देश समेत दुनियाँ के जाने-माने उद्योगपतियों की मौजूदगी ने खजुराहो निवेशकों के सम्मेलन में मध्यप्रदेश में नई सुबह लाने का सच्चा पैगाम दे दिया। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-2 के कुल निवेश के करारनामों की तादाद 107 और रकम की मात्रा दो लाख 35 हजार 966 करोड़ रूपये हो गई। आज विविध उद्योगों के 57 करारनामों में 39 हजार 115 करोड़ रूपये, ऊर्जा के 15 करारनामों में 76 हजार 80 करोड़ रूपये, खाद्य प्रसंस्करण के सात करारनामों में 534 करोड़ रूपये, स्वास्थ्य के दो करारनामों में 400 करोड़ रूपये और नवीनीकृत ऊर्जा के चार करारनामों में एक हजार 200 करोड़ रूपये लगाए जाने की रजामंदी हो गई। सरकार और उसके कारिंदों ने इस इरादे का खुलासा भी अच्छे से कर दिया कि करारनामों की तकरीबन रोज़ाना ही मानीटरिंग की जाएगी ताकि उद्योगों की तयशुदा वक्त में स्थापना हो जाए और प्रदेश तथा यहाँ के लोगों को वास्तविकता की अनुभूति जल्द से जल्द हो जाए। लेकिन ठीक इसके उलट अनिल धीरू भाई अंबानी समूह (एडीजी) के चेयरमैन अनिल अंबानी खजुराहो निवेश सम्मेलन में शिव और उनके राज को मूर्ख बनाकर चले गए।
जिस तरह भाजपा ने कुछ साल पहले देश के आम चुनाव में शाइनिंग इंडिया व फीलगुड का फर्जी नारा देकर चुनाव हारा था उसी तर्ज पर अब प्रदेश में शाइनिंग एमपी के आकर्षक बोर्ड टांगे जा रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की प्रदेश व इन्दौर को अव्वल बनाने की नेकनीयती में तो कोई शक-शुभा नहीं है मगर मैदानी हकीकत इन तमाम दावों के ठीक उलट नजर आती है। खजुराहो समिट के बड़े भारी निवेश में सवा 2 लाख करोड़ से अधिक के 107 एमओयू यानी करार निवेशकों के साथ किए जाने के साथ मुख्यमंत्री के साथ अनिल अंबानी ने प्रदेश में 75 हजार करोड़ निवेश करने का दावा करते हुए हर घंटे ढाई करोड़ के निवेश का जो आंकड़ा परोसकर जबर्दस्त मीडिया में सुर्खियां बटोरी उसकी असली हकीकत यह है कि अनिल अंबानी ने खजुराहो में कोई नया करार किया ही नहीं, बल्कि इन्दौर में 2007 में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में जो पचास हजार करोड़ का करार किया था, उसी को बढ़ाकर 75 हजार करोड़ का कर दिया। इतना ही नहीं 25 साल तक अनिल अंबानी से प्रदेश सरकार 20 से 25 पैसे प्रति मिनट महंगी बिजली खरीदेगी जिससे अंबानी 10 से 15 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त कमाएंगे। प्रदेश शासन के वित्त विभाग ने इस लूट पर आपत्ति दर्ज कराई थी मगर पिछले दिनों कैबिनेट ने इसे मंजूरी दे दी।
बड़े लोगों के बड़े खेल... यह बात रिलायंस पर सबसे सटीक साबित होती है। प्रदेश का कोई छोटा-मोटा बिल्डर या कालोनाइजर अगर कुछ फायदा उठा लेता है तो अखबारों की सुर्खियां बन जाती हैं, लेकिन दूसरी तरफ बड़े निवेशक हजारों करोड़ रुपये का गोलमाल कर लेते हैं, लेकिन इसे शहर और प्रदेश की तरक्की से जोड़कर प्रचारित किया जाता है। अभी खजुराहो में जितने भी करार हुए, वे सब प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट यानी माइनिंग से जुड़े हुए हैं। इस पूरी समिट में सबसे बड़ी खबर अनिल अंबानी की मौजूदगी ने बनाई, जिसमें 75 हजार करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश के दावे किए गए, जिसकी असलियत यह है कि इन्दौर में 26 व 27 अक्टूबर 2007 को खजुराहो की तर्ज पर ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट आयोजित की गई थी और उसमें अनिल अंबानी ने 50 हजार करोड़ रुपये का एमओयू साइन किया था, जिसमें शासन के 3960 मेगावाट अल्ट्रा पावर प्रोजेक्ट के अलावा चितरंगी तहसील सीधी जिले के एक अन्य मेगा थर्मल पावर स्टेशन के साथ चार बड़े सीमेंट के संयंत्र लगाने, जिनकी क्षमता 5 मिलियन टन हर साल होगी, वहीं सीधी जिले में एयरपोर्ट व एयर स्ट्रीप के विकास के साथ ही भोपाल में एक तकनीकी इंस्टिट््यूशन खोला जाना था। जिसके लिए खजुराहो समिट के दो दिन पूर्व प्रदेश शासन अनिल अंबानी की संस्था को भोपाल एयरपोर्ट के पास 110 एकड़ जमीन धीरूभाई अंबानी कॉलेज के लिए आवंटित कर चुका है। वहीं समिट में 75 हजार करोड़ रुपये के जिस निवेश का दावा किया गया, उसमेंं कोई नया करार नहीं हुआ, बल्कि लगने वाले सीमेंट प्लांटों की क्षमता को दोगुना करने और आठ हजार मेगावाट के बिजली संयंत्रों के पुराने करारों की क्षमता बढ़ाकर उसे 12 हजार मेगावाट से अधिक करने का निर्णय लिया गया है। मगर प्रचारित इस तरह हुआ मानो अनिल अंबानी ने 75 हजार करोड़ रुपये का कोई नया करार सरकार से किया हो।
इस पूरे मामले की एक और बड़ी हकीकत यह है कि आने वाले 25 सालों तक प्रदेश सरकार की एमपी पावर ट्रेडिंग कंपनी जो बिजली रिलायंस से खरीदेगी, वह काफी महंगी होगी। अभी 5 अक्टूबर को शिवराज कैबिनेट ने दो कंपनियों रिलायंस पावर और एस्सार पावर से बिजली खरीदने का 25 सालों का करार किया है। अनिल अंबानी के रिलायंस पावर से पहले 2 रुपये 70 पैसे और एस्सार से 2 रुपये 95 पैसे प्रति यूनिट की दर तय की गई थी। मगर बाद में निगोसिएशन के पश्चात 2 रुपये 45 पैसे प्रति यूनिट की दर फायनल की गई। इतना ही नहीं रिलायंस ने सीधी जिले के सासन अल्ट्रा पावरमेगा प्रोजेक्ट के लिए आवंटित कोलब्लाक से अपने अन्य चितरंगी पावर प्रोजेक्ट के लिए भी कोयला प्राप्त करने की मंजूरी पहले केन्द्र शासन से और फिर राज्य से प्राप्त कर ली। इसी आधार पर प्रदेश के वित्त विभाग ने यह तर्क दिया कि चूंकि रिलायंस पावर को बाहर से कोयला नहीं खरीदना पड़ेगा और वह प्रदेश से ही कोयला लेकर बिजली बनाएगा, लिहाजा परिवहन के साथ अन्य खर्चों में कमी होगी। इसलिए जनता को दी जाने वाली बिजली की दर 20 से 25 पैसे प्रति यूनिट तक और कम होना चाहिए। यह भी उल्लेखनीय है कि मात्र 1 पैसे प्रति यूनिट की अगर कमी की जाती है तो 25 सालों में लगभग 700 करोड़ रुपये की बचत एमपी पावर ट्रेंिडंग कंपनी को होती। इस लिहाज से 20 से 25 पैसे प्रति यूनिट बिजली रिलायंस पावर और एस्सार पावर से खरीदने के निर्णय से 10 से 15 हजार करोड़ रुपये का फायदा इन निजी कंपनियों को पहुंचाया गया। वित्त विभाग ने अपनी आपत्ति में रिलायंस पावर को जमीन देने के अलावा अन्य सुविधाओं का उल्लेख करते हुए प्रति यूनिट बिजली की दरों में कमी लाने का सुझाव दिया था, लेकिन अनिल अंबानी की तगड़ी ऊपरी पकड़ के चलते वित्त विभाग की इन आपत्तियों को दरकिनार करते हुए पिछले दिनों शिवराज कैबिनेट ने 25 सालों तक बिजली खरीदी का निर्णय ले लिया। अभी मध्यप्रदेश की जनता वैसे ही महंगी बिजली से हलाकान है और आने वाले दिनों में बिजली तो भरपूर निजी संयंत्रों के कारण मिलेगी, लेकिन उसके दाम इतने अधिक होंगे कि आम आदमी को दिन में ही तारे नजर आने लगेंगे।
अभी तक रिलायंस पावर के तीन साल पूर्व किए गए प्रोजेक्ट के लिए जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी है। दरअसल शासन को रिलायंस पावर को 3879 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित कर उपलब्ध कराना है, जिसमें 1179 हेक्टेयर जमीन निजी, 445 हेक्टेयर सरकारी और 2255 हेक्टेयर जमीन वन भूमि है। लिहाजा इस अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट के बदले 10 लाख से अधिक पेड़ों को काटना भी पड़ेगा। वहीं सैकड़ों परिवारों को विस्थापित किया जाना है। हालांकि वन भूमि का मामला उच्चस्तरीय है और इसके लिए केन्द्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति भी लगेगी। उल्लेखनीय है कि अभी हजारों करोड़ रुपये के वेदांता ग्रुप को पर्यावरण विभाग ने किसी कारण अनुमति नहीं दी।
खजुराहो समिट में 75 हजार करोड़ रुपये के निवेश का दावा अनिल अंबानी द्वारा किया गया। हालांकि इस संबंध में कोई करार नहीं हुआ, क्योंकि तीन साल पहले ही इन्दौर में अनिल अंबानी खुद पचास हजार करोड़ रुपये का करार कर चुके हैं। इस 12 पेजी करार 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर किए गए है। 26 अक्टूबर 2007 को तत्कालीन वाणिज्यिक व उद्योग तथा रोजगार विभाग के प्रमुख सचिव अवनी वैश्य जो कि वर्तमान में प्रदेश शासन के मुख्य सचिव हैं, ने खुद रिलायंस पावर लिमिटेड के साथ उक्त करार किया था और अनिल अंबानी की ओर से डायरेक्टर बिजनेस डेवलपमेंट जेपी चालासानी ने इस करार पर हस्ताक्षर किए। इस करार में सीधी के सासन और चितरंगी के दोनों पावर प्लांटों के अलावा चार सीमेंट फैक्ट्रियों को खोलने, भोपाल में तकनीकी इंस्टिट््यूशन जिसकी जमीन अभी खजुराहो समिट के दो दिन पूर्व भोपाल एयरपोर्ट के पास आवंटित की गई। 26 अक्टूबर 2007 को किए गए इस इन्दौरी करार के वक्त भी खजुराहो की तरह अनिल अंबानी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के साथ मौजूद थे, जिसका उल्लेख भी उक्त करार में किया गया है।
मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार अभी तक 9 निवेश सम्मेलन आयोजित कर चुकी है। खजुराहो समिट में दो लाख 36 हजार करोड़ के 107 करार करना बताए, जिसमें इन्दौर का क्रिस्टल आईटी पार्क भी शामिल है, जिसमें साफ्टवेयर टेक्नोलाजी आफ इंडिया को दिया गया, जिसका सबसे पहले खुलासा अभी पिछले दिनों अग्रिबाण ने ही किया था। खुजराहो समिट के पूर्व जो 8 निवेश सम्मेलन हुए, उनमें कुल मिलाकर पौने पांच लाख करोड़ रुपये के एमओयू यानी करार किए गए और वास्तविक धरातल पर मात्र 58 हजार करोड़ रुपये का निवेश ही हो पाया है। यहां तक कि इन्दौरी ग्लोबल मीट में 102 करार सवा लाख करोड़ रुपए के किए गए थे और इनमें से मात्र 13 हजार करोड़ का निवेश हुआ है। चूंकि ज्यादादर एमओयू रियल स्टेट यानी होशियार जमीनी कारोबारियों ने कर लिए, जिनकी पोलपट्टïी भी उजागर की गई और ये सारे करार अंतत: कागजी ही साबित हुए। हालांकि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान लगातार प्रयासरत हैं अधिक से अधिक निवेश जुटाने में, लेकिन मैदानी हकीकत इसके विपरीत ही नजर आती है।
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
जिंदगी भर का जख्म देते रिश्ते
देश का हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश हो या फिर केरल, गोवा, उत्तर-पूर्वी सीमांत राज्य हों या अन्य राज्य अथवा देश की राजधानी दिल्ली, मासूम अबोध बच्चियों से लेकर, युवती या प्रौढ़ा कोई भी सुरक्षित नजर नहीं आ रही हैं। बलात्कार की बढ़ती वारदातों के पीछे कोई और नहीं है, बल्कि वह लोग हैं जिन्हें प्यार से अपना कहा जाता है और जो मौका मिलते ही खून के रिश्तों तक को कलंकित करने से नहीं चूकते। जब पिता बेटी से मुंह काला करने में हिचक महसूस नहीं करता तो सौतेले पिता की बात ही क्या? दामन को दागदार करने में पिता, बच्चों के प्यारे अंकल, मामाजी, ससुर, दोस्त, प्रेमी, शिक्षक और सबसे ज्यादा पड़ोसी पाए जा रहे हैं। ऐसे में बच्चियां और महिलाएं कैसे सुरक्षित रह सकती हैं? फिर जब चारदीवारी और अपने प्रियजनों के घर में ही मौजूद आपका रक्षक भक्षक बन जाए और ईंट-पत्थरों से बना घर पिंजरा, ऑफिस के सहकर्मी जिनके साथ अपना सुख-दुख बांटने की उम्मीद बांधे, से सदैव अप्रिय आचरण की आशंका रहे या उनसे हरपल सतर्क रहना पड़े तो इससे बड़ी राष्ट्रीय समस्या और चिंता क्या हो सकती है। देश में बीते सालों में हुए बलात्कारों में अधिकांश में पड़ोसी ही संलिप्त पाए गए हैं। आंकड़े गवाह हैं कि 98.28 फीसदी बलात्कार की शिकार महिलाएं आरोपियों से पूर्व परिचित थीं। इनमें अधिकांश पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार, मकान मालिक, किराएदार या शिक्षक थे, जबकि सिर्फ दस ही अजनबी थे। इनमें तीन फीसदी सहकर्मी थे।
मध्य प्रदेश में तो स्थिति और भी बदतर है। अभी हाल ही में दमोह नगर की बी.काम की एक छात्रा ने युवकों द्वारा आये दिन की जा रही छेडखानी से तंग आकर मालगाडी के सामने कूद कर जान दे दी। घटना के संबंध में मृतका के भाई पारस जैन एवं चाचा नवल चौरसिया ने बताया कि 20 वर्षीय कजली युवकों की छेडखानी से परेशान हो गई थी। इस बावत पुलिस में भी शिकायत की गई थी लेकिन पुलिस द्वारा आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने पर युवती ने ट्रेन के सामने कूद कर अपनी जान दे दी। उधर इसी जिले के तेजगढ़ थानांतर्गत ग्राम मगदूपुरा में बारहवीं की छात्रा के साथ पड़ोस के सौरभ पटेल दुराचार करने के बाद दूसरे दिन किशोरी के घर में जाकर उस पर कैरोसीन डालकर जिंदा जला दिया। गंभीर रूप से जली छात्रा ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। बताया जाता है कि घटना वाले दिन शाम पांच बजे छात्रा अपने घर के पास बाड़ी में थी। तभी पड़ोसी सौरभ पटेल वहां पहुंचा और उसने किशोरी के साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद सौरभ ने जान की धमकी देकर उससे इस बारे में किसी नहीं बताने के लिए कहा था। लेकिन पीडि़त छात्रा ने अपने परिजनों के इस बारे में बता दिया। पीडि़ता के पिता नोनेलाल ने
