और विकास में आम आदमी की भूमिका को सही अर्थो में समझना और समझाना होगा। इसे और अधिक गहराई से समझने की आवश्यकता है-सही अर्थो में ग्रामसभा ही वास्तविक पंचायत यानी तीसरी सरकार है।
संस्कृति और संविधान दोनों दृष्टियों से पंचायत भारतीय संस्कृति की एक प्रवाहमान धारा है। शताब्दियों से लोकजीवन में यह स्वीकार्य है और व्यवहार में है। लोकजीवन में पंचायत शब्द का प्रयोग उस बैठक के अर्थ में होता आया है जो किसी बिंदु पर लोगों की परस्पर चर्चा के लिए होती रही है यानी गांव की बैठकी को ही पंचायत कहा जाता रहा है। दूसरे रूप में गांव की बैठक अर्थात गांव की सभा को ही सही अर्थो में पंचायत कहा जाता है। इस तरह संस्कृति और लोकजीवन में गांव की बैठक यानी ग्रामसभा ही पंचायत है। 73वें संविधान संशोधन में पंचायतीराज की जो अवधारणा विकसित हुई उसमें आम आदमी का लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्यक्ष भागीदारी का लक्ष्य केंद्र में रहा। महात्मा गांधी सहित देश के सभी प्रमुख राष्ट्र नायकों ने पंचायती व्यवस्था को सहभागी लोकतंत्र की संज्ञा देते हुए इसे प्रतिनिधित्व लोकतंत्र के विकल्प के रूप में परिभाषित किया है। सहभागी लोकतंत्र चुने हुए सदस्यों के निकाय ग्राम पंचायत से नहीं अभिव्यक्त होता, बल्कि वह तो सामान्य मतदाताओं के समूह ग्रामसभा में होता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से संविधान की दृष्टि में भी ग्रामसभा ही वास्तविक पंचायत है। दुर्भाग्य से यह समझ आज तक लोगों के बीच नहीं फैलाई जा सकी है और साथ ही सरकार के स्तर पर अभी ग्राम सभाओं को उनका यह दर्जा भी पूरी तरह से नहीं दिया गया है। चुने हुए सदस्यों के समूह को ही एकमात्र पंचायत के रूप में चिह्नित किया जा रहा है और दुर्भाग्य तो यह है कि सदस्यों का समूह नहीं, बल्कि केवल सरपंच, प्रधान या मुखिया ही एकमात्र अकेले पंचायत बनकर बैठा हुआ है।
पंचायत चुनाव में मतदाताओं की जागरूकता की बजाय ग्रामसभा सदस्यों की जागरूकता का अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है। चूंकि चुनाव में ग्रामसभा अपनी कार्यकारिणी का चुनाव करने जा रही है इसलिए ग्रामसभा के सदस्यों को ग्रामसभा की सही स्थिति के प्रति सचेत करते हुए गांव के सार्वजनिक हित के दूरगामी लक्ष्य को लेकर सदस्यों के चुनाव के प्रति सजग करना होगा। इस अंतर को देखते हुए निश्चित रूप से ग्रामपंचायत के चुनाव में आम नागरिक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि वह अपनी इस भूमिका को मात्र एक मतदाता के रूप में ही पहचान और समझ पा रहा है तो निश्चित रूप से उसके प्रति वह उतना गंभीर नहीं होगा जितना वास्तव में उसे होना चाहिए। इस रूप में ग्रामसभा के सदस्य की महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति इस मतदाता को जागरूक करना होगा ताकि वह गांव में तीसरी सरकार के लिए एक प्रभावी और सक्षम मंत्रिमंडल गठित कर सके और साथ ही इस मंत्रिमंडल पर निरंतर अपनी पकड़ बनाए रख सके। यहां उसकी भूमिका इतने भर से समाप्त नहीं होती, बल्कि इससे भी दो कदम और आगे बढ़कर उसे आगामी कार्यपालिका के मंत्रिमंडल को अगले पांच वर्ष के लिए एक लोक एजेंडा भी सौंपना होगा। इसके लिए पंचायत सदस्यों के चुनाव से पूर्व जनभागीदारी से