बताया कि उसी दिन वे बेटी के साथ तेजगढ़ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंचे। लेकिन प्रधान आरक्षक ने बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए पैसे मांगे। इस पर वे वापस आ गए। अगले दिन सुबह वे फिर से थाना जाने की तैयारी में थे। घर के अन्य लोग बाहर थे और घर में बेटी अकेली थी। तभी सौरभ,उसके पिता परसुराम,चाचा टीकाराम,सीताराम और नन्नू घर में घुसे और बेटी पर कैरोसीन डालकर आग लगा दी। उसके चिल्लाने पर आरोपी भाग निकले। नोनेलाल ने बताया कि बेटी के आवाज सुनकर अंदर गए तो आरोपी भाग रहे थे।
सलामतपुर थाना क्षेत्र के जमुनिया में एक खेत पर बने टपरे में अकेली सो रही चौदह वर्षीय एक दलित किशोरी से चाकू की नोक पर बलात्कार किए जाने का मामला प्रकाश में आया है।
गत दिनों मुंबई के एक निजी अस्पताल में आईसीयू में भर्ती एक महिला के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में एक डॉक्टर और दिल्ली में अपनी लेक्चरर बहू के साथ बलात्कार करने का प्रयास करने के आरोप में एक प्रिंसिपल ससुर को गिरफ्तार किया गया। हिमाचल प्रदेश में प्रेरणा नामक स्वयंसेवी संस्था द्वारा मूक-बधिर बच्चों के पुनर्वास के लिए बने केंद्र में प्रिंसिपल और कुछ अध्यापकों द्वारा भी बच्चों से बलात्कार की खबरें हैं। एक समय वह था, जब कभी-कभार ही इस तरह की खबरें सुनने को मिलती थीं, लेकिन अब यह आए दिन की बात हो गई है। पहले चाचा, ताऊ, मामा आदि इन अपराधों के दोषी पाए जाते थे, लेकिन आज तो पुत्री को जन्म देने वाले कुछ पिता और उसकी रक्षा की कसम खाने वाले कुछ भाई भी इन रिश्तों को कलंकित करने का काम कर रहे हैं। शिक्षक जिन पर देश और समाज निर्माण का दायित्व है, उनके बारे में यह सब सुनकर घृणा होती है। अब तो ऐसा लगता है कि आज हम एक ऐसे समाज के अंग बन चुके हैं, जहां नैतिकता और संवेदनाओं के लिए कोई जगह ही नहीं है। आखिर समाज को हो क्या गया है? आज समाज नाम की वस्तु असल में रह ही नहीं गई है। यह एक गंभीर समस्या है। इसी तरह देश व समाज की सुरक्षा का दायित्व निभा रहे सेना व पुलिस, न्याय व्यवस्था के अलंबरदार, लोकतंत्र के सजग प्रहरी और डॉक्टर जैसे सम्मानित पेशे से जुड़े लोग भी यदि यदि इस तरह का आचरण करें तो यही कहावत चरितार्थ होती है कि जब बाड़ ही फसल को खाने लगे उस हालत में आखिर न्याय की आशा किससे की जा सकती है? हालात इसकी गवाही देते हैं कि ऐसे लोग मौका मिलते ही टूट पड़ते हैं और अपने शरीर की भूख शांत करने में पीछे नहीं रहते हैं। दरअसल, ऐसी घटनाएं समाज के लिए कलंक हैं। हालांकि ऐसी घटनाएं नई बात नही है। कहा जाता है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता यानी जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता वास करते हैं। इस विशिष्ट संस्कृति, परंपरा, मान्यता वाले देश में आज पल-पल सर्वत्र नारी शोषित-उत्पीडि़त हो रही है। यहां तक कि नवरात्र में जिस अबोध-मासूम बच्ची को गोद में उठाए, कंधे पर बिठाकर पूजा हेतु ले जाते हैं, उसी आयु वर्ग की बच्चियों को आए-दिन लोग अपनी शैतानी हवस का शिकार बना रहे हैं। ऐसी खबरें रोज-ब-रोज अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। आखिर हमारा समाज इन घटनाओं पर मौन क्यों है। भौतिक विकास के बाद हम पाषाण युग में तो वापस नहीं जा सकते, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि आज भौतिकता ने नैतिकता को निगल लिया है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि न आज मानवता रही, न वह संस्कार रहे, न चरित्र और न ही आदर्श जिसके लिए समूची दुनिया में हमारा देश जाना जाता है। मुंबई के जेजे अस्पताल और ग्रांट मेडिकल कॉलेज में वर्ष 2004 में कराए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि वहां कार्यरत 249 नर्सो में से 12.39 फीसदी ने यह स्वीकार किया कि अस्पताल में काम के दौरान वे अक्सर शारीरिक शोषण की शिकार हुई। पूर्व केंद्रीय मंत्री व वन्य जीव प्रेमी मेनका गांधी भले यह दावा करें कि देश से गिद्ध खत्म हो रहे हैं जबकि हकीकत में देश में मानव रूपी गिद्धों की बहुतायत है जो मौका मिलते ही स्त्री मांस नोचने को भूखे-भेडिय़ों की तरह टूट पड़ते हैं। बलात्कार मानवीयता और नैतिकता की दृष्टि से एक जघन्य और अक्षम्य अपराध है। ऐसे में बच्चियों के साथ बलात्कार निस्संदेह हैवानियत और नीचता की पराकाष्ठा है। इन घटनाओं में तेजी से हो रही वृद्धि चिंताजनक है। कोई भी समाज न तो बलात्कार की अनुमति देता है और न बलात्कारी को माफ कर सकता है। जाहिर है अति विकसित समाज का नियंत्रण राज्य के पास होने से बलात्कार एक असामाजिक जघन्य अपराध न होकर तकनीकी अपराध माना जाता है। बलात्कार वह चाहे बच्ची के साथ किया गया हो या कि वयस्क या अवयस्क के साथ, यह भूल-अज्ञानतानवश या धोखे में किया जाने वाला अपराध नहीं है। यह तो निश्चित है कि बलात्कार स्थान, समय, सुरक्षा आदि का ध्यान रखते हुए योजनाबद्ध साजिश के तहत पूरे संज्ञान में किया जाने वाला अपराध है। जहां तक बलात्कारी का सवाल है वह कोई भी क्यों न हों, उसके लिए सौंदर्य और आयु की कोई कसौटी नहीं है। उसकी कसौटी तो यही है कि वह आसानी से हमला कर अपनी भड़ास निकाल सके। अपनी ताकत का वहां प्रदर्शन करे जहां उसका कोई प्रतिवाद न कर सके। यदि ताकत का प्रदर्शन वह बाहर करेगा, तो निश्चित ही उसे विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसीलिए बच्चियां और घर की बेटी-बहू तो बलात्कारी को सबसे आसानी से और बिना प्रतिरोध के शिकार के रूप में मिल जाती हैं। तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार के बाद हत्या करने, पिता द्वारा बेटी से बलात्कार और ससुर द्वारा बहू से बलात्कार की कोशिशें और हिमाचल की घटना इसका प्रमाण है कि आज आदमी की मानसिकता किस हद तक विकृत और दिवालिया हो चुकी है। इसमें दो राय नहीं कि हमारे यहां बलात्कार की कोई कड़ी सजा नहीं है। इस मामले में छात्र, शिक्षक, बुद्धिजीवी और आमजन सभी की एक राय है कि देश में लचीली कानून व्यवस्था होने के कारण ऐसे अपराधों में वृद्धि हो रही है। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद कड़ी सजा नहीं होने के कारण कुछ दिनों बाद ही अपराधी छूट जाता है। जब तक कोई ऐसी सजा का प्रावधान नहीं होगा जिससे अपराधियों में भय बना रहे, तब तक ये अपराध इसी तरह होते रहेंगे और बलात्कारी बेखौफ खुलेआम घूमते रहेंगे। इससे बलत्कृत लड़की व उसके परिजन समाज में बदनामी से बचने की खातिर बार-बार घर-बार शहर छोड़ दर-दर भटकते रहेंगे।
मध्य प्रदेश में तो स्थिति और भी बदतर है। अभी हाल ही में दमोह नगर की बी.काम की एक छात्रा ने युवकों द्वारा आये दिन की जा रही छेडखानी से तंग आकर मालगाडी के सामने कूद कर जान दे दी। घटना के संबंध में मृतका के भाई पारस जैन एवं चाचा नवल चौरसिया ने बताया कि 20 वर्षीय कजली युवकों की छेडखानी से परेशान हो गई थी। इस बावत पुलिस में भी शिकायत की गई थी लेकिन पुलिस द्वारा आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने पर युवती ने ट्रेन के सामने कूद कर अपनी जान दे दी। उधर इसी जिले के तेजगढ़ थानांतर्गत ग्राम मगदूपुरा में बारहवीं की छात्रा के साथ पड़ोस के सौरभ पटेल दुराचार करने के बाद दूसरे दिन किशोरी के घर में जाकर उस पर कैरोसीन डालकर जिंदा जला दिया। गंभीर रूप से जली छात्रा ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। बताया जाता है कि घटना वाले दिन शाम पांच बजे छात्रा अपने घर के पास बाड़ी में थी। तभी पड़ोसी सौरभ पटेल वहां पहुंचा और उसने किशोरी के साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद सौरभ ने जान की धमकी देकर उससे इस बारे में किसी नहीं बताने के लिए कहा था। लेकिन पीडि़त छात्रा ने अपने परिजनों के इस बारे में बता दिया। पीडि़ता के पिता नोनेलाल ने
बताया कि उसी दिन वे बेटी के साथ तेजगढ़ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंचे। लेकिन प्रधान आरक्षक ने बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए पैसे मांगे। इस पर वे वापस आ गए। अगले दिन सुबह वे फिर से थाना जाने की तैयारी में थे। घर के अन्य लोग बाहर थे और घर में बेटी अकेली थी। तभी सौरभ,उसके पिता परसुराम,चाचा टीकाराम,सीताराम और नन्नू घर में घुसे और बेटी पर कैरोसीन डालकर आग लगा दी। उसके चिल्लाने पर आरोपी भाग निकले। नोनेलाल ने बताया कि बेटी के आवाज सुनकर अंदर गए तो आरोपी भाग रहे थे।
सलामतपुर थाना क्षेत्र के जमुनिया में एक खेत पर बने टपरे में अकेली सो रही चौदह वर्षीय एक दलित किशोरी से चाकू की नोक पर बलात्कार किए जाने का मामला प्रकाश में आया है।
गत दिनों मुंबई के एक निजी अस्पताल में आईसीयू में भर्ती एक महिला के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में एक डॉक्टर और दिल्ली में अपनी लेक्चरर बहू के साथ बलात्कार करने का प्रयास करने के आरोप में एक प्रिंसिपल ससुर को गिरफ्तार किया गया। हिमाचल प्रदेश में प्रेरणा नामक स्वयंसेवी संस्था द्वारा मूक-बधिर बच्चों के पुनर्वास के लिए बने केंद्र में प्रिंसिपल और कुछ अध्यापकों द्वारा भी बच्चों से बलात्कार की खबरें हैं। एक समय वह था, जब कभी-कभार ही इस तरह की खबरें सुनने को मिलती थीं, लेकिन अब यह आए दिन की बात हो गई है। पहले चाचा, ताऊ, मामा आदि इन अपराधों के दोषी पाए जाते थे, लेकिन आज तो पुत्री को जन्म देने वाले कुछ पिता और उसकी रक्षा की कसम खाने वाले कुछ भाई भी इन रिश्तों को कलंकित करने का काम कर रहे हैं। शिक्षक जिन पर देश और समाज निर्माण का दायित्व है, उनके बारे में यह सब सुनकर घृणा होती है। अब तो ऐसा लगता है कि आज हम एक ऐसे समाज के अंग बन चुके हैं, जहां नैतिकता और संवेदनाओं के लिए कोई जगह ही नहीं है। आखिर समाज को हो क्या गया है? आज समाज नाम की वस्तु असल में रह ही नहीं गई है। यह एक गंभीर समस्या है। इसी तरह देश व समाज की सुरक्षा का दायित्व निभा रहे सेना व पुलिस, न्याय व्यवस्था के अलंबरदार, लोकतंत्र के सजग प्रहरी और डॉक्टर जैसे सम्मानित पेशे से जुड़े लोग भी यदि यदि इस तरह का आचरण करें तो यही कहावत चरितार्थ होती है कि जब बाड़ ही फसल को खाने लगे उस हालत में आखिर न्याय की आशा किससे की जा सकती है? हालात इसकी गवाही देते हैं कि ऐसे लोग मौका मिलते ही टूट पड़ते हैं और अपने शरीर की भूख शांत करने में पीछे नहीं रहते हैं। दरअसल, ऐसी घटनाएं समाज के लिए कलंक हैं। हालांकि ऐसी घटनाएं नई बात नही है। कहा जाता है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता यानी जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता वास करते हैं। इस विशिष्ट संस्कृति, परंपरा, मान्यता वाले देश में आज पल-पल सर्वत्र नारी शोषित-उत्पीडि़त हो रही है। यहां तक कि नवरात्र में जिस अबोध-मासूम बच्ची को गोद में उठाए, कंधे पर बिठाकर पूजा हेतु ले जाते हैं, उसी आयु वर्ग की बच्चियों को आए-दिन लोग अपनी शैतानी हवस का शिकार बना रहे हैं। ऐसी खबरें रोज-ब-रोज अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। आखिर हमारा समाज इन घटनाओं पर मौन क्यों है। भौतिक विकास के बाद हम पाषाण युग में तो वापस नहीं जा सकते, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि आज भौतिकता ने नैतिकता को निगल लिया है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि न आज मानवता रही, न वह संस्कार रहे, न चरित्र और न ही आदर्श जिसके लिए समूची दुनिया में हमारा देश जाना जाता है। मुंबई के जेजे अस्पताल और ग्रांट मेडिकल कॉलेज में वर्ष 2004 में कराए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि वहां कार्यरत 249 नर्सो में से 12.39 फीसदी ने यह स्वीकार किया कि अस्पताल में काम के दौरान वे अक्सर शारीरिक शोषण की शिकार हुई। पूर्व केंद्रीय मंत्री व वन्य जीव प्रेमी मेनका गांधी भले यह दावा करें कि देश से गिद्ध खत्म हो रहे हैं जबकि हकीकत में देश में मानव रूपी गिद्धों की बहुतायत है जो मौका मिलते ही स्त्री मांस नोचने को भूखे-भेडिय़ों की तरह टूट पड़ते हैं। बलात्कार मानवीयता और नैतिकता की दृष्टि से एक जघन्य और अक्षम्य अपराध है। ऐसे में बच्चियों के साथ बलात्कार निस्संदेह हैवानियत और नीचता की पराकाष्ठा है। इन घटनाओं में तेजी से हो रही वृद्धि चिंताजनक है। कोई भी समाज न तो बलात्कार की अनुमति देता है और न बलात्कारी को माफ कर सकता है। जाहिर है अति विकसित समाज का नियंत्रण राज्य के पास होने से बलात्कार एक असामाजिक जघन्य अपराध न होकर तकनीकी अपराध माना जाता है। बलात्कार वह चाहे बच्ची के साथ किया गया हो या कि वयस्क या अवयस्क के साथ, यह भूल-अज्ञानतानवश या धोखे में किया जाने वाला अपराध नहीं है। यह तो निश्चित है कि बलात्कार स्थान, समय, सुरक्षा आदि का ध्यान रखते हुए योजनाबद्ध साजिश के तहत पूरे संज्ञान में किया जाने वाला अपराध है। जहां तक बलात्कारी का सवाल है वह कोई भी क्यों न हों, उसके लिए सौंदर्य और आयु की कोई कसौटी नहीं है। उसकी कसौटी तो यही है कि वह आसानी से हमला कर अपनी भड़ास निकाल सके। अपनी ताकत का वहां प्रदर्शन करे जहां उसका कोई प्रतिवाद न कर सके। यदि ताकत का प्रदर्शन वह बाहर करेगा, तो निश्चित ही उसे विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसीलिए बच्चियां और घर की बेटी-बहू तो बलात्कारी को सबसे आसानी से और बिना प्रतिरोध के शिकार के रूप में मिल जाती हैं। तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार के बाद हत्या करने, पिता द्वारा बेटी से बलात्कार और ससुर द्वारा बहू से बलात्कार की कोशिशें और हिमाचल की घटना इसका प्रमाण है कि आज आदमी की मानसिकता किस हद तक विकृत और दिवालिया हो चुकी है। इसमें दो राय नहीं कि हमारे यहां बलात्कार की कोई कड़ी सजा नहीं है। इस मामले में छात्र, शिक्षक, बुद्धिजीवी और आमजन सभी की एक राय है कि देश में लचीली कानून व्यवस्था होने के कारण ऐसे अपराधों में वृद्धि हो रही है। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद कड़ी सजा नहीं होने के कारण कुछ दिनों बाद ही अपराधी छूट जाता है। जब तक कोई ऐसी सजा का प्रावधान नहीं होगा जिससे अपराधियों में भय बना रहे, तब तक ये अपराध इसी तरह होते रहेंगे और बलात्कारी बेखौफ खुलेआम घूमते रहेंगे। इससे बलत्कृत लड़की व उसके परिजन समाज में बदनामी से बचने की खातिर बार-बार घर-बार शहर छोड़ दर-दर भटकते रहेंगे।