ग्रामसभा बैठक बुलाकर एक ऐसा लोक घोषणापत्र तैयार करना होगा, जिसमें मनुष्य और प्रकृति दोनों ही संसाधनों के विकास के विषय तय किए जाएं। शिक्षा, स्वास्थ्य और सदभावना जैसे मुद्दे यदि मानव विकास के लिए हों तो जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों के मुद्दे भी शामिल किए जाएं। यह लोक घोषणापत्र स्थानीय आवश्यकता और संसाधनों की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाना चाहिए। इसी लोक घोषणापत्र को आधार बनाकर तीसरी सरकार के मंत्रिमंडल यानी ग्राम पंचायत के लिए सुयोग्य, तटस्थ एवं सक्षम सदस्यों को चुनने में जनता को मदद मिलेगी। ग्रामसभाओं को इस घोषणापत्र के आधार पर प्रत्याशियों के बीच उनकी समझ और प्रतिबद्धता का मापन करने के लिए सार्वजनिक चर्चा का भी कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए, ताकि सही सदस्यों के चुनाव में सुविधा हो। यहां पर एक और महत्वपूर्ण संदर्भ को रेखांकित करना आवश्यक होगा। यह है लोक उम्मीदवार का। लोक उम्मीदवार यानी एक ऐसा प्रत्याशी जो सामान्य जनता या आम मतदाताओं की परस्पर सहमति के आधार पर तय किया गया हो। निश्चित रूप से आज की तारीख में यह सबसे कठिन कार्य है। बहुमत पर आधारित संसदीय चुनाव व्यवस्था के समर्थक और अभ्यस्त लोगों के लिए यह एक अव्यावहारिक स्थिति है, लेकिन भारत का गांव समाज जो शताब्दियों से परस्पर सहमति और सहयोग के संस्कार का अभ्यस्त है, उसके लिए यह कठिन नहीं कहा जा सकता।
विशेषकर पंचायत चुनाव के संदर्भ में जो उसके प्रत्यक्ष संबंधों की ही परिधि में सिमटा होता है। यहां जयप्रकाश नारायण का यह कथन प्रासंगिक होगा, जो उन्होंने पंडित नेहरु द्वारा पंचायतीराज लागू किए जाते समय 1962 में कहा था कि जाति और धर्म में बंटे हुए गांवों में यदि बहुमत के आधार पर पंचायत चुनाव हुए तो इन गांवों को नष्ट होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। उन्होंने लोगों से अपील भी किया कि वे सर्वसहमति से पंचायतों में चुनाव संपन्न करें। यह एक अच्छी बात है कि वर्तमान समय में लगभग सभी राज्य सरकारें इसे प्रोत्साहित कर रही हैं। जिन गांवों में सर्वसहमति से पंचायत चुनाव होते हैं, उन्हें विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जा रहा है। भले ही ऐसी पंचायतों की संख्या बहुत कम है, लेकिन इससे इस दिशा में संभावनाओं का द्वार तो खुला ही है।
यह कहना गलत न होगा कि ग्राम पंचायतें हमारे लोकतंत्र का मूल आधार हैं। आज जबकि राजनीतिक मूल्यों और परंपराओं में तेजी से गिरावट आ रही है तो ऐसे में यह संस्था राजनीति की दिशा बदलने और उसे जनसरोकारों से जोडऩे में अहम भूमिका निभा सकती है। पंचायत चुनाव आज की राजनीतिक गंदगी का शिकार न होने पाएं इसके लिए जरूरी है कि समाजसेवी कार्यकर्ताओं के माध्यम से इन चुनावों के महत्व के बारे में जनजागरूकता लाई जाए। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि पंचायत चुनावों को भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तर्ज पर दलगत आधार पर संपन्न कराया जाता है तो इससे हमारी सामाजिक संरचना के साथ-साथ लोकतांत्रिक संरचना पर भी गंभीर असर पड़ेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज ग्रामपंचायत चुनावों में भी धीरे-धीरे धर्म, जाति जैसे मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों की तरह इस्तेमाल किए जाने लगे हैं। गांवों के विकास के लिए सरकार द्वारा काफी धन दिया जा रहा है, जिसे देखते हुए अब गांवों में बाह्य हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। इसका प्रभाव पंचायत चुनावों के दौरान भी देखने को मिलता है, जब बाहुबल और धनबल के माध्यम से यहां चुनाव का प्रबंधन किया जाता है।