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
धन और बल है आज के लोकतंत्र का असली चेहरा
आजकल उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं। दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा। जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। अब नेताओं का लिबास भी जुदा हो गया है। कुर्ता-पायजामा गुजरे जमाने की बात हो गयी है। झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद ही जूते आजकल के नेताओं का ‘ड्रेस कोड’ है। हालांकि यही ‘ड्रेस कोड’ माफियाओं का भी हो चला है। स्टेनगन धारी गनर, होलेस्टर में लटके रिवाल्वर भी आजकल के नेताओं के लिए ‘स्टेट्स सिम्बल’ हैं। आजकल यह तय करा मुश्किल है कि कौन नेता है और माफिया। वैसे भी अब माफिया और नेताओं के बीच बहुत बारीक अन्तर रह गया है। बहरहाल, नेताओं की उस भीड़ में ‘आम आदमी’ का तड़का भी था। थके-मांदे चेहरे। साधारण कपड़े पहने आम आदमी या कह लीजिए हर चुनाव में ‘मुंडने वाली भेड़ें’ भी शामिल थीं, जिनकी याद नेताओं को चुनाव में ही आती है। इस वक्त आम आदमी नेताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। उसे सिर आंखों पर बैठाया जाता है। आम आदमी को लगजरी गाड़ियों का सुख भी कुछ देर के लिए चुनाव के वक्त मिल जाता है। चुनाव के बाद कौन लगजरी गाड़ी में सवारी कराएगा।
चुनाव प्रचार शुरु हुआ तो आंखें चकाचौंध हो गयीं। हर गांव रंगीन पोस्टरों और बैनरों से पट गया। एक जमाना था, जब जिला पंचायत और ग्राम पंचायत के चुनाव बिना किसी शोर-शराबे के पूरे हो जाते थे। लेकिन अब बिना ‘शोर’ और ‘शराब’ के पूरे नहीं होते। आबकारी विभाग का कहना है कि जितना राजस्व तीन महीने में आता है, इस बार एक महीने में ही आ गया। अवैध और हरियाणा से तस्करी से लाई गयी शराब का कोई हिसाब-किताब किसी के पास नहीं है। वोटर ने भी सोचा मुफ्त की शराब है, जमकर पियो। नतीजे में कई ‘वोटर’ अपनी जाने से हाथ धो बैठे तो कई अस्पतलों की शरण में चले गए। ऐसा नहीं है कि ऐसी हालत सभी गांवों की है। जब हमारा देश भूखमरी और कुपोषण के मामले में पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों से भी बहुत पिछड़ा हो, तो ऐसा हो भी नहीं सकता। पैसे की भरमार उन गांवों में हुई है, जो शहरों से लगे हुए हैं। इन गांवों की जमीन अनाज उगलती हो या नहीं, लेकिन बढ़ती आवास समस्या और एक्सप्रेस हाइवे के निर्माण की वजह से जमीनें सोना उगल रही हैं। पैसा आया है तो राजनैतिक महत्वकांक्षा भी जागी है।
इस पंचायत चुनाव में एक खास बात यह भी हुई है कि एक ही परिवार के चार सदस्यों को र्निविरोध सदस्य निर्वाचित किया गया है। मेरठ के हस्तिानापुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं योगेश वर्मा। मेरठ के दौराला ब्लॉक से उनके माता-पिता सहित दो सगे भाई बीडीसी के सदस्य र्निविरोध निर्वाचित हो गए है। अब लोग खुद तय करें कि एक ही परिवार के चार सदस्य किस तरह से र्निविरोध चुने जा सकते हैं ? जब चार सदस्य एक ही परिवार के हों तो उस परिवार के सदस्य को ब्लॉक प्रमुख बनने से कौन रोक सकता है ? इस तरह से हो गयी न एक ही परिवार की सरकार ? सवाल यह है कि यह कौनसा लोकतंत्र है और इस तरह का लोकतंत्र देश और समाज को कहां ले जाएगा ? किसी चुनाव में एक ही परिवार के चार सदस्यों का र्निविरोध चुना जाना ‘गिनीज वर्ल्ड बुक’ में दर्ज हो चाहिए।
आरक्षण के तहत बड़ी संख्या में महिलाएं भी पंचायत चुनाव में उतरी हैं। लेकिन इनकी हैसियत किसी मुखौटे से ज्यादा नहीं है। जो सीट महिला आरक्षण में चली गयी है, उस सीट पर नेताजी ने मजबूरी में अपनी पत्नि, बहन, मां या पुत्रवधु को पर्चा भरवा दिया है। इसलिए पोस्टरों, बैनरों और अखबार के विज्ञापनों में वह हाथ जोड़े खड़ी हैं। साथ में यह जरुर लिखा है कि उम्मीदवार किस की पत्नि, बहु, मां या बेटी है। साथ में पति, ससुर, बेटे या भाई की तस्वीर भी हाथ जोड़े चस्पा है। सब जानते हैं कि चुनाव महिला नहीं लड़ रही बल्कि महिला की आड़ में पुरुष लड़ रहा है। इसलिए महिला उम्मीदवारों की सूरत सिर्फ पोस्टरों, बैनरों और अखबारों में ही दिख रही है। कहीं-कहीं तो मुस्लिम महिला उम्मीदवार की सूरत ही सिरे से गायब है। चुनाव प्रचार से भी महिलाएं दूर है। इसकी जिम्मेदारी पुरुषों ने संभाल रखी है। असली उम्मीदवार को तो पता ही नहीं कि बाहर क्या हो रहा है। वह तो आज भी घर के अन्दर चूल्हा झोंक रही है, भैंसों को सानी कर रही है या गोबर से उपले पाथ रही है। किसी महिला के निर्वाचित होने के बाद भी उनकी हैसियत कुछ नहीं होगी। सारा काम पुरुष ही करेगा। महिला तो सिर्फ ‘रबर स्टाम्प’ होगी।
सोचा गया था कि महिलाओं को आरक्षण देने से महिलाओं का सशक्तिकरण होगा। क्या इन हालात में महिलाओं का सशक्तिकरण हो सकता है ? कुछ लोग जब महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मुखालफत करते हैं तो इसके पीछे एक तर्क यह भी होता है कि इससे महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होगा, बल्कि पुरुष ही अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा करेगा। यदि फायदा होगा भी तो शबाना आजमी, जया प्रदा या नजमा हैपतुल्ला जैसी महिलाओं का होगा, जो पहले से ही पुरुषों से भी ज्यादा सशक्त हैं। ग्राम पंचायत को तो छोड़ दें। मैट्रो शहरों के नगर-निगम में चुने जाने वाली ज्यादतर महिला पार्षद भी बस नाम की ही पार्षद होती हैं। सारा काम तो ‘पार्षद पति’ ही करते हैं। इस तरह से ‘पार्षद पति’ का एक पद स्वयं ही सृजित हो गया है। मेरे वार्ड से एक महिला पार्षद है लेकिन मैंने अपनी पार्षद का चेहरा आज तक नहीं देखा।
लोकसभा और विधान सभा के चुनाव लगातार महंगे होते गए। धन और बल वाला आदमी ही दोनों जगह जाने लगा। आम आदमी के लिए लोकसभा और विधानसभा में जाना सपना सरीखा हो गया है। नैतिकता, चरित्र, आदर्शवाद और विचारधारा अब गुजरे जमाने की बातें हो गयी हैं। अबकी बार जिला पंचायत और ग्राम पंचायत जैसे छोटे चुनाव में बहता पैसा इस बात का इशारा कर रहा है कि अब इन छोटे चुनावों में भी उतरने के लिए आम आदमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। धन और बल ही आज के लोकतंत्र का असली चेहरा है।
चुनाव प्रचार शुरु हुआ तो आंखें चकाचौंध हो गयीं। हर गांव रंगीन पोस्टरों और बैनरों से पट गया। एक जमाना था, जब जिला पंचायत और ग्राम पंचायत के चुनाव बिना किसी शोर-शराबे के पूरे हो जाते थे। लेकिन अब बिना ‘शोर’ और ‘शराब’ के पूरे नहीं होते। आबकारी विभाग का कहना है कि जितना राजस्व तीन महीने में आता है, इस बार एक महीने में ही आ गया। अवैध और हरियाणा से तस्करी से लाई गयी शराब का कोई हिसाब-किताब किसी के पास नहीं है। वोटर ने भी सोचा मुफ्त की शराब है, जमकर पियो। नतीजे में कई ‘वोटर’ अपनी जाने से हाथ धो बैठे तो कई अस्पतलों की शरण में चले गए। ऐसा नहीं है कि ऐसी हालत सभी गांवों की है। जब हमारा देश भूखमरी और कुपोषण के मामले में पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों से भी बहुत पिछड़ा हो, तो ऐसा हो भी नहीं सकता। पैसे की भरमार उन गांवों में हुई है, जो शहरों से लगे हुए हैं। इन गांवों की जमीन अनाज उगलती हो या नहीं, लेकिन बढ़ती आवास समस्या और एक्सप्रेस हाइवे के निर्माण की वजह से जमीनें सोना उगल रही हैं। पैसा आया है तो राजनैतिक महत्वकांक्षा भी जागी है।
इस पंचायत चुनाव में एक खास बात यह भी हुई है कि एक ही परिवार के चार सदस्यों को र्निविरोध सदस्य निर्वाचित किया गया है। मेरठ के हस्तिानापुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं योगेश वर्मा। मेरठ के दौराला ब्लॉक से उनके माता-पिता सहित दो सगे भाई बीडीसी के सदस्य र्निविरोध निर्वाचित हो गए है। अब लोग खुद तय करें कि एक ही परिवार के चार सदस्य किस तरह से र्निविरोध चुने जा सकते हैं ? जब चार सदस्य एक ही परिवार के हों तो उस परिवार के सदस्य को ब्लॉक प्रमुख बनने से कौन रोक सकता है ? इस तरह से हो गयी न एक ही परिवार की सरकार ? सवाल यह है कि यह कौनसा लोकतंत्र है और इस तरह का लोकतंत्र देश और समाज को कहां ले जाएगा ? किसी चुनाव में एक ही परिवार के चार सदस्यों का र्निविरोध चुना जाना ‘गिनीज वर्ल्ड बुक’ में दर्ज हो चाहिए।
आरक्षण के तहत बड़ी संख्या में महिलाएं भी पंचायत चुनाव में उतरी हैं। लेकिन इनकी हैसियत किसी मुखौटे से ज्यादा नहीं है। जो सीट महिला आरक्षण में चली गयी है, उस सीट पर नेताजी ने मजबूरी में अपनी पत्नि, बहन, मां या पुत्रवधु को पर्चा भरवा दिया है। इसलिए पोस्टरों, बैनरों और अखबार के विज्ञापनों में वह हाथ जोड़े खड़ी हैं। साथ में यह जरुर लिखा है कि उम्मीदवार किस की पत्नि, बहु, मां या बेटी है। साथ में पति, ससुर, बेटे या भाई की तस्वीर भी हाथ जोड़े चस्पा है। सब जानते हैं कि चुनाव महिला नहीं लड़ रही बल्कि महिला की आड़ में पुरुष लड़ रहा है। इसलिए महिला उम्मीदवारों की सूरत सिर्फ पोस्टरों, बैनरों और अखबारों में ही दिख रही है। कहीं-कहीं तो मुस्लिम महिला उम्मीदवार की सूरत ही सिरे से गायब है। चुनाव प्रचार से भी महिलाएं दूर है। इसकी जिम्मेदारी पुरुषों ने संभाल रखी है। असली उम्मीदवार को तो पता ही नहीं कि बाहर क्या हो रहा है। वह तो आज भी घर के अन्दर चूल्हा झोंक रही है, भैंसों को सानी कर रही है या गोबर से उपले पाथ रही है। किसी महिला के निर्वाचित होने के बाद भी उनकी हैसियत कुछ नहीं होगी। सारा काम पुरुष ही करेगा। महिला तो सिर्फ ‘रबर स्टाम्प’ होगी।
सोचा गया था कि महिलाओं को आरक्षण देने से महिलाओं का सशक्तिकरण होगा। क्या इन हालात में महिलाओं का सशक्तिकरण हो सकता है ? कुछ लोग जब महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मुखालफत करते हैं तो इसके पीछे एक तर्क यह भी होता है कि इससे महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होगा, बल्कि पुरुष ही अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा करेगा। यदि फायदा होगा भी तो शबाना आजमी, जया प्रदा या नजमा हैपतुल्ला जैसी महिलाओं का होगा, जो पहले से ही पुरुषों से भी ज्यादा सशक्त हैं। ग्राम पंचायत को तो छोड़ दें। मैट्रो शहरों के नगर-निगम में चुने जाने वाली ज्यादतर महिला पार्षद भी बस नाम की ही पार्षद होती हैं। सारा काम तो ‘पार्षद पति’ ही करते हैं। इस तरह से ‘पार्षद पति’ का एक पद स्वयं ही सृजित हो गया है। मेरे वार्ड से एक महिला पार्षद है लेकिन मैंने अपनी पार्षद का चेहरा आज तक नहीं देखा।
लोकसभा और विधान सभा के चुनाव लगातार महंगे होते गए। धन और बल वाला आदमी ही दोनों जगह जाने लगा। आम आदमी के लिए लोकसभा और विधानसभा में जाना सपना सरीखा हो गया है। नैतिकता, चरित्र, आदर्शवाद और विचारधारा अब गुजरे जमाने की बातें हो गयी हैं। अबकी बार जिला पंचायत और ग्राम पंचायत जैसे छोटे चुनाव में बहता पैसा इस बात का इशारा कर रहा है कि अब इन छोटे चुनावों में भी उतरने के लिए आम आदमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। धन और बल ही आज के लोकतंत्र का असली चेहरा है।
किसी मस्जिद का नाम बाबरी हो ही नहीं सकता!