आज यह आवश्यक हो चुका है कि संविधान में यह प्रावधान किया जाए कि ग्राम स्तर पर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप न हो। यदि ऐसा होता है तो इसके लिए इन्हें दंडित किया जाए। हालांकि लोकतंत्र में सभी को प्रचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह प्रवृत्ति घातक साबित हो सकती है। इसलिए तात्कालिक दृष्टि से चुनाव ढ़ांचे में गुणात्मक बदलाव की दिशा में पहल की जा सकती है। हालांकि यह देखने में आया है कि ज्यादातर राज्य सरकारों ने ग्राम स्तर के चुनावों को प्रभावित करने से खुद को अलग ही रखा है, लेकिन आने वाले समय में भी यह बना रहे इसके लिए संवैधानिक नियम बनाने जरूरी होंगे। जनजागरुकता लाकर सर्वसहमति द्वारा उम्मीदवारों का चयन हो और इसे राजनीतिक दंगल का रूप न दिया जाए।
मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों और ग्राम पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करके राज्य सरकार महिला सशक्तिकरण का दम भर रही है, लेकिन अब तक के अनुभव बताते हैं कि जन प्रतिनिधि बनने और शहरों एवं गांव की सत्ता संचालन करने के बाद भी महिलाओं को मारपीट, प्रताडऩा, अपमान और अत्याचार से मुक्ति नहीं मिली है. पुरुषों के वर्चस्व वाले हमारे समाज की मानसिकता में कोई सुधार नहीं आया है.
2007-08 में एक ग़ैर सरकारी सामाजिक संगठन ने गहन सर्वेक्षण और अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि छह महीनों के दौरान राज्य में लगभग एक हज़ार महिला पंचायत प्रतिनिधियों के साथ मारपीट, प्रताडऩा और अपमान के मामले सामने आए! लेकिन इससे कहीं अधिक संख्या में वे महिला जनप्रतिनिधि हैं, जो अपना अपमान उजागर नहीं होने देतीं. महिला सरपंचों को उनके अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है. स्वतंत्रता दिवस-गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर उन्हें झंडारोहण तक नहीं करने दिया जाता.
पिछले दिनों शिवपुरी जि़ले में एक आदिवासी महिला सरपंच के साथ सरेआम मारपीट कर उसे अपमानित किया गया. सरपंच का अपराध यह था कि उसने दबंगों का कहना मानने से इंकार कर दिया था. शिवपुरी जि़ले के सतनापाड़ा कला गांव की सरपंच तुलसीबाई ने आदिवासी होकर गांव के तथाकथित बड़े लोगों के सामने मुंह खोलने की हिम्मत की थी. सरपंच की पिटाई ग्राम पंचायत के पंचों ने की. तुलसीबाई बताती है कि दो पंच अपने चार अन्य साथियों के साथ उसके घर आए और पांच हज़ार रुपये एवं एक बोरी गेहूं की मांग करने लगे. इंकार करने पर उसे घसीटते हुए घर से बाहर लाया गया और सरेआम उसकी पिटाई की गई. सभी हमलावर ठाकुर जाति के हैं, जिनका उस गांव में खासा दबदबा है. तुलसीबाई ने थाने में घटना की रिपोर्ट लिखवा दी है, लेकिन अब वह इतनी डर गई है कि सरपंची छोडऩे का विचार कर रही है.
2007-08 में एक ग़ैर सरकारी सामाजिक संगठन ने गहन सर्वेक्षण और अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि छह महीनों के दौरान राज्य में लगभग एक हज़ार महिला पंचायत प्रतिनिधियों के साथ मारपीट, प्रताडऩा और अपमान के मामले सामने आए! यह पहला मामला नहीं है, जब किसी महिला सरपंच के साथ इस तरह की घटना हुई है, बल्कि प्रदेश में लगभग हर दिन कोई न कोई महिला पंच या सरपंच पुरुष प्रधान समाज की प्रताडऩा का शिकार बनती है. सागर जि़ले के केरनवा ग्राम पंचायत की सरपंच संतोष रानी तो आज भी उस दिन को कोसती है, जब उसने घर-परिवार विशेष रूप से श्वसुर के दबाव में आकर सरपंच का चुनाव लडऩे का फैसला किया था. गांव के दबंगों को उसका सरपंच बनना कभी भी रास नहीं आया.
लिहाज़ा चुनाव के दौरान यहां हिंसा से निपटने के लिए पुलिस की देखरेख में मतदान हुए. यही नहीं, चुनावी रंजिश के चलते गांव में हुई एक हत्या के लिए उसके पति को गिरफ़्तार कर लिया गया. अब संतोष रानी पति के बरी होने की आस लगाए बैठी है. वह केवल नाममात्र की सरपंच है. दबंगों के खौफ़ से संतोष रानी गांव के बाहर खेत में बने मकान में रहती है.सिवनी जि़ले की डुगरिया गांव की स्नातक सरपंच सईजा इईके को भी आएदिन गांव के बड़े लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है. दबंग उसे सरपंच मानने से इंकार करते हैं. यहीं नहीं, सरेआम शराब पीकर गाली-गलौच, अपशब्दों का प्रयोग करना वे अपना अधिकार समझते हैं. अधिकारियों से शिकायत करने पर भी कोई कार्रवाई नहीं होती है. आष्टा की एक अन्य महिला सरपंच को अपने बेटे की बारात निकालने से इसलिए वंचित रहना पड़ा, क्योंकि वह दलित थी. छतरपुर जि़ले के महोईकला गांव में तो अराजकता की सारी हदें पार करते हुए महिला सरपंच इंदिरा कुशवाह के साथ पहले तो कुछ लोगों ने जमकर मारपीट की और फिर उसे निर्वस्त्र करके गांव भर में घुमाया गया. गांव में दो गुटों के बीच वर्षों से चली आ रही रंजिश का खामियाज़ा पिछड़े वर्ग की इस महिला सरपंच को भुगतना पड़ा.यहां बात सर्फ़ि किसी महिला की प्रताडऩा, अपमान अथवा तिरस्कार की नहीं है. विचारणीय तथ्य यह है कि महिला सरपंच किसी पंचायत का प्रतिनिधित्व करती है, जो लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है. किसी सरपंच का अपमान गांधी जी के उस सपने का अपमान है, जो उन्होंने पंचायती राज के ज़रिए देखा था.