अयोध्या पर हाई कोर्ट के फैसले के बाद विवाद और असंतोष वहां से उभरा, जहां से इसकी गुंजाइश बिल्कुल न के बराबर थी। कुछ राजनेता, जिनकी हमेशा यह लाइन रही कि समझौता करो या कोर्ट का फैसला मानो, उन्होंने भी इससे मुंह बिचकाया। निर्मोही अखाड़े ने कोर्ट के द्वारा विहिप को वरीयता देने पर आपत्ति जताई है। उसके अनुसार सरकार ने उसी से 1949 में यह जमीन लेकर रिसीवर नियुक्त किया था, लिहाजा जमीन उसे मिलनी चाहिए।
कुछ हिंदू संगठनों को लगता है कि बाबर और उसके सिपहसालार मीरबाकी ने इतिहास में जो भी किया, उसका बदला लेने का वक्त आ गया है। उधर मुख्य याचिकाकर्ता हाशिम अंसारी की पहल को कुछ मुस्लिम संगठन इसलिए जमींदोज करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर अब झुके तो हमेशा झुकना पड़ेगा।
इस बीच कुछ बौद्ध संगठन बेहद मुखर हुए हैं। यद्यपि उनके दावे को अभी हाल ही में फैजाबाद की जिला अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन उनके तर्क खारिज नहीं किए जा सकते। उनके अनुसार सुग्रीव टीला और कुबेर टीला को भारतीय पुरातत्व के पितामह कनिंघम ने बौद्ध स्तूप बताया है। किसी मस्जिद का नाम बाबरी हो ही नहीं सकता, क्योंकि इस्लाम में किसी व्यक्ति विशेष के नाम से मस्जिद तामीर नहीं की जा सकती। उनके अनुसार अयोध्या में एक बौद्ध भिक्षु बाबरी नाम के हुए हैं, उन्हीं के नाम पर यहां बाबरी स्तूप था। अयोध्या प्रसिद्ध कवि अश्वघोष की नगरी रही है और तथागत ने यहां पर 16 वर्ष वर्षावास किया था। उनके अनुसार हनुमानगढ़ी एक संघाराम के ऊपर बनी है और मीरबाकी का लेख अंग्रेजों ने आगरा से लेकर अयोध्या में चुपके से रख दिया था।
दरअसल, अयोध्या मुद्दे का समाधान भारतीय संस्कृति की जड़ों में खोजा जाना चाहिए। अयोध्या कभी किसी एक मजहब या संस्कृति की जागीर नहीं रहा। ठीक उसी तरह जैसे हिंदुस्तान कभी किसी एक मजहब का होकर नहीं रहा। हनुमानगढ़ी का निर्माण अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने कराया था। यह जगह एक मुसलमान जमींदार की थी। जब से हनुमानगढ़ी आबाद हुई, तभी से उसका पहला प्रसाद एक मुस्लिम फकीर को दिया जाता है। हुनमानगढ़ी में इस परंपरा को सहेजते हुए एक सर्वधर्म सत्यार मंदिर का निर्माण किया गया था। इस मंदिर में आज भी राम, बुद्ध, महावीर के साथ मक्का-मदीना और जरथुस्त्र की तस्वीरें आबाद हैं। हनुमानगढ़ी के महंत पहले अपने आंगन में रोजा-इफ्तार की दावत दिया करते थे जिसमें अयोध्या के मुसलमान शिरकत करते थे, हालांकि 1990 के बाद से इस पर ग्रहण लगा है।
इसी अयोध्या में हजरत शीश की दरगाह है। यहीं हजरत नूह की नौगजा दरगाह है, जहां पर मुसलमानों से ज्यादा अकीदतमंद हिंदू हुआ करते हैं। 12वीं शती में अयोध्या को सूफी परंपरा का एक अजीम शिक्षा केंद्र माना जाता था। मध्य एशिया से काजी कुतुबुद्दीन यहां पर शिक्षा ग्रहण करने आए। सूफी परंपरा के फिरदौसी कबीले के शेख जमाल गूजरी जो हिंदू-मुस्लिम एकता के कसीदे पढ़ते थे, उन्होंने अयोध्या की सर्वधर्म समभाव परंपरा को देखते हुए इसे अपना केंद्र बनाया था।
प्रख्यात नर्तकी उमराव जान जो बाद में मुजफ्फर अली की अजीम शाहकार बनकर पर्दे पर उतरी और बेगम अख्तरी बाई जिसने ठुमरी, गजल और दादरा को अवध की सरहदांे से निकालकर दीगर सूबों में पहुंचाया, वे इसी अयोध्या की आबरू थीं। अयोध्या में भगवा ध्वज, मालाएं, प्रसाद बनाने वाले आधे से अधिक कारीगर मुसलमान हैं। आज भी अयोध्या में सूफी संतों और फकीरों की 80 से अधिक मजारें और दरगाहें हैं और मध्यकाल से ही अयोध्या को आसपास जिलों के मुस्लिम घरों में मक्का खुर्द (छोटी मक्का) कहा जाता है। यह भी केवल इकबाल जैसे किसी शायर का ही जिगर हो सकता है जो राम को ईमाने-हिंद माने, ‘है राम के वजूद पर हिंदुस्तान को नाज/अहले-नजर समझते हैं उसको ईमाने-हिंद।’
अयोध्या जैन र्तीथकरों की भी जन्मस्थली रही है। चौबीस र्तीथकरों में से पांच यहीं पैदा हुए। अयोध्या का जो नामकरण साकेत से अयोध्या (वह क्षेत्र जहां युद्ध और वध नहीं होते) हुआ, उस पर बौद्ध धर्म के साथ जैन धर्म की अहिंसा का भी प्रभाव माना गया है। यह भी इतिहास का एक तथ्य है कि सिख गुरुओं में नानक, तेगबहादुर और गुरु गोविंद सिंह ने अयोध्या के ब्रह्मकुण्ड में ध्यान साधना की थी।
ब्रह्मघाट पर स्थित गुरुद्वारा सिख धर्म के सबसे पुराने गुरुद्वारों में से एक है। अस्तु अयोध्या किसी एक का नहीं है। हाई कोर्ट ने जिस मंदिर-मस्जिद का सहअस्तित्व माना है, उसको आगे बढ़ाने की जरूरत है। इस विवादित स्थल पर राम मंदिर के साथ-साथ मस्जिद, गुरुद्वारा और बौद्ध मठ एक साथ बने। जब इस जगह से सुबह-सवेरे अजान के साथ-साथ अरदास और घंटे-घड़ियालों की स्वर लहरी गूंजेगी तो हिंदुस्तान का असली अक्स नमूदार होगा, जो किसी एक का न होकर सबका है।
कुछ हिंदू संगठनों को लगता है कि बाबर और उसके सिपहसालार मीरबाकी ने इतिहास में जो भी किया, उसका बदला लेने का वक्त आ गया है। उधर मुख्य याचिकाकर्ता हाशिम अंसारी की पहल को कुछ मुस्लिम संगठन इसलिए जमींदोज करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर अब झुके तो हमेशा झुकना पड़ेगा।
इस बीच कुछ बौद्ध संगठन बेहद मुखर हुए हैं। यद्यपि उनके दावे को अभी हाल ही में फैजाबाद की जिला अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन उनके तर्क खारिज नहीं किए जा सकते। उनके अनुसार सुग्रीव टीला और कुबेर टीला को भारतीय पुरातत्व के पितामह कनिंघम ने बौद्ध स्तूप बताया है। किसी मस्जिद का नाम बाबरी हो ही नहीं सकता, क्योंकि इस्लाम में किसी व्यक्ति विशेष के नाम से मस्जिद तामीर नहीं की जा सकती। उनके अनुसार अयोध्या में एक बौद्ध भिक्षु बाबरी नाम के हुए हैं, उन्हीं के नाम पर यहां बाबरी स्तूप था। अयोध्या प्रसिद्ध कवि अश्वघोष की नगरी रही है और तथागत ने यहां पर 16 वर्ष वर्षावास किया था। उनके अनुसार हनुमानगढ़ी एक संघाराम के ऊपर बनी है और मीरबाकी का लेख अंग्रेजों ने आगरा से लेकर अयोध्या में चुपके से रख दिया था।
दरअसल, अयोध्या मुद्दे का समाधान भारतीय संस्कृति की जड़ों में खोजा जाना चाहिए। अयोध्या कभी किसी एक मजहब या संस्कृति की जागीर नहीं रहा। ठीक उसी तरह जैसे हिंदुस्तान कभी किसी एक मजहब का होकर नहीं रहा। हनुमानगढ़ी का निर्माण अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने कराया था। यह जगह एक मुसलमान जमींदार की थी। जब से हनुमानगढ़ी आबाद हुई, तभी से उसका पहला प्रसाद एक मुस्लिम फकीर को दिया जाता है। हुनमानगढ़ी में इस परंपरा को सहेजते हुए एक सर्वधर्म सत्यार मंदिर का निर्माण किया गया था। इस मंदिर में आज भी राम, बुद्ध, महावीर के साथ मक्का-मदीना और जरथुस्त्र की तस्वीरें आबाद हैं। हनुमानगढ़ी के महंत पहले अपने आंगन में रोजा-इफ्तार की दावत दिया करते थे जिसमें अयोध्या के मुसलमान शिरकत करते थे, हालांकि 1990 के बाद से इस पर ग्रहण लगा है।
इसी अयोध्या में हजरत शीश की दरगाह है। यहीं हजरत नूह की नौगजा दरगाह है, जहां पर मुसलमानों से ज्यादा अकीदतमंद हिंदू हुआ करते हैं। 12वीं शती में अयोध्या को सूफी परंपरा का एक अजीम शिक्षा केंद्र माना जाता था। मध्य एशिया से काजी कुतुबुद्दीन यहां पर शिक्षा ग्रहण करने आए। सूफी परंपरा के फिरदौसी कबीले के शेख जमाल गूजरी जो हिंदू-मुस्लिम एकता के कसीदे पढ़ते थे, उन्होंने अयोध्या की सर्वधर्म समभाव परंपरा को देखते हुए इसे अपना केंद्र बनाया था।
प्रख्यात नर्तकी उमराव जान जो बाद में मुजफ्फर अली की अजीम शाहकार बनकर पर्दे पर उतरी और बेगम अख्तरी बाई जिसने ठुमरी, गजल और दादरा को अवध की सरहदांे से निकालकर दीगर सूबों में पहुंचाया, वे इसी अयोध्या की आबरू थीं। अयोध्या में भगवा ध्वज, मालाएं, प्रसाद बनाने वाले आधे से अधिक कारीगर मुसलमान हैं। आज भी अयोध्या में सूफी संतों और फकीरों की 80 से अधिक मजारें और दरगाहें हैं और मध्यकाल से ही अयोध्या को आसपास जिलों के मुस्लिम घरों में मक्का खुर्द (छोटी मक्का) कहा जाता है। यह भी केवल इकबाल जैसे किसी शायर का ही जिगर हो सकता है जो राम को ईमाने-हिंद माने, ‘है राम के वजूद पर हिंदुस्तान को नाज/अहले-नजर समझते हैं उसको ईमाने-हिंद।’
अयोध्या जैन र्तीथकरों की भी जन्मस्थली रही है। चौबीस र्तीथकरों में से पांच यहीं पैदा हुए। अयोध्या का जो नामकरण साकेत से अयोध्या (वह क्षेत्र जहां युद्ध और वध नहीं होते) हुआ, उस पर बौद्ध धर्म के साथ जैन धर्म की अहिंसा का भी प्रभाव माना गया है। यह भी इतिहास का एक तथ्य है कि सिख गुरुओं में नानक, तेगबहादुर और गुरु गोविंद सिंह ने अयोध्या के ब्रह्मकुण्ड में ध्यान साधना की थी।
ब्रह्मघाट पर स्थित गुरुद्वारा सिख धर्म के सबसे पुराने गुरुद्वारों में से एक है। अस्तु अयोध्या किसी एक का नहीं है। हाई कोर्ट ने जिस मंदिर-मस्जिद का सहअस्तित्व माना है, उसको आगे बढ़ाने की जरूरत है। इस विवादित स्थल पर राम मंदिर के साथ-साथ मस्जिद, गुरुद्वारा और बौद्ध मठ एक साथ बने। जब इस जगह से सुबह-सवेरे अजान के साथ-साथ अरदास और घंटे-घड़ियालों की स्वर लहरी गूंजेगी तो हिंदुस्तान का असली अक्स नमूदार होगा, जो किसी एक का न होकर सबका है।
इस परिवारवाद और मौकापरस्ती पर शर्म आती है
टिकट नहीं मिलने पर टिकटार्थी अपने ही दल के दफ्तर में आग लगा दे,ऐसा बिहार में इस दफा पहली बार हुआ है। टिकट से वंचित लोगों के समर्थकों ने पूर्णिया के कांग्रेस पार्टी कार्यालय भवन में रविवार को पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। इतना ही नहीं, करीब-करीब सभी प्रमुख दलों के राज्य मुख्यालयों में या उसके आसपास टिकटार्थियों ने ऐसा हंगामा किया कि कुछ पार्टी दफ्तरों में ताले लगाने पड़े। टिकट बांटने के काम में लगे कुछ बड़े नेताओं को अपमान से बचने के लिए भूमिगत होकर हर दिन अपना ठिकाना बदलना पड़ा। राज्य भर से पटना पहुंचे टिकटलोलुप या फिर टिकट वंचित लोगों के छोटे-छोटे उग्र समूह कुछ दिनों से विभिन्न दलों के दफ्तरों, नेताओं के आवासों व सड़कों पर इस तरह की हिंसा करते रहे हैं मानो वे राजनीतिक कार्यकर्त्ता नहीं बल्कि गुंडा गिरोहों के सदस्य हों।
हालांकि विद्रोह पर उतारू ऐसे लोगों में सब गलत तत्व ही नहीं हैं। उनमें से कुछ वास्तविक राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं ने आरोप लगाया कि नेतत्व ने गैर राजनीतिक कारणों से विवादास्पद तत्वों को टिकट दे दिये। कहा जा रहा है कि कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों द्वारा टिकट वितरण में किसी तरह के मापदंड नहीं अपनाये जाने के कारण भी इस तरह के अराजक तत्वों को अपना कौशल दिखाने का साहस हो रहा है। चुनाव अभियान के दौरान ऐसे लोग कैसी करामात दिखाएंगे, इसको लेकर अटकलों का बाजार गर्म है।
टिकटों का फैसला करके प्रदेश कांग्रेस के नेता जब 2 अक्तूबर को दिल्ली से लौटे तो पटना हवाई अड्डे पर बेटिकट हुए कांग्रेसियों की उग्र भीड़ ने चौधरी महबूब अली कैसर और डा. अशोक राम के साथ धक्कम धुक्की की। उन्हें अपमानित किया। उनकी गाड़ी के शीशे तोड़ डाले और अश्लील नारे लगाये। कैसर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और डा.राम कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं। ऐसा पहली बार हुआ।
बेटिकट हुए लोगों की भीड़ के सामने आने से महाबली लालू प्रसाद भी कतराते रहे। इस संबंध में लालू प्रसाद ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रंस में स्वीकार किया कि मैं टिकटार्थियों के साथ सात दिनों तक लुकाछिपी का खेल खलता रहा। टिकटार्थी डाल-डाल तो मैं पात पात रहता था। जदयू के राज्य कार्यालय में रोष पूर्ण प्रदर्शन के कारण पार्टी पदाधिकारियों ने कार्यालय जाना छोड़ दिया और कार्यालय में ताला लगा दिया गया। भाजपा के राज्य कार्यालय में भारी तोड़फोड़ की गई। कई लोग जो अपने सुप्रीमो की चमचागिरी में उन्हें भगवान कहा करते थे, टिकट नहीं मिलने पर वही लोग सुप्रीमो को सार्वजनिक रूप से राक्षस की संज्ञा देने लगे। ऐसे मनोरंजक किंतु शर्मनाक दृश्य देख कर लोगबाग क्षुब्ध हैं।
राजनीति में इन अभूतपूर्व गिरावटों के कई कारण रहे। कई मामलों में वाजिब उम्मीदवारों के बदले अन्य गैर राजनीतिक कारणों से अयोग्य व अपात्र लोगों को विभिन्न दलों ने टिकट दिये। दूसरी महत्वपूर्ण बात देखी गई कि अपवादों को छोड़कर राजनीति अब पूरी तरह व्यापार बन चुकी है। सैकड़ों टिकटार्थी जिस तरह के आलीशान वाहनों में सवार होकर जितनी कीमती पोशाक में पटना आ रहे हैं, राजनीतिक दलों के दफ्तरों के आसपास उन्हें देख कर लगता है कि टिकट नहीं बल्कि किसी थोक व्यापार की एजेंसी लेने आये हैं।
टिकट धर्मा, टिकट कर्मा, धर्मा-कर्मा टिकट-टिकट की रणनीति में विश्वास रखने वाले महत्वाकांक्षी टिकटार्थियों ने पिछले कुछ सप्ताहों में टिकट के लिए जितने बड़े पैमाने पर इस बार दल बदल किया है, और अब भी कर रहे हैं, वह अपने आप में एक रिकार्ड है।
चुनाव के मौके अनेक नेताओं और कार्यकर्त्ताओं के असली चेहरे उजागर कर देते हैं। बिहार में इस बार कुछ अधिक ही हो रहा है। नेता एक दल में सांसद है और उनके परिजन दूसरे दल में टिकट पा रहे हैं। ऐसा एक नहीं, बल्कि अनेक नेताओं के मामलों में हो रहा है। गत चुनावों में परिवारवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने वाले एनडीए ने इस बार परिवारवाद के सामने घुटने टेक दिये हैं। राजनीति में परिवारवाद बहुत पहले से है, पर परिवारवाद का ऐसा विस्तार पहले कभी नहीं देखा गया।
राम विलास पासवान के चार रिश्तेदार राजद-लोजपा गठबंधन की ओर से इस बार विधान सभा का चुनाव लड़ रहे हैं। हां, राजद के सांसद जगदानंद अपवाद के रूप में जरूर उभरे हैं। उनके पुत्र सुधाकर सिंह ने सांसद पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर टिकट के लिए भाजपा की सदस्यता स्वीकार कर ली। पर वे अपने पुत्र को राजनीति में लाने के खिलाफ रहे हैं। बाद में जगदानंद ने कहा कि मैं राम गढ़ विधान सभा क्षेत्र में अपने दल राजद के ही उम्मीदवार के पक्ष में ही काम करूंगा। भाजपा-जदयू गठबंधन ने सुधाकर को राम गढ़ से उम्मीदवार बनाया है जहां से कभी जगदानंद विधायक हुआ करते थे। अभी वहां से राजद के अम्बिका यादव विधायक हैं।
इस बार जितनी बड़ी संख्या में पूर्व सांसदगण विभिन्न दलों के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं, उतनी संख्या में एक साथ पहले कभी नहीं लड़े थे। किसी न किसी सदन में जल्द से जल्द पहुंचने की आतुरता ने ऐसी स्थिति ला दी है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार जब राजनीति का सबकुछ आम तौर पर सदन की सदस्यता व मंत्रीपद की ऐन केन प्रकारेण प्राप्ति ही बन जाए तो फिर और क्या होगा?