पंचायतों के जरिए गंावों के हालात बदलने का सपना महात्मा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक ने देखा था और अब मनमोहन सिंह एवं राहुल गांधी भी देख रहे हैं, लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के चुनावों के लिए जो मारामारी और हिंसा हो रही है, उसने पंचायती राज के उद्देश्यों पर पानी फेर दिया है। ग्राम प्रधानी और पंचायत सदस्यों का चुनाव जीतने के लिए कई दावेदारों के बीच जंग छिड़ी हुई है। इन चुनावों से गांवों में दलबंदी, गुटबंदी और वैमनस्य का वातावरण पैदा हो गया है। हिंसा और गुटबंदी की बुनियाद पर हुए ग्राम पंचायतों के चुनाव से गांवों की दशा और दिशा के सुधार की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है। केंद्र सरकार ने गांवों के विकास के लिए भारत निर्माण के नाम से एक विशाल योजना भी लागू की है। सिंचाई, सड़क, आवास निर्माण, विद्युतीकरण और दूरसंचार के जरिए ग्रामीण आधारभूत संरचना खड़ी करने के लिए यह एक महत्वाकांक्षी योजना है। सरकार ने अब तक इस पर 1740 अरब रुपये खर्च खर्च किए हैं। यूपीए सरकार पंचायतों के जरिए महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना पर भारी धनराशि खर्च कर रही है। केंद्र एवं राज्य सरकारें हर साल गांवों और ग्रामीणों के विकास के नाम पर अरबों रुपये भी खर्च करती हैं, लेकिन खेत खलिहान और मजदूर की दशा जस की तस है। अब सवाल इस बात का है कि आखिर यह धन जाता कहां है। इस सवाल का ईमानदारी से जवाब राजीव गांधी ने तब दिया था, जब वह राजनीति में नए-नए थे। उन्होंने माना था कि सरकार से मिले धन का एक चौथाई से भी कम हिस्सा योजनाओं में लग पाता है, शेष दलालों की जेब में चला जाता है। जब जमीनी हकीकत ऐसी भयावह हो तब विकास और खुशहाली की कल्पना कैसे की जा सकती है?
किसान और गांव हमारे नेताओं का प्रिय शगल है। आजादी के बाद हर सरकार और प्रत्येक प्रधानमंत्री ने ग्रामीण विकास के लिए कोई न कोई योजना शुरू की। आज स्थिति यह है कि योजनाओं की भरमार से भ्रम की स्थिति बनी हुई है। एक ही उद्देश्य को लेकर कई-कई योजनाएं हैं और उनके बीच तारतम्य का अभाव है। इन योजनाओं का नियंत्रण अलग-अलग मंत्रालयों और प्रशासकीय इकाइयों के अधीन होने से पैसे का उपयोग कम, दुरुपयोग अधिक होता है। पेंचदार नियम-कायदों में उलझी इन योजनाओं का दुहने का रहस्य केवल बिचौलिए और भ्रष्ट अफसर ही जानते हैं। जिस गरीब जनता के लिए इन्हें तैयार किया जाता है, बहुधा उसे इनकी भनक तक नहीं लग पाती। राजीव गांधी ने इस मकडज़ाल को काटने के लिए पंचायती राज कानून बनाया, लेकिन वह भी अफसरशाही अनुभवहीनता, तकनीकी जानकारी की कमी और अधिकारों के अभाव में प्रभावी नहीं बन पाया। जब से सरकार ने ग्राम पंचायतों को विकास के लिए धन देने की व्यवस्था की है, ग्राम पंचायतों में जातिवाद व दलबंदी और अधिक बढ़ गई है। ग्राम पंचायत की योजनाओं से गांवों का तो कोई खास भला नहीं हुआ, लेकिन प्रधान से लेकर ब्लॉक के अधिकारी तक मालामाल हो गए। साइकिल पर चलने वाले ग्राम प्रधान और ब्लॉक प्रमुख देखते ही देखते मोटर साइकिल और शानदार जीपों पर चलने लगे। जाहिर है कि जो धनराशि योजनाओं पर खर्च होनी चाहिए, उसका बड़ा हिस्सा ग्राम प्रधान, ब्लॉक के अधिकारी, बैंक के मैनेजर और ठेकेदार किस्म के दलालों के हाथ में चला गया। गांव का गरीब तो देखता ही रह गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि इस देश की ग्राम सभा एवं ग्राम समाज व्यवस्था पूरी तरह से विफल हो चुकी है। संस्थाएं भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी हैं। ऐसी स्थिति में इस व्यवस्था को नीचे से ऊपर तक पुनरीक्षित किए जाने की जरूरत है।
न्यायालय ने भारत सरकार और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वह ग्राम सभा एवं ग्राम समाज की वर्तमान व्यवस्था को तत्काल पुनरीक्षित करें। आम लोगों को अक्सर यह कहते सुना जाता है कि पंचायती राज कानून तो लागू हुआ, लेकिन वह उनके पास नहीं पहुंचा है। उनकी शिकायत है कि अंग्रेजी राज्य के समय में जिस ढंग से और जिस प्रकार के लोगों का शासन उन पर चलता था, वैसा ही अब भी चल रहा है। वे पाते हैं कि स्थानीय शासन कार्यो में उनका कोई हाथ नहीं है और छोटा से छोटा राजकर्मचारी भी उनके प्रति किसी रूप से उत्तरदायी नहीं है। उल्टे वही उन पर धौंस जमाता है और पहले की ही तरह उनसे रिश्वत वसूलता है। इस सच्चाई का सामना करना होगा कि जनता को स्वराज्य-भावना की अनुभूति नहीं हो पाई है।
हमारे लोकतांत्रिक कार्यकलाप में केवल थोड़े से शिक्षित मध्यम वर्ग के लोग संलग्न हैं, और उनमें भी वही हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक कार्यो में लगे हुए हैं। इस परिस्थिति के परिणामस्वरूप हम पाते हैं कि हमारा लोकतंत्र एक बहुत ही संकीर्ण आधार पर टिका हुआ है। पंचायती राज में सत्ता एवं प्रशासन के तीन स्तर हैं- ग्राम पंचायत, प्रखंड पंचायत समिति और जिला परिषद। इनमें से प्रत्येक स्तर पर जनता की शक्ति की मर्यादा के अंदर उसे दायित्व उठाने का अवसर दिया जाना चाहिए। ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत जिला दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) एवं समाहर्ता (कलेक्टर) मुख्य अधिकारी होते थे। उनकी स्थिति आज भी वैसी ही है, लेकिन पंचायती राज में यदि सत्ता का वास्तविक वितरण होता है तो जिला दंडाधिकारी का अंतत: लोप हो जाना चाहिए या उसको राज्य सरकार के प्रतिनिधि मात्र के रूप में रखना चाहिए, जैसा कि राज्यों में राज्यपाल केंद्रीय सरकार के प्रतिनिधि मात्र होते हैं। पंचायती राज, राजस्थान में भी जहां उसकी शुरुआत हुई, इस उद्देश्य से बहुत दूर है। पंचायती राज के जन्म के पहले भी ग्राम पंचायतें थीं, लेकिन वे उस समय ग्रामीण लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करती थीं, बल्कि राज्य सरकारों या उससे भी बदतर स्थानीय अधिकारियों के एजेंट के रूप में काम करती थीं। अगर पंचायती राज के अंतर्गत भी ग्राम पंचायतें, सुसंगत रूप से ग्रामीण समुदाय की शक्ति, सत्ता और पोषण प्राप्त नहीं करती हैं तो वे पहले की तरह राज्य सरकार व उसके अधिकारियों द्वारा ग्रामीण जनता को नियंत्रित व प्रभावित करने का औजार बनी रहेंगी। ऐसी बुनियाद पर खड़ा पंचायती राज नीचे से ऊपर उठने वाले लोकतंत्र का ढांचा नहीं है, बल्कि ऊपर से संचालित नौकरशाही शासन-पद्धति का विस्तार ही कहा जाएगा। गांधी जी ने जिस पंचायती राज की कल्पना की थी, उसमें ग्राम पंचायतों के लिए अपनी जरूरत का तमाम अनाज, कपड़े के लिए कपास खुद पैदा करने की योजना बनाई गई थी। पंचायतों को धन देकर भ्रष्ट बनाने की बात कहीं नहीं कही गई है।