अपने या अपने परिजन के लिए एक चुनावी टिकट की तलाश में कई छोटे-बड़े नेताओं को इन दिनों न जाने कहां-कहां गुहार लगाते देखा गया। जहां उन्हें नहीं जाना चाहिए, वहां भी गये और जा रहे हैं। विभिन्न जेलों में बंद बाहुबलियों से भी वोट और टिकट के लिए सहयोग मांगे जा रहे हैं। माफियाओं और डॉन लोगों से बड़े-बड़े नेतागण गुप्त मुलाकातें कर रहे हैं। राजनीति में पतन की पराकाष्ठा और क्या है? कहां तक है? यह अभी तय नहीं हुआ है।
टिकट के लिए साले, बहनोई से विद्रोह कर रहे हैं और बेटा, बाप से। कई पुत्रों ने तो अपने अनिच्छुक पिता को भी पैरवीकार बनने के लिए बाध्य कर दिया ताकि वे उसके लिए जैसे भी हो, टिकट का जुगाड़ करें। कुछ सांसदों ने अपना बुढ़ापा कष्टमय होने से बचाने के लिए पुत्र के टिकट के लिए भरसक प्रयास किया भी। जदयू के कई सांसदों ने परिवारवाद पर अपने दल की नीति को बदलने के लिए नेतृत्व को इस बार बाध्य ही कर दिया। अब परिवारवाद के मामले में जदयू एक कदम पीछे और दो कदम आगे की रणनीति पर चल रहा है। पिछले चुनावों में जदयू ने और उसकी देखा-देखी भाजपा ने भी किसी नेता के परिजन को टिकट नहीं दिया था। पर इस बार राजग को अपनी यह नीति छोड़नी पड़ी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पर कहा कि हमारी परिवारवाद विरोधी नीति को गत चुनाव में मतदाताओं का पूर्ण समर्थन नहीं मिला था। इसलिए हमें उस नीति को छोड़ना पड़ रहा है।
दरअसल गत साल के बटाईदारी विवाद को लेकर प्रतिपक्ष द्वारा राज्य सरकार व राजग के खिलाफ अब भी चलाये जा रहे अफवाह- अभियान से दबाव महसूस कर रहे राजग ने अन्य तरह के कुछ समझौतों के जरिए उसकी क्षतिपूर्ति की कोशिश की है।
इस चुनाव के अवसर पर राजनीति में व्याप्त भारी टिकटलोलुपता व सत्तालोलुपता को देखकर बिहार के राजनीतिक व प्रशासनिक भविष्य को लेकर अनेक लोगों को चिंता हो रही है। विधायक फंड ने इसे भारी लाभदायक पेशा बना दिया है। जाहिर है कि ऐसे ही लोलुप नेतागण सत्ता व शक्ति प्राप्त करके निजी धनोपार्जन कार्य में तुरंत लग जाते हैं जो आम जनता के विकास में बाधक होता है। वे सरकारी लाभ को आम गरीब लोगों तक नहीं पहुंचने देते। इससे गरीबी और विषमता बढ़ती है। परिणामस्वरूप नक्सली तथा दूसरे अराजक व देशद्रोही तत्वों को बल मिल जाता है। भ्रष्ट, स्वार्थी और टिकट लोलुप लोग तर्क देते हैं कि क्या कीजिएगा, जमाना ही बदल गया है। पर इस जमाने को और भी अधिक गिरावट की ओर बदलने में आपका कितना योगदान हो रहा है, यह बात वे नहीं बताते। वे इस बात पर भी कोई टिप्पणी नहीं करते कि टिकटलोलुपों के ऐसे व्यवहार के कारण ही वंचित लोगों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अनास्था बढती है। इस अनास्था का लाभ अराजक व देशद्रोही तत्व उठा रहे हैं।
कहा जा रहा है कि ऐसे टिकटलोलुप व स्वार्थी लोगों को सत्ता या ताकत के पद तक पहुंचने से मतदान के जरिए ही जनता ही रोक सकती है। वह अवसर आ गया है। इस बार चूक जाने पर काफी देर हो चुकी होगी। इसलिए भरसक बेहतर उम्मीदवारों का चुनाव जरूरी है।
हालांकि विद्रोह पर उतारू ऐसे लोगों में सब गलत तत्व ही नहीं हैं। उनमें से कुछ वास्तविक राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं ने आरोप लगाया कि नेतत्व ने गैर राजनीतिक कारणों से विवादास्पद तत्वों को टिकट दे दिये। कहा जा रहा है कि कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों द्वारा टिकट वितरण में किसी तरह के मापदंड नहीं अपनाये जाने के कारण भी इस तरह के अराजक तत्वों को अपना कौशल दिखाने का साहस हो रहा है। चुनाव अभियान के दौरान ऐसे लोग कैसी करामात दिखाएंगे, इसको लेकर अटकलों का बाजार गर्म है।
टिकटों का फैसला करके प्रदेश कांग्रेस के नेता जब 2 अक्तूबर को दिल्ली से लौटे तो पटना हवाई अड्डे पर बेटिकट हुए कांग्रेसियों की उग्र भीड़ ने चौधरी महबूब अली कैसर और डा. अशोक राम के साथ धक्कम धुक्की की। उन्हें अपमानित किया। उनकी गाड़ी के शीशे तोड़ डाले और अश्लील नारे लगाये। कैसर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और डा.राम कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं। ऐसा पहली बार हुआ।
बेटिकट हुए लोगों की भीड़ के सामने आने से महाबली लालू प्रसाद भी कतराते रहे। इस संबंध में लालू प्रसाद ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रंस में स्वीकार किया कि मैं टिकटार्थियों के साथ सात दिनों तक लुकाछिपी का खेल खलता रहा। टिकटार्थी डाल-डाल तो मैं पात पात रहता था। जदयू के राज्य कार्यालय में रोष पूर्ण प्रदर्शन के कारण पार्टी पदाधिकारियों ने कार्यालय जाना छोड़ दिया और कार्यालय में ताला लगा दिया गया। भाजपा के राज्य कार्यालय में भारी तोड़फोड़ की गई। कई लोग जो अपने सुप्रीमो की चमचागिरी में उन्हें भगवान कहा करते थे, टिकट नहीं मिलने पर वही लोग सुप्रीमो को सार्वजनिक रूप से राक्षस की संज्ञा देने लगे। ऐसे मनोरंजक किंतु शर्मनाक दृश्य देख कर लोगबाग क्षुब्ध हैं।
राजनीति में इन अभूतपूर्व गिरावटों के कई कारण रहे। कई मामलों में वाजिब उम्मीदवारों के बदले अन्य गैर राजनीतिक कारणों से अयोग्य व अपात्र लोगों को विभिन्न दलों ने टिकट दिये। दूसरी महत्वपूर्ण बात देखी गई कि अपवादों को छोड़कर राजनीति अब पूरी तरह व्यापार बन चुकी है। सैकड़ों टिकटार्थी जिस तरह के आलीशान वाहनों में सवार होकर जितनी कीमती पोशाक में पटना आ रहे हैं, राजनीतिक दलों के दफ्तरों के आसपास उन्हें देख कर लगता है कि टिकट नहीं बल्कि किसी थोक व्यापार की एजेंसी लेने आये हैं।
टिकट धर्मा, टिकट कर्मा, धर्मा-कर्मा टिकट-टिकट की रणनीति में विश्वास रखने वाले महत्वाकांक्षी टिकटार्थियों ने पिछले कुछ सप्ताहों में टिकट के लिए जितने बड़े पैमाने पर इस बार दल बदल किया है, और अब भी कर रहे हैं, वह अपने आप में एक रिकार्ड है।
चुनाव के मौके अनेक नेताओं और कार्यकर्त्ताओं के असली चेहरे उजागर कर देते हैं। बिहार में इस बार कुछ अधिक ही हो रहा है। नेता एक दल में सांसद है और उनके परिजन दूसरे दल में टिकट पा रहे हैं। ऐसा एक नहीं, बल्कि अनेक नेताओं के मामलों में हो रहा है। गत चुनावों में परिवारवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने वाले एनडीए ने इस बार परिवारवाद के सामने घुटने टेक दिये हैं। राजनीति में परिवारवाद बहुत पहले से है, पर परिवारवाद का ऐसा विस्तार पहले कभी नहीं देखा गया।
राम विलास पासवान के चार रिश्तेदार राजद-लोजपा गठबंधन की ओर से इस बार विधान सभा का चुनाव लड़ रहे हैं। हां, राजद के सांसद जगदानंद अपवाद के रूप में जरूर उभरे हैं। उनके पुत्र सुधाकर सिंह ने सांसद पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर टिकट के लिए भाजपा की सदस्यता स्वीकार कर ली। पर वे अपने पुत्र को राजनीति में लाने के खिलाफ रहे हैं। बाद में जगदानंद ने कहा कि मैं राम गढ़ विधान सभा क्षेत्र में अपने दल राजद के ही उम्मीदवार के पक्ष में ही काम करूंगा। भाजपा-जदयू गठबंधन ने सुधाकर को राम गढ़ से उम्मीदवार बनाया है जहां से कभी जगदानंद विधायक हुआ करते थे। अभी वहां से राजद के अम्बिका यादव विधायक हैं।
इस बार जितनी बड़ी संख्या में पूर्व सांसदगण विभिन्न दलों के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं, उतनी संख्या में एक साथ पहले कभी नहीं लड़े थे। किसी न किसी सदन में जल्द से जल्द पहुंचने की आतुरता ने ऐसी स्थिति ला दी है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार जब राजनीति का सबकुछ आम तौर पर सदन की सदस्यता व मंत्रीपद की ऐन केन प्रकारेण प्राप्ति ही बन जाए तो फिर और क्या होगा?
अपने या अपने परिजन के लिए एक चुनावी टिकट की तलाश में कई छोटे-बड़े नेताओं को इन दिनों न जाने कहां-कहां गुहार लगाते देखा गया। जहां उन्हें नहीं जाना चाहिए, वहां भी गये और जा रहे हैं। विभिन्न जेलों में बंद बाहुबलियों से भी वोट और टिकट के लिए सहयोग मांगे जा रहे हैं। माफियाओं और डॉन लोगों से बड़े-बड़े नेतागण गुप्त मुलाकातें कर रहे हैं। राजनीति में पतन की पराकाष्ठा और क्या है? कहां तक है? यह अभी तय नहीं हुआ है।
टिकट के लिए साले, बहनोई से विद्रोह कर रहे हैं और बेटा, बाप से। कई पुत्रों ने तो अपने अनिच्छुक पिता को भी पैरवीकार बनने के लिए बाध्य कर दिया ताकि वे उसके लिए जैसे भी हो, टिकट का जुगाड़ करें। कुछ सांसदों ने अपना बुढ़ापा कष्टमय होने से बचाने के लिए पुत्र के टिकट के लिए भरसक प्रयास किया भी। जदयू के कई सांसदों ने परिवारवाद पर अपने दल की नीति को बदलने के लिए नेतृत्व को इस बार बाध्य ही कर दिया। अब परिवारवाद के मामले में जदयू एक कदम पीछे और दो कदम आगे की रणनीति पर चल रहा है। पिछले चुनावों में जदयू ने और उसकी देखा-देखी भाजपा ने भी किसी नेता के परिजन को टिकट नहीं दिया था। पर इस बार राजग को अपनी यह नीति छोड़नी पड़ी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पर कहा कि हमारी परिवारवाद विरोधी नीति को गत चुनाव में मतदाताओं का पूर्ण समर्थन नहीं मिला था। इसलिए हमें उस नीति को छोड़ना पड़ रहा है।
दरअसल गत साल के बटाईदारी विवाद को लेकर प्रतिपक्ष द्वारा राज्य सरकार व राजग के खिलाफ अब भी चलाये जा रहे अफवाह- अभियान से दबाव महसूस कर रहे राजग ने अन्य तरह के कुछ समझौतों के जरिए उसकी क्षतिपूर्ति की कोशिश की है।
इस चुनाव के अवसर पर राजनीति में व्याप्त भारी टिकटलोलुपता व सत्तालोलुपता को देखकर बिहार के राजनीतिक व प्रशासनिक भविष्य को लेकर अनेक लोगों को चिंता हो रही है। विधायक फंड ने इसे भारी लाभदायक पेशा बना दिया है। जाहिर है कि ऐसे ही लोलुप नेतागण सत्ता व शक्ति प्राप्त करके निजी धनोपार्जन कार्य में तुरंत लग जाते हैं जो आम जनता के विकास में बाधक होता है। वे सरकारी लाभ को आम गरीब लोगों तक नहीं पहुंचने देते। इससे गरीबी और विषमता बढ़ती है। परिणामस्वरूप नक्सली तथा दूसरे अराजक व देशद्रोही तत्वों को बल मिल जाता है। भ्रष्ट, स्वार्थी और टिकट लोलुप लोग तर्क देते हैं कि क्या कीजिएगा, जमाना ही बदल गया है। पर इस जमाने को और भी अधिक गिरावट की ओर बदलने में आपका कितना योगदान हो रहा है, यह बात वे नहीं बताते। वे इस बात पर भी कोई टिप्पणी नहीं करते कि टिकटलोलुपों के ऐसे व्यवहार के कारण ही वंचित लोगों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अनास्था बढती है। इस अनास्था का लाभ अराजक व देशद्रोही तत्व उठा रहे हैं।
कहा जा रहा है कि ऐसे टिकटलोलुप व स्वार्थी लोगों को सत्ता या ताकत के पद तक पहुंचने से मतदान के जरिए ही जनता ही रोक सकती है। वह अवसर आ गया है। इस बार चूक जाने पर काफी देर हो चुकी होगी। इसलिए भरसक बेहतर उम्मीदवारों का चुनाव जरूरी है।
परिवार,पार्टी और जागीर
सन 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए दस राज्यों की कांग्रेस कमेटियों ने महात्मा गांधी के नाम का प्रस्ताव किया।पांच राज्यों ने सरदार पटेल और तीन राज्यों ने जवाहर लाल नेहरू के नाम प्रस्तावित किये ।
महात्मा गांधी अध्यक्ष चुन लिये गये। पर उन्होंने यह पद अस्वीकार कर दिया। मोतीलाल नेहरू तब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि यदि गांधी जी यह पद स्वीकार नहीं करते हैं तो यह पद जवाहर लाल को ही मिलना चाहिए। नियम के अनुसार दूसरी वरीयता के आधार पर सरदार पटेल अध्यक्ष बनते । पर सरदार पटेल ने खुद ही अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया। इसके बाद मोती लाल नेहरू ने लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता का भार अपने पुत्र यानी जवाहर लाल के कंधे पर डाल दिया। जब जवाहर लाल नेहरू अध्यक्ष बने तो कांग्रेस के सम्मेलन मंच पर खुशी में मोती लाल नेहरू ने पंजाबी लुंगी पहन कर डांस किया था। यह सब देख कर कई लोग अचंभित थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि चूंकि गांधी जी इस बात के पक्ष में नहीं थे, इसलिए उन्होंने जवाहर लाल के नाम का प्रस्ताव तक नहीं किया जबकि उन्होंने खुद उससे पहले अन्य अवसरों पर सरोजनी नायडु और डा.अंसारी के नाम का प्रस्ताव किया था।
इससे पहले महात्मा गांधी मोतीलाल नेहरू को यह लिख चुके थे कि मैं जवाहर लाल नेहरू को अभी अध्यक्ष पद के योग्य नहीं मानता। मोतीलाल नेहरू को गांधी जी ने 26 अगस्त 1927 को लिखा था कि मैं अभी तक जवाहर लाल के निर्वाचन के पक्ष में नहीं हूं। मोतीलाल नेहरू पत्र और तार के जरिए लगातार उनसे जवाहर लाल को यह पद देने का आग्रह करते रहे थे। ऐसा नहीं कि गांधी जी 1929 में इस पक्ष में हो गये थे। पर वे ऐसा होने से रोक भी नहीं सके।
अब आजादी के बाद की कहानी सुनिए। कुलदीप नायर को लाल बहादुर शास्त्री ने कभी बताया था कि जवाहर लाल जी के मन में उनकी बिटिया है। इस संबंध में श्री नायर का एक अप्रैल 2009 को एक अखबार में लेख छपा । नायर के अनुसार,‘लाल बहादुर शास्त्री ने मुझे बताया था कि नेहरू के मन में हमेशा इंदिरा को आगे लाने की बात रहती थी।’ जवाहर लाल नेहरू किसे अपना उत्ताधिकारी बनाना चाहते थे,यह बात 1958 और 1959 में ही देश और कांग्रेस के सामने साफ हो गई थी । इंदिरा गांधी सन 1958 में कांग्रेस कार्य समिति की सदस्य बना दी गईं।उस समय उनकी उम्र मात्र 41 साल थी। याद करिए कि उन दिनों अनेक दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी कांग्रेस में मौजूद थे जिनके वाजिब हक को नजरअंदाज करके इंदिरा गांधी को यह महत्वपूर्ण पद दिया गया था। यह परिवारवाद के अलावा और क्या था ? सन 1959 में तो हद हो गई जब इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष ही बन गई। याद रहे कि यह सब जवाहर लाल जी के जीवन काल में ही हुआ। नेहरू का निधन 1964 में हुआ।
जब मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू परिवार वाद को आगे बढ़ाने पर अमादा थे तो बाद के नेहरूवंशियों के बारे में क्या कहना ? नतीजा है कि अब तक नेहरू-इंदिरा वंश के चार सदस्य कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके है। राहुल गांधी लाइन में हैं। ऐसा दुनिया के किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में नहीं हुआ है कि एक ही खानदान सबसे लंबे समय तक न केवल प्रधान मंत्री पद पर रहे बल्कि पार्टी के अध्यक्ष पद पर भी।
मोती लाल नेहरू,जवाहर लाल नेहरू,इंदिरा गांधी,राजीव गांधी और सोनिया गांधी का अध्यक्ष पर मिला जुला कार्यकाल करीब एक चौथाई सदी का रहा।अभी तो यह सिलसिला जारी ही है।
यह गहन शोध का विषय है कि लोकतंत्र में कोई एक खानदान इतने अधिक वर्षों तक सत्ता में कैसे रह पा रहा है। क्या लोकतंत्र में कोई खोट है ?क्या प्रतिपक्षी दल में जान नहीं है।क्या देश का राजनीतिक नेतृत्व दिवालिया है ?क्या भारत के अधिकतर लोग किसी न किसी रूप में राजतंत्र या फिर खानदान तंत्र को ही पसंद करते हैं ?
अब जरा उस कहानी को एक बार फिर याद कर लिया जाए जिसमें नेहरू का पुत्री -प्रेम जागृत हुआ था।
इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का विरोध करते हुए मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व गांधी जी के सहकर्मी महावीर त्यागी ने 31 जनवरी 1959 को तत्कालीन प्रधान मत्री जवाहर लाल नेहरू को लिखा कि मेरी राय है कि इंदु को कांग्रेस प्रधान चुने जाने से रोको या फिर आप प्रधान मंत्री पद से अलग होकर इंदु की मार्फत कांग्रेस संगठन को मजबूत कर लो। आपके दरबारियों ने केवल निजी स्वार्थवश आपके चारों ओर खुशामद के इतने घनघोर बादल घेर लिये हैं कि आपकी दृष्टि धुंधला गई है। अब समय आ गया है कि आप इन चरण चुम्बकों से सचेत हो जाओ अन्यथा आपकी मान मर्यादा,सरकार और पार्टी सबका ह्रास होने वाला है।
संविधान सभा के सदस्य व कंद्रीय मंत्री रह चुके स्पष्टवादी त्यागी जी ने लिखा कि जैसे मुगलों के जमाने में मंत्रिगण नवाबों के बच्चों को खिलाया करते थे,आज उसी तरह आपकी आरती उतारी जा रही है।आपके इन भक्तों ने इसी प्रकार आपकी भोली भाली इंदु का नाम कांग्रेस प्रधान के पद के लिए पेश किया है और शायद आपने आंख बंद कर इसे स्वीकार भी कर लिया है। इंदु मेरी बेटी के समान है। उसका नाम बढ़े,मान बढ़े इसकी मुझे खुशी है। पर इसके कारण आप पर कोई हर्ज आवे सो मुझे स्वीकार नहीं है। इंदु को अध्यक्ष बनाने का प्रयास सिर्फ आपको खुश करने के लिए किया जा रहा है। इतनी छोटी बात यदि आप नहीं समझ सकते तो मैं कहूंगा कि आपकी आंखों पर परदे पड़ गये, परदे।’
तब की ही सरकार में पनप रहे भ्रष्टाचार के बारे में महावीर त्यागी ने नेहरू को लिखा था कि ‘आज जबकि शासन का ढांचा ढीला पड़ चुका है,रिश्वत और चोरबाजारी का बोलबाला है,साथियों में वह काटा वह मारा वाले पतंगबाजी के नारे लग रहे हैं,जबकि अधिकांश नेतागण मिनिस्ट्री , लोक सभा और विधान सभा की मेम्बरी कर रहे हैं,और केवल चार आने वाले सदस्य मंडलों में रह गये हों,ऐसे जर्जरित कांग्रेस के ढांचे को बेचारी इंदु कैसे संभाल सकेगी ?’
महावीर त्यागी को प्रधान मंत्री ने जवाब देते हुए लिखा कि इंदु को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना ठीक होगा। त्यागी और नेहरू के पत्र की फोटोकापी महावीर त्यागी की उस चर्चित पुस्तक में छपी हैं जिसका नाम है ‘ आजादी का आंदोलन हंसते हुए आंसू।’ जवाहर लाल नेहरू ने महावीर त्यागी को एक फरवरी 1959 को लिखा कि ‘तुमने जो इंदिरा के बारे में लिखा है,उन पहलुओं पर मैंने काफी गौर किया है। मेरा खयाल है कि बहुत तरह से उसका इस वक्त कांग्रेस का अध्यक्ष बनना मुफीद भी हो सकता है। (आजादी का आंदोलन:हंसते हुए आंसू-पेज-229 /)
अब जिनके जीवन काल में उनकी बिटिया कांग्रेस अध्यक्ष बन गई,उनके निधन के बाद उन्हें प्रधान मंत्री ही बनना है,ऐसा संकेत जवाहर लाल जी अपने प्रशंसकों के लिए छोड़ गये। स्वाभाविक है कि खुद गददी से उतर कर इंदिरा को तो नेहरू जी बैठा नहीं सकते थे या फिर बैठाना नहीं चाहते होंगे। याद रहे कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद उन दिनों का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद हुआ करता था।
1964 में नेहरू के निधन के तत्काल बाद ही इंदिरा गांधी को क्यों नहीं प्रधान मंत्री बनाया गया,इस बात का पता नहीं चल सका। पर जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधान मंत्री बने तो इंदिरा गाधी को सूचना व प्रसारण मंत्री जरूर बना दिया गया था। इंदिरा जी की ओर से यह शिकायत शास्त्री जी तक जरूर पहुंचती रही कि प्रधान मंत्री देश को चलाने में इंदिरा जी का सलाह नहीं लेते। महत्वाकांक्षा तो देखिए ! इस बीच 1966 में रहस्यमय परिस्थितियों में ताशकंद में शास्त्री जी की मौत हो गई। इसके बाद कांग्रेस के भीतर और बाहर के नेहरू के खास प्रशंसकों और कांग्रेस के भीतर की लॉबी ने इंदिरा जी को प्रधान मंत्री बनवा ही दिया।
इस लॉबी ने इसलिए बनवाया ताकि वे गूंगी गुड़िया से जो चाहें करा सकें। मोरारजी देसाई से ऐसा वे नहीं करा सकते थे।1966 में हुए कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के चुनाव में इंदिरा गांधी को 355 और मोरार जी देसाई को 169 मत मिले थे।जब इंदिरा जी प्रधान मंत्री बनी थीं तो कुछ बड़े प्रतिपक्षी नेताओं ने उन्हें गूंगी गुड़िया ही नाम दिया था ।
पर कुछ समय बीतते-बीतते कांग्रेस की वह खास लॉबी इंदिरा के खिलाफ हो गयी। क्योंकि इंदिरा जी के सलाहकारों की एक नई मंडली बन गई। अंततः सन 1969 में कांग्रेस का विभाजन ही हो गया। सिंडिकेट के अधिकतर नेता संगठन कांग्रेस में शामिल हो गये। इंदिरा जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस का नाम पड़ा इंदिरा कांग्रेस।इंदिरा जी ने यदि सरकार व राजनीति के क्षेत्र में जनहित और गरीबहित में काम किया होता तो परिवारवाद को लोगबाग बुरा नहीं मानते। पर अपनी ताकत बढ़ाने के लिए उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा जरूर दिया। पर 1971 में जब बड़े बहुमत से सत्ता में आ गई तो वह मारूति का कारखाना खोलवा कर अपने पुत्र संजय गांधी की अमीरी बढ़ाने के काम में लग गई ।
इंदिरा गांधी ने सरकारी भ्रष्टाचार का बचाव करते हुए सार्वजनिक रूप से यह कह दिया था कि यह तो विश्वव्यापी है। इस बयान से भी देश में भ्रष्टाचार बढ़ा और गरीबों तक सरकारी धन और कम पहुंचने लगे।इसी के बारे में राजीव गांधी ने 1985 में यह स्वीकार किया था कि दिल्ली से सौ पैसे चलते हैं और जनता तक उसमें से मात्र 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। देश में ऐसी स्थिति लाने के लिए आखिर कौन जिम्मेदार थे ?आजादी के बाद लाल बहादुर शास्त्री के दो साल से भी कम समय का शासन काल को छोड़ दिया जाए तो नेहरू परिवार ही तो जिम्मेदार था। पर इसके बावजूद परिवारवाद को आगे भी बढ़ाया जा रहा है। इस बीमारी ने तो अब अन्य दलों में भी प्रवेश करके माहमारी का रूप ग्रहण कर लिया है।
आजादी के 63 साल में से 37 साल तक नेहरू परिवार के सदस्य ही प्रधान मंत्री रहे।2004 से अब तक सोनिया गांधी का परोक्ष शासन इस देश पर चल रहा है। इस बीच इंदिरा गांधी ने कुछ समय तक चरण सिंह की सरकार चलवाई और राजीव गांधी ने चंद्रशेखर की सरकार ।यदि आज देश की हालत यह हो चुकी है कि यहां के 77 प्रतिशत लोगों की रोज की औसत आय मात्र 20 रुपये है तो इस गरीबी के लिए नेहरू-इंदिरा परिवार कितना जिम्मेदार है और अन्य लोग कितना ,इस पर चर्चा होती रहती है।
ऐसा नहीं है कि इस देश के पास साधन नहीं है। पर जो भी साधन है उसे मुटठी भर लोग लूट रहे हैं और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। इसके लिए भी कौन जिम्मेदार है ? इसके लिए परिवारवाद कितना जिम्मेदार है ?क्या परिवारवाद के नाम पर अयोग्य नेतृत्व को देश पर थोपे जाने के कारण ही देश की ऐसी दुर्दशा हो रही है ? यह गहन जांच का विषय है।
1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधान मंत्री बना दिया गया जिन्हें सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। उसका नतीजा भी देश ने भुगता। अब सोनिया गांधी कांग्रेस को प्रत्यक्ष और सरकार को परोक्ष रूप से चला रही हैं।जिस एक ही परिवार के सदस्य बारी बारी से 35 वर्षों तक प्रधान मंत्री और 25 वर्षों तक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहे ,उसे इस देश की सफलता या विफलता के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाएगा तो किसे माना जाएगा ? देश की आज जो विकट आर्थिक,राजनीतिक और सामरिक स्थिति है,क्या उसके लिए परिवारवाद को जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए ?/
पाक्षिक पत्रिका पब्लिक एजेंडा से साभार/
महात्मा गांधी अध्यक्ष चुन लिये गये। पर उन्होंने यह पद अस्वीकार कर दिया। मोतीलाल नेहरू तब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि यदि गांधी जी यह पद स्वीकार नहीं करते हैं तो यह पद जवाहर लाल को ही मिलना चाहिए। नियम के अनुसार दूसरी वरीयता के आधार पर सरदार पटेल अध्यक्ष बनते । पर सरदार पटेल ने खुद ही अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया। इसके बाद मोती लाल नेहरू ने लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता का भार अपने पुत्र यानी जवाहर लाल के कंधे पर डाल दिया। जब जवाहर लाल नेहरू अध्यक्ष बने तो कांग्रेस के सम्मेलन मंच पर खुशी में मोती लाल नेहरू ने पंजाबी लुंगी पहन कर डांस किया था। यह सब देख कर कई लोग अचंभित थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि चूंकि गांधी जी इस बात के पक्ष में नहीं थे, इसलिए उन्होंने जवाहर लाल के नाम का प्रस्ताव तक नहीं किया जबकि उन्होंने खुद उससे पहले अन्य अवसरों पर सरोजनी नायडु और डा.अंसारी के नाम का प्रस्ताव किया था।
इससे पहले महात्मा गांधी मोतीलाल नेहरू को यह लिख चुके थे कि मैं जवाहर लाल नेहरू को अभी अध्यक्ष पद के योग्य नहीं मानता। मोतीलाल नेहरू को गांधी जी ने 26 अगस्त 1927 को लिखा था कि मैं अभी तक जवाहर लाल के निर्वाचन के पक्ष में नहीं हूं। मोतीलाल नेहरू पत्र और तार के जरिए लगातार उनसे जवाहर लाल को यह पद देने का आग्रह करते रहे थे। ऐसा नहीं कि गांधी जी 1929 में इस पक्ष में हो गये थे। पर वे ऐसा होने से रोक भी नहीं सके।
अब आजादी के बाद की कहानी सुनिए। कुलदीप नायर को लाल बहादुर शास्त्री ने कभी बताया था कि जवाहर लाल जी के मन में उनकी बिटिया है। इस संबंध में श्री नायर का एक अप्रैल 2009 को एक अखबार में लेख छपा । नायर के अनुसार,‘लाल बहादुर शास्त्री ने मुझे बताया था कि नेहरू के मन में हमेशा इंदिरा को आगे लाने की बात रहती थी।’ जवाहर लाल नेहरू किसे अपना उत्ताधिकारी बनाना चाहते थे,यह बात 1958 और 1959 में ही देश और कांग्रेस के सामने साफ हो गई थी । इंदिरा गांधी सन 1958 में कांग्रेस कार्य समिति की सदस्य बना दी गईं।उस समय उनकी उम्र मात्र 41 साल थी। याद करिए कि उन दिनों अनेक दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी कांग्रेस में मौजूद थे जिनके वाजिब हक को नजरअंदाज करके इंदिरा गांधी को यह महत्वपूर्ण पद दिया गया था। यह परिवारवाद के अलावा और क्या था ? सन 1959 में तो हद हो गई जब इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष ही बन गई। याद रहे कि यह सब जवाहर लाल जी के जीवन काल में ही हुआ। नेहरू का निधन 1964 में हुआ।
जब मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू परिवार वाद को आगे बढ़ाने पर अमादा थे तो बाद के नेहरूवंशियों के बारे में क्या कहना ? नतीजा है कि अब तक नेहरू-इंदिरा वंश के चार सदस्य कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके है। राहुल गांधी लाइन में हैं। ऐसा दुनिया के किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में नहीं हुआ है कि एक ही खानदान सबसे लंबे समय तक न केवल प्रधान मंत्री पद पर रहे बल्कि पार्टी के अध्यक्ष पद पर भी।
मोती लाल नेहरू,जवाहर लाल नेहरू,इंदिरा गांधी,राजीव गांधी और सोनिया गांधी का अध्यक्ष पर मिला जुला कार्यकाल करीब एक चौथाई सदी का रहा।अभी तो यह सिलसिला जारी ही है।
यह गहन शोध का विषय है कि लोकतंत्र में कोई एक खानदान इतने अधिक वर्षों तक सत्ता में कैसे रह पा रहा है। क्या लोकतंत्र में कोई खोट है ?क्या प्रतिपक्षी दल में जान नहीं है।क्या देश का राजनीतिक नेतृत्व दिवालिया है ?क्या भारत के अधिकतर लोग किसी न किसी रूप में राजतंत्र या फिर खानदान तंत्र को ही पसंद करते हैं ?
अब जरा उस कहानी को एक बार फिर याद कर लिया जाए जिसमें नेहरू का पुत्री -प्रेम जागृत हुआ था।
इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का विरोध करते हुए मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व गांधी जी के सहकर्मी महावीर त्यागी ने 31 जनवरी 1959 को तत्कालीन प्रधान मत्री जवाहर लाल नेहरू को लिखा कि मेरी राय है कि इंदु को कांग्रेस प्रधान चुने जाने से रोको या फिर आप प्रधान मंत्री पद से अलग होकर इंदु की मार्फत कांग्रेस संगठन को मजबूत कर लो। आपके दरबारियों ने केवल निजी स्वार्थवश आपके चारों ओर खुशामद के इतने घनघोर बादल घेर लिये हैं कि आपकी दृष्टि धुंधला गई है। अब समय आ गया है कि आप इन चरण चुम्बकों से सचेत हो जाओ अन्यथा आपकी मान मर्यादा,सरकार और पार्टी सबका ह्रास होने वाला है।
संविधान सभा के सदस्य व कंद्रीय मंत्री रह चुके स्पष्टवादी त्यागी जी ने लिखा कि जैसे मुगलों के जमाने में मंत्रिगण नवाबों के बच्चों को खिलाया करते थे,आज उसी तरह आपकी आरती उतारी जा रही है।आपके इन भक्तों ने इसी प्रकार आपकी भोली भाली इंदु का नाम कांग्रेस प्रधान के पद के लिए पेश किया है और शायद आपने आंख बंद कर इसे स्वीकार भी कर लिया है। इंदु मेरी बेटी के समान है। उसका नाम बढ़े,मान बढ़े इसकी मुझे खुशी है। पर इसके कारण आप पर कोई हर्ज आवे सो मुझे स्वीकार नहीं है। इंदु को अध्यक्ष बनाने का प्रयास सिर्फ आपको खुश करने के लिए किया जा रहा है। इतनी छोटी बात यदि आप नहीं समझ सकते तो मैं कहूंगा कि आपकी आंखों पर परदे पड़ गये, परदे।’
तब की ही सरकार में पनप रहे भ्रष्टाचार के बारे में महावीर त्यागी ने नेहरू को लिखा था कि ‘आज जबकि शासन का ढांचा ढीला पड़ चुका है,रिश्वत और चोरबाजारी का बोलबाला है,साथियों में वह काटा वह मारा वाले पतंगबाजी के नारे लग रहे हैं,जबकि अधिकांश नेतागण मिनिस्ट्री , लोक सभा और विधान सभा की मेम्बरी कर रहे हैं,और केवल चार आने वाले सदस्य मंडलों में रह गये हों,ऐसे जर्जरित कांग्रेस के ढांचे को बेचारी इंदु कैसे संभाल सकेगी ?’
महावीर त्यागी को प्रधान मंत्री ने जवाब देते हुए लिखा कि इंदु को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना ठीक होगा। त्यागी और नेहरू के पत्र की फोटोकापी महावीर त्यागी की उस चर्चित पुस्तक में छपी हैं जिसका नाम है ‘ आजादी का आंदोलन हंसते हुए आंसू।’ जवाहर लाल नेहरू ने महावीर त्यागी को एक फरवरी 1959 को लिखा कि ‘तुमने जो इंदिरा के बारे में लिखा है,उन पहलुओं पर मैंने काफी गौर किया है। मेरा खयाल है कि बहुत तरह से उसका इस वक्त कांग्रेस का अध्यक्ष बनना मुफीद भी हो सकता है। (आजादी का आंदोलन:हंसते हुए आंसू-पेज-229 /)
अब जिनके जीवन काल में उनकी बिटिया कांग्रेस अध्यक्ष बन गई,उनके निधन के बाद उन्हें प्रधान मंत्री ही बनना है,ऐसा संकेत जवाहर लाल जी अपने प्रशंसकों के लिए छोड़ गये। स्वाभाविक है कि खुद गददी से उतर कर इंदिरा को तो नेहरू जी बैठा नहीं सकते थे या फिर बैठाना नहीं चाहते होंगे। याद रहे कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद उन दिनों का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद हुआ करता था।
1964 में नेहरू के निधन के तत्काल बाद ही इंदिरा गांधी को क्यों नहीं प्रधान मंत्री बनाया गया,इस बात का पता नहीं चल सका। पर जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधान मंत्री बने तो इंदिरा गाधी को सूचना व प्रसारण मंत्री जरूर बना दिया गया था। इंदिरा जी की ओर से यह शिकायत शास्त्री जी तक जरूर पहुंचती रही कि प्रधान मंत्री देश को चलाने में इंदिरा जी का सलाह नहीं लेते। महत्वाकांक्षा तो देखिए ! इस बीच 1966 में रहस्यमय परिस्थितियों में ताशकंद में शास्त्री जी की मौत हो गई। इसके बाद कांग्रेस के भीतर और बाहर के नेहरू के खास प्रशंसकों और कांग्रेस के भीतर की लॉबी ने इंदिरा जी को प्रधान मंत्री बनवा ही दिया।
इस लॉबी ने इसलिए बनवाया ताकि वे गूंगी गुड़िया से जो चाहें करा सकें। मोरारजी देसाई से ऐसा वे नहीं करा सकते थे।1966 में हुए कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के चुनाव में इंदिरा गांधी को 355 और मोरार जी देसाई को 169 मत मिले थे।जब इंदिरा जी प्रधान मंत्री बनी थीं तो कुछ बड़े प्रतिपक्षी नेताओं ने उन्हें गूंगी गुड़िया ही नाम दिया था ।
पर कुछ समय बीतते-बीतते कांग्रेस की वह खास लॉबी इंदिरा के खिलाफ हो गयी। क्योंकि इंदिरा जी के सलाहकारों की एक नई मंडली बन गई। अंततः सन 1969 में कांग्रेस का विभाजन ही हो गया। सिंडिकेट के अधिकतर नेता संगठन कांग्रेस में शामिल हो गये। इंदिरा जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस का नाम पड़ा इंदिरा कांग्रेस।इंदिरा जी ने यदि सरकार व राजनीति के क्षेत्र में जनहित और गरीबहित में काम किया होता तो परिवारवाद को लोगबाग बुरा नहीं मानते। पर अपनी ताकत बढ़ाने के लिए उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा जरूर दिया। पर 1971 में जब बड़े बहुमत से सत्ता में आ गई तो वह मारूति का कारखाना खोलवा कर अपने पुत्र संजय गांधी की अमीरी बढ़ाने के काम में लग गई ।
इंदिरा गांधी ने सरकारी भ्रष्टाचार का बचाव करते हुए सार्वजनिक रूप से यह कह दिया था कि यह तो विश्वव्यापी है। इस बयान से भी देश में भ्रष्टाचार बढ़ा और गरीबों तक सरकारी धन और कम पहुंचने लगे।इसी के बारे में राजीव गांधी ने 1985 में यह स्वीकार किया था कि दिल्ली से सौ पैसे चलते हैं और जनता तक उसमें से मात्र 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। देश में ऐसी स्थिति लाने के लिए आखिर कौन जिम्मेदार थे ?आजादी के बाद लाल बहादुर शास्त्री के दो साल से भी कम समय का शासन काल को छोड़ दिया जाए तो नेहरू परिवार ही तो जिम्मेदार था। पर इसके बावजूद परिवारवाद को आगे भी बढ़ाया जा रहा है। इस बीमारी ने तो अब अन्य दलों में भी प्रवेश करके माहमारी का रूप ग्रहण कर लिया है।
आजादी के 63 साल में से 37 साल तक नेहरू परिवार के सदस्य ही प्रधान मंत्री रहे।2004 से अब तक सोनिया गांधी का परोक्ष शासन इस देश पर चल रहा है। इस बीच इंदिरा गांधी ने कुछ समय तक चरण सिंह की सरकार चलवाई और राजीव गांधी ने चंद्रशेखर की सरकार ।यदि आज देश की हालत यह हो चुकी है कि यहां के 77 प्रतिशत लोगों की रोज की औसत आय मात्र 20 रुपये है तो इस गरीबी के लिए नेहरू-इंदिरा परिवार कितना जिम्मेदार है और अन्य लोग कितना ,इस पर चर्चा होती रहती है।
ऐसा नहीं है कि इस देश के पास साधन नहीं है। पर जो भी साधन है उसे मुटठी भर लोग लूट रहे हैं और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। इसके लिए भी कौन जिम्मेदार है ? इसके लिए परिवारवाद कितना जिम्मेदार है ?क्या परिवारवाद के नाम पर अयोग्य नेतृत्व को देश पर थोपे जाने के कारण ही देश की ऐसी दुर्दशा हो रही है ? यह गहन जांच का विषय है।
1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधान मंत्री बना दिया गया जिन्हें सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। उसका नतीजा भी देश ने भुगता। अब सोनिया गांधी कांग्रेस को प्रत्यक्ष और सरकार को परोक्ष रूप से चला रही हैं।जिस एक ही परिवार के सदस्य बारी बारी से 35 वर्षों तक प्रधान मंत्री और 25 वर्षों तक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहे ,उसे इस देश की सफलता या विफलता के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाएगा तो किसे माना जाएगा ? देश की आज जो विकट आर्थिक,राजनीतिक और सामरिक स्थिति है,क्या उसके लिए परिवारवाद को जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए ?/
पाक्षिक पत्रिका पब्लिक एजेंडा से साभार/
अब चुनावों में विदेशी धन की चर्चा क्यों नहीं ?
इस देश के चुनावों में कभी विदेशी धन खूब लगते थे।अब नहीं लगते।या फिर कम लगते हैं।लगते भी हैं तो उनकी चर्चा नहीं होती।अब तो उल्टे यहां के अनेक नेताओं पर यह आरोप लगता है कि उनके अपार धन विदेशी बैंकों के गुप्त खातों में जमा हैं।
ऐसा नहीं है कि आजादी के तत्काल बाद के कुछ नेताओं में स्विस बैंक के गुप्त खातों में पैसे जमा करने की प्रवृति ही नहीं थी। इक्के दुक्के नेता ऐसा काम तब भी करते थे।अब यह सरेआम हो रहा है।यानी धारा उल्टी दिशा में बह रही है।हालांकि अब भी एन.जी.ओ.से जुड़े कुछ नेता एन.जी..ओ को अन्य उद्देश्यों के लिए मिले विदेशी धन का इस्तेमाल अपने चुनाव के लिए करते हैं।पर एक हद तक ही।वह व्यापक नहीं है।
पर और कई महत्वपूर्ण नेतागण विदेशों से पैसे प्राप्त करके उसे अपने चुनाव में लगाते थे।पर अब तो इस गरीब देश के दरिद्रों की रहनुमाई करने का दावा करने वाले कुछ राजनीतिक दल व उनके नेता गण भी इतने अमीर हो चुके हैं कि उनकी दौलत की तुलना बिजनेस घरानों से भी की जा सकती है।कुछ नेताओं की तुलना आसानी से किन्हीं उदयोगपति से की जा सकती है।ऐसे में चुनावों के लिए विदेशी धन की जरूरत भी लगभग समाप्त हो चुकी है।
इस देश के लगभग सभी दल किसी न किसी कालखंड में केंद्र व राज्य में सत्ता में रहे हैं।अनेक कं्रेद्रीय मंत्रियों को सरकार के लिए विदेशी सौदे करने पड़ते हैं।अधिकतर विदेशी सौदों में कमीशन मिलते हैं।कमीशन मांगने भी नहीं पड़ते।अपने आप मिल जाते हैं।यदा कदा एकाध ईमानदार मंत्री जरूर उसे लेने से जरूर इनकार कर देते रहे हैं।यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि सारे मंत्री कमीशन लेते ही हैं।पर जो भी लेते हैं उनके पैसे विदेशी बैंकों के गुप्त खातों में जमा हो जाते है।वैसे देश के भीतर भी जिस नेता को रिश्वत की बड़ी राशि मिलती है,उसे हवाला के जरिए आसानी से विदेश भिजवा दिया जाता है।इस तरह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते सरकारी भ्रष्टाचार के इस दौर में चुनाव के लिए विदेशी पैसे की जरूरत ही कहां है ?
पर पचास और साठ के दशकों में जब सोवियत लॉबी बनाम अमेरिकी लॉबी भारत में भी काफी सक्रिय थी ,तब विदेशी पैसों से यहां के चुनावों को भी प्रभावित करने की जरूरत थी।एक पक्ष पैसों के बल पर इस देश में साम्यवादी विचार को और भी फैलाना चाहता था तो दूसरा पक्ष पैसे के जरिए साम्यवाद के विस्तार को रोकना चाहता था।इसलिए पैसों का खेल जारी था।पर नब्बे के दशक में एक तरफ सोवियत संघ में साम्यवादी शासन का पतन हो गया और दूसरी ओर नई आर्थिक नीति के जरिए भारत की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति में बदलाव आने लगा।
राजनीति में तेज नैतिक पतन शुरू हो गया और अधिकतर नेताओं में पैसे और परिवार के प्रति बेशर्म झुकाव बढ़ने लगा।भ्रष्टाचार व अपराधीकरण का नंगा नाच शुरू होने लगा और किसी नेता को अपनी कोई गंदगी व बेशर्मी छुपाने की जरूरत ही नहीं रही।फिर यहीं के साधन से चुनावों में बेशुमार दौलत खर्च होने लगी।
पर पचास-साठ-सत्तर के दशकों के अधिकतर नेता निजी संपत्ति के संग्रह को लेकर आज की तरह आग्रही व लालची नहीं थे।हां,चंुनाव में जो खर्च होते थे,उसके लिए कुछ पैसे वे चोरी छिपे भी कहीं से मिल जाये तो उन्हें एतराज नहीं था।
देश के राजनीतिक व प्रशासनिक हलकों में भीतर-भीतर तो इस बात की चर्चा जरूर थी कि यहां के चुनावों में विदेशी धन लग रहे हैं,पर उस पर कम ही लोग ध्यान देते थे।हां,उन नेताओं व दलों के चाल-चरित्र के कारण कुछ को सोवियत एजेंट,कुछ को चीनी एजेंट तो कुछ को अमेरिकन एजेंट जरूर कहा जाता था।
पर सन 1967 के आम चुनावके बाद जब इस देश के नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गई और लोक सभा में भी कांग्रेसी सदस्यों की सख्या पहले की अपेक्षा कम हो गई तो तत्कालीन ंइदिरा गांधी सरकार के कान खड़े हो गये।उसे लगा कि शायद यह विदेशी पैसों के चुनाव में भारी इस्तेमाल के कारण ही हुआ है। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री वाई .बी.चव्हाण के निदेश पर 1967 के चुनाव के बाद केंद्रीय गुप्चर एजेंसी ने इसकी जांच की।जांच में यह पाया गया कि सिर्फ एक राजनीतिक दल को छोड़कर सारे प्रमुख दलों ने चुनाव के लिए विदेशों से पैसे लिये।
इस चौंकानेवाली जांच रपट को दबा दिया गया।पर न्यूयार्क टाइम्स ने उस रपट के सारांश को छाप दिया।भारत की लोक सभा में इस पर हंगामा हो गया।पूरी रपट प्रकाशित करने की मांग की गई।पर गृह मंत्री ने इस मांग को ठुकराते हुए कहा कि ‘रपट के प्रकाशन से अनेक व्यक्तियों व दलों के हितों की हानि होगी।’आजादी के बाद से ही दुर्भाग्यवश हमारे देश के हुक्मरानों ने इसी नीति-रीति से देश को चलायां।यानी समर्थ व्यक्ति,पार्टी या व्यापारिक घराने चाहे जो भी कर्म-कुकर्म ं करते जाएं,उनके हितों को नुकसान नहीं पहुंचाना है,भले देश व उसके करोड़ों निरीह गरीब लोगों के हित चूल्हें भांड़ में जायें।
खैर विदेशी धन के भारतीय चुनावों में इस्तेमाल पर लोक सभा में एक से अधिक बार चर्चा हुई।सन 1966 में अमेरिकी समाचार पत्रों में यह खबर छपी थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी..आई.ए.देश-विदेश की कई संस्थाओं को धन देती है।जिन संस्थाओं को सी.आई.ए. द्वारा धन दिये जाने की चर्चा अमेरिकी अखबारों ने की,उनमें भारत की भी कुछ संस्थाएं शामिल थी।वैसे भारत की केंद्रीय गुप्तचर एजेंसी ने सन 1967 में कहा था कि भारत के कुछ दलों को सोवियत संघ,कुछ को चीन और कुछ को अमेरिका से पैसे मिले।एक बड़े दल के कुछ नेताओं को तो सोवियत संघ और कुछ अन्य को अमेरिका से धन मिले थे।पर न्यूयार्क टाइम्स की इस रपट को कुछ भारतीय नेताओं ने मनगढंत कहा था।कुछ ने इसकी जांच के लिए संसदीय समिति के गठन की मांग की थी।पर केंद्र सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की।
यह स्वाभाविक ही था कि शीत युद्ध के दौर में कोई पूजींपति देश किसी विकासशील देश में कम्युनिज्म के फैलाव को रोकने की कोशिश करे।दूसरी ओर कम्युनिस्ट तो खुद को राष्ट्रीय नहीं बल्कि ,अंतरराष्ट्रीय कहते हैं।वे पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट शासन चाहते थे।एक कम्युनिस्ट देश के पैसे से दूसरे देश में कम्युनिज्म के फैलाव यानी निर्यात को कई कम्युनिस्ट गलत भी नहीं मानते।उनके बारे में इस देश में कभी यह मजाक चलता था कि यदि मस्क्वा में वर्षा होती है,तो भारत के कुछ कम्युनिस्ट दिल्ली में छाता लगा लेते हैं।
पर सन 2005 में जब द मित्रोखिव अर्काइव -2 नामक पुस्तक सामने आई तो भारतीय कम्युनिस्टों की स्थिति परेशानीपूर्ण हो गई।उसमें पैसे की लेन देन का विवरण है।सी.पी.आई.नेता ए.बी..बर्धन ने तब कहा था कि यह जासूसी उपन्यास की कथा मात्र है।पर लोग पूछते हैं कि सोवियत कम्युनिस्टों के सत्ताच्युत होने के साथ- साथ ही भारत में सी..पी.आई क्यों मुरझाने लगी ?उनके प्रकाशन एक- एक करके क्यों बंद होने लगे।
पचास के दशक में खुद इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया था कि कम्युनिस्टों व प्रजा समाजवादी पार्टी को विदेशी धन मिला था।यह बात और है कि तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तब इस आरोप खंडन किया था।पर सन 1967 की गुप्तचर जांच और 2005 के मित्रोखिन अर्काइव -2 ने इंदिरा गांधी के आरोप को सही और नेहरू की सफाई को गलत साबित कर दिया।मित्रोखिन अर्काइव -2 पुस्तक में इस बात की विस्तृत चर्चा है कि किस तरह सोवियत पैसे भारत के मीडिया,राजनीति व अन्य क्षेत्रों में लगे।
खैर अब तो हमारे अधिकतर हुक्मरान इस देश को चंगेज खान की तरह लूटपाट कर खुद ही सपरिवार इतने अमीर हो चुके हैं और हो रहे हैं कि उनके पैसों से तो विदेशों में उदयोग व्यापार फल -फूल रहे हैं।भले इस देश के किसी गरीब को अपनी पत्नी की सर्जिकल डिलवरी कराने के लिए पैसे जुटाने के लिए अपने ही एक बेटे को बेचना पड़े।गत महीने यह खबर मध्य प्रदेश के अनूप पुर जिले के अगरियानार गांव से आई थी।इससे पहले इसी साल जुलाई में दिल्ली से यह खबर आई कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दो साल में सिर्फ जलपान पर 94 लाख रुपये से अधिक खर्च कर दिया।इसी के साथ दो अन्य खबरों को जोड़ दीजिए तो स्थिति और भी साफ हो जाएगी।एक खबर यह है कि हर एम.पी.पर सरकार हर साल 37 लाख रुपये खर्च करती है और दूसरी सूचना यह है कि निवर्तमान सर्त्तकता आयुक्त प्रत्युष सिंहा ने कहा है कि इस देश का हर तीसरा व्यक्ति भ्रष्ट है।यहां एम.पी.-विधायक क्षेत्रीय विकास फंडं की बात नहीं की जा रही है।अब भला किसी दल या नेता को चुनाव लड़ने के लिए विदेश धन की कितनी जरूरत ही रह गई है ?
ऐसा नहीं है कि आजादी के तत्काल बाद के कुछ नेताओं में स्विस बैंक के गुप्त खातों में पैसे जमा करने की प्रवृति ही नहीं थी। इक्के दुक्के नेता ऐसा काम तब भी करते थे।अब यह सरेआम हो रहा है।यानी धारा उल्टी दिशा में बह रही है।हालांकि अब भी एन.जी.ओ.से जुड़े कुछ नेता एन.जी..ओ को अन्य उद्देश्यों के लिए मिले विदेशी धन का इस्तेमाल अपने चुनाव के लिए करते हैं।पर एक हद तक ही।वह व्यापक नहीं है।
पर और कई महत्वपूर्ण नेतागण विदेशों से पैसे प्राप्त करके उसे अपने चुनाव में लगाते थे।पर अब तो इस गरीब देश के दरिद्रों की रहनुमाई करने का दावा करने वाले कुछ राजनीतिक दल व उनके नेता गण भी इतने अमीर हो चुके हैं कि उनकी दौलत की तुलना बिजनेस घरानों से भी की जा सकती है।कुछ नेताओं की तुलना आसानी से किन्हीं उदयोगपति से की जा सकती है।ऐसे में चुनावों के लिए विदेशी धन की जरूरत भी लगभग समाप्त हो चुकी है।
इस देश के लगभग सभी दल किसी न किसी कालखंड में केंद्र व राज्य में सत्ता में रहे हैं।अनेक कं्रेद्रीय मंत्रियों को सरकार के लिए विदेशी सौदे करने पड़ते हैं।अधिकतर विदेशी सौदों में कमीशन मिलते हैं।कमीशन मांगने भी नहीं पड़ते।अपने आप मिल जाते हैं।यदा कदा एकाध ईमानदार मंत्री जरूर उसे लेने से जरूर इनकार कर देते रहे हैं।यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि सारे मंत्री कमीशन लेते ही हैं।पर जो भी लेते हैं उनके पैसे विदेशी बैंकों के गुप्त खातों में जमा हो जाते है।वैसे देश के भीतर भी जिस नेता को रिश्वत की बड़ी राशि मिलती है,उसे हवाला के जरिए आसानी से विदेश भिजवा दिया जाता है।इस तरह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते सरकारी भ्रष्टाचार के इस दौर में चुनाव के लिए विदेशी पैसे की जरूरत ही कहां है ?
पर पचास और साठ के दशकों में जब सोवियत लॉबी बनाम अमेरिकी लॉबी भारत में भी काफी सक्रिय थी ,तब विदेशी पैसों से यहां के चुनावों को भी प्रभावित करने की जरूरत थी।एक पक्ष पैसों के बल पर इस देश में साम्यवादी विचार को और भी फैलाना चाहता था तो दूसरा पक्ष पैसे के जरिए साम्यवाद के विस्तार को रोकना चाहता था।इसलिए पैसों का खेल जारी था।पर नब्बे के दशक में एक तरफ सोवियत संघ में साम्यवादी शासन का पतन हो गया और दूसरी ओर नई आर्थिक नीति के जरिए भारत की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति में बदलाव आने लगा।
राजनीति में तेज नैतिक पतन शुरू हो गया और अधिकतर नेताओं में पैसे और परिवार के प्रति बेशर्म झुकाव बढ़ने लगा।भ्रष्टाचार व अपराधीकरण का नंगा नाच शुरू होने लगा और किसी नेता को अपनी कोई गंदगी व बेशर्मी छुपाने की जरूरत ही नहीं रही।फिर यहीं के साधन से चुनावों में बेशुमार दौलत खर्च होने लगी।
पर पचास-साठ-सत्तर के दशकों के अधिकतर नेता निजी संपत्ति के संग्रह को लेकर आज की तरह आग्रही व लालची नहीं थे।हां,चंुनाव में जो खर्च होते थे,उसके लिए कुछ पैसे वे चोरी छिपे भी कहीं से मिल जाये तो उन्हें एतराज नहीं था।
देश के राजनीतिक व प्रशासनिक हलकों में भीतर-भीतर तो इस बात की चर्चा जरूर थी कि यहां के चुनावों में विदेशी धन लग रहे हैं,पर उस पर कम ही लोग ध्यान देते थे।हां,उन नेताओं व दलों के चाल-चरित्र के कारण कुछ को सोवियत एजेंट,कुछ को चीनी एजेंट तो कुछ को अमेरिकन एजेंट जरूर कहा जाता था।
पर सन 1967 के आम चुनावके बाद जब इस देश के नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गई और लोक सभा में भी कांग्रेसी सदस्यों की सख्या पहले की अपेक्षा कम हो गई तो तत्कालीन ंइदिरा गांधी सरकार के कान खड़े हो गये।उसे लगा कि शायद यह विदेशी पैसों के चुनाव में भारी इस्तेमाल के कारण ही हुआ है। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री वाई .बी.चव्हाण के निदेश पर 1967 के चुनाव के बाद केंद्रीय गुप्चर एजेंसी ने इसकी जांच की।जांच में यह पाया गया कि सिर्फ एक राजनीतिक दल को छोड़कर सारे प्रमुख दलों ने चुनाव के लिए विदेशों से पैसे लिये।
इस चौंकानेवाली जांच रपट को दबा दिया गया।पर न्यूयार्क टाइम्स ने उस रपट के सारांश को छाप दिया।भारत की लोक सभा में इस पर हंगामा हो गया।पूरी रपट प्रकाशित करने की मांग की गई।पर गृह मंत्री ने इस मांग को ठुकराते हुए कहा कि ‘रपट के प्रकाशन से अनेक व्यक्तियों व दलों के हितों की हानि होगी।’आजादी के बाद से ही दुर्भाग्यवश हमारे देश के हुक्मरानों ने इसी नीति-रीति से देश को चलायां।यानी समर्थ व्यक्ति,पार्टी या व्यापारिक घराने चाहे जो भी कर्म-कुकर्म ं करते जाएं,उनके हितों को नुकसान नहीं पहुंचाना है,भले देश व उसके करोड़ों निरीह गरीब लोगों के हित चूल्हें भांड़ में जायें।
खैर विदेशी धन के भारतीय चुनावों में इस्तेमाल पर लोक सभा में एक से अधिक बार चर्चा हुई।सन 1966 में अमेरिकी समाचार पत्रों में यह खबर छपी थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी..आई.ए.देश-विदेश की कई संस्थाओं को धन देती है।जिन संस्थाओं को सी.आई.ए. द्वारा धन दिये जाने की चर्चा अमेरिकी अखबारों ने की,उनमें भारत की भी कुछ संस्थाएं शामिल थी।वैसे भारत की केंद्रीय गुप्तचर एजेंसी ने सन 1967 में कहा था कि भारत के कुछ दलों को सोवियत संघ,कुछ को चीन और कुछ को अमेरिका से पैसे मिले।एक बड़े दल के कुछ नेताओं को तो सोवियत संघ और कुछ अन्य को अमेरिका से धन मिले थे।पर न्यूयार्क टाइम्स की इस रपट को कुछ भारतीय नेताओं ने मनगढंत कहा था।कुछ ने इसकी जांच के लिए संसदीय समिति के गठन की मांग की थी।पर केंद्र सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की।
यह स्वाभाविक ही था कि शीत युद्ध के दौर में कोई पूजींपति देश किसी विकासशील देश में कम्युनिज्म के फैलाव को रोकने की कोशिश करे।दूसरी ओर कम्युनिस्ट तो खुद को राष्ट्रीय नहीं बल्कि ,अंतरराष्ट्रीय कहते हैं।वे पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट शासन चाहते थे।एक कम्युनिस्ट देश के पैसे से दूसरे देश में कम्युनिज्म के फैलाव यानी निर्यात को कई कम्युनिस्ट गलत भी नहीं मानते।उनके बारे में इस देश में कभी यह मजाक चलता था कि यदि मस्क्वा में वर्षा होती है,तो भारत के कुछ कम्युनिस्ट दिल्ली में छाता लगा लेते हैं।
पर सन 2005 में जब द मित्रोखिव अर्काइव -2 नामक पुस्तक सामने आई तो भारतीय कम्युनिस्टों की स्थिति परेशानीपूर्ण हो गई।उसमें पैसे की लेन देन का विवरण है।सी.पी.आई.नेता ए.बी..बर्धन ने तब कहा था कि यह जासूसी उपन्यास की कथा मात्र है।पर लोग पूछते हैं कि सोवियत कम्युनिस्टों के सत्ताच्युत होने के साथ- साथ ही भारत में सी..पी.आई क्यों मुरझाने लगी ?उनके प्रकाशन एक- एक करके क्यों बंद होने लगे।
पचास के दशक में खुद इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया था कि कम्युनिस्टों व प्रजा समाजवादी पार्टी को विदेशी धन मिला था।यह बात और है कि तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तब इस आरोप खंडन किया था।पर सन 1967 की गुप्तचर जांच और 2005 के मित्रोखिन अर्काइव -2 ने इंदिरा गांधी के आरोप को सही और नेहरू की सफाई को गलत साबित कर दिया।मित्रोखिन अर्काइव -2 पुस्तक में इस बात की विस्तृत चर्चा है कि किस तरह सोवियत पैसे भारत के मीडिया,राजनीति व अन्य क्षेत्रों में लगे।
खैर अब तो हमारे अधिकतर हुक्मरान इस देश को चंगेज खान की तरह लूटपाट कर खुद ही सपरिवार इतने अमीर हो चुके हैं और हो रहे हैं कि उनके पैसों से तो विदेशों में उदयोग व्यापार फल -फूल रहे हैं।भले इस देश के किसी गरीब को अपनी पत्नी की सर्जिकल डिलवरी कराने के लिए पैसे जुटाने के लिए अपने ही एक बेटे को बेचना पड़े।गत महीने यह खबर मध्य प्रदेश के अनूप पुर जिले के अगरियानार गांव से आई थी।इससे पहले इसी साल जुलाई में दिल्ली से यह खबर आई कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दो साल में सिर्फ जलपान पर 94 लाख रुपये से अधिक खर्च कर दिया।इसी के साथ दो अन्य खबरों को जोड़ दीजिए तो स्थिति और भी साफ हो जाएगी।एक खबर यह है कि हर एम.पी.पर सरकार हर साल 37 लाख रुपये खर्च करती है और दूसरी सूचना यह है कि निवर्तमान सर्त्तकता आयुक्त प्रत्युष सिंहा ने कहा है कि इस देश का हर तीसरा व्यक्ति भ्रष्ट है।यहां एम.पी.-विधायक क्षेत्रीय विकास फंडं की बात नहीं की जा रही है।अब भला किसी दल या नेता को चुनाव लड़ने के लिए विदेश धन की कितनी जरूरत ही रह गई है ?
सरकारी लोहियावादियों के लिए लोहिया सिर्फ मूर्त्तियों में
सुरेंद्र किशोर
तोता रटंत की तरह लोहिया का नाम लेना तो आसान है,पर लोहियावादी बनना चुनाव लड़ने वाले आज के अधिकतर नेताओं के लिए बड़ा ही कठिन काम है।शायद इसीलिए लोहिया को मूर्त्तियों और चित्रों तक ही सीमित कर दिया गया है।
हालांकि मूर्त्तियों के बारे में डा.राम मनोहर लोहिया की यह राय थी कि किसी महा पुरूष की मूर्त्ति उसके निधन के सौ साल बाद ही लगनी चाहिए। तब तक उस महा पुरूष के बारे में इतिहास फैसला कर चुका होता है।यानी इतने समय बाद यह तय हो चुका होता है कि जिसे हमने महा पुरूष का दर्जा दे रखा है,उसने देश व समाज के लिए कुल मिलाकर अच्छा किया या बुरा।जब सोवियत क्रांति के 75 साल के भीतर ही सोवियत संघ में सर्वोच्च कम्युनिस्ट नेता की मूर्त्ति तोड़ दी गई तो कुछ लोगों को लोहिया की भविष्यवाणी की याद आई।
पर यहां के लोहियावादियों को देखिए।नब्बे के दशक में जब पटना में लोहिया की मूर्त्ति लगनी थी तो यह विवाद खड़ा हुआ था।पर मूर्त्ति लगाने वालों ने कहा कि लोहिया ने तो कहा था कि मरने के दस साल बाद मूर्त्ति लगवाई जा सकती है।चूंकि मूर्त्ति लगाने वालों को सिर्फ यही काम करना था,लोहिया के कहे पर चलना ही नहीं था,इसीलिए जल्दी- जल्दी मूर्त्ति वाला यह काम कर दिया गया।
यह तो मरने के बाद की बात हुई।लोहिया के जीवन काल में भी कई लोहियावादियों ने लोहिया की बात नहीं मानी।सत्ता लोलुपता इसका कारण रहा।सन 1967 में लोहियावादी विधायक जगदेव प्रसाद बिहार के करीब एक दर्जन बड़े लोहियावादियों में एक माने जाते थे।पर सत्ता के लिए उन्होंने उनके जीवन काल में ही लोहिया की इच्छा को ठोकर मार दी।
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर बी.पी.मंडल सन 1967 में लोक सभा के सदस्य चुने गये थे। डा.लोहिया संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता थे।पर लोहिया की इच्छा के खिलाफ जाकर बिहार में नवगठित महामाया मंत्रिमंडल के मंत्री बन गये।लोहिया चाहते थे कि जो जहां के लिए चुना गया है,वह वहीं जाकर काम करे।पर मंडल को यह मंजूर नहीं था।वे एम.एल.सी.बनना चाहते थे।पर लोहिया जी ने उन्हें कहा कि आप मंत्री द छोड़ो।उन्होंने पद छोड़ने के बदले महामाया मंत्रिमंडल को ही अपदस्थ करा दिया और खुद मुख्य मंत्री बन गये।दल बदल करा कर सरकार गिरवाई गई।