गांधी जी चाहते थे कि हर गांव को अपने पांव पर खड़ा होना होगा और अपनी जरूरतें खुद पूरी करनी होंगी ताकि वह अपना सारा कारोबार खुद चला सकें। आवश्यकता इस बात की है कि हम उपलब्ध संसाधनों का उपयोग अपनी देश की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार करें। फिलहाल केंद्र सरकार पंचायतों को ताकतवर बनाने के लिए जिस कार्य योजना पर काम कर रही है, उसके तहत यह तय हुआ है कि हर राज्य जिला योजना कमेटियां गठित करेगा, जो योजना और बजट निर्माण में राज्य और निचली पंचायतों के बीच पुल का काम करेंगी। लेकिन अभी इसकी कार्यप्रणाली स्पष्ट नहीं है। इस सिलसिले में यह याद दिलाने की जरूरत है कि पंचायती राज का पूरा ढांचा तब तक बेमतलब है, जब तक कि हर स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही तय नहीं होती। इसलिए सूचना का अधिकार अपने पूरे अर्थ में लागू करना होगा और साथ में सूचना को प्रशासनिक एवं आंकड़ों की लफ्फाजी से आजाद कर इतना सहज बनाना होगा कि हर कोई उसे समझ ले। असल में किसी अधिकार और कानून को सही तरह से लागू करने में ही उसका इम्तिहान होता है। हमारी पंचायतें भी उतनी ही निकम्मी, भ्रष्ट और अन्यायकारी हो सकती हैं, जितनी कि कोई और संस्था। इसलिए बाबूशाही से बचते हुए, कायदे-कानूनों के छेद भरते हुए, मनमर्जी फैसलों की गुंजाइश खत्म करते हुए और व्यावसायिक तरीकों के लिए जगह बनाते हुए पंचायती राज व्यवस्था को नए सिरे से गढऩा होगा। तभी वह नए भारत की तकदीर लिख सकेगा।
आजादी के बाद देश में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए ढेर सारे प्रयास किए गए और इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। इन्हीं प्रयासों की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत में पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना भी रही है। हालांकि भारत के ऐतिहासिक संदर्भ को खंगालने से स्पष्ट हो जाता है कि पंचायतीराज व्यवस्था भारत के लिए कोई नई बात नहीं है। वैदिक कालीन समाज के ऐतिहासिक संदर्भो से तमाम ऐसी जानकारियां प्राप्त होती हैं, जिससे साबित हो जाता है कि उस दौर में भी स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था विद्यमान थी। दक्षिण भारत के चोलकालीन प्रशासन का तो आधार ही स्थानीय स्वशासन पर टिका था। पंचायती राज व्यवस्था को लोकतांत्रिक स्वरूप देने का काम आजादी के बाद ही शुरू हुआ।
आजादी के बाद 2 अक्टूबर, 1952 को जब सामुदायिक विकास कायक्रम प्रारंभ किया गया तो सरकार की मंशा यही थी कि गांधीजी की पंचायती राज की संकल्पना को जरूर पंख लगे। इस कार्यक्रम के अधीन ही खंड को इकाई मानकर खंड के विकास हेतु सरकारी मुलाजिमों के साथ सामान्य जनता को विकास की प्रक्त्रिया से जोडऩे का प्रयास किया गया, लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि जनता को वास्तविक अधिकार न दिए जाने के कारण यह कार्यक्रम सफेद हाथी ही सिद्ध हुआ। सामुदायिक कार्यक्रम की असफलता के बाद पंचायती राज व्यवस्था को परवान चढ़ाने के लिए 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में ग्रामोद्धार समिति का गठन किया गया। इस समिति ने भारत में त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की। इसी समिति ने पंचायती राज को सशक्त बनाने के लिए गांवों के समूहों के लिए प्रत्यक्षत: निर्वाचित पंचायतों, खंड स्तर पर निर्वाचित तथा नामित सदस्यों वाली पंचायत समितियों तथा जिला स्तर पर जिला परिषद गठित करने का सुझाव दिया।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश को 1 अप्रैल, 1958 को लागू किया गया। राजस्थान राज्य की विधानसभा ने इसी समिति के सुझाव के आधार पर 2 सितंबर, 1959 को पंचायती राज अधिनियम की संस्तुति कर दी। 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था को सबसे पहले लागू किया गया। इसके बाद पंचायती राज व्यवस्था को अन्य राज्यों ने भी अपने यहां लागू करना शुरू कर दिया।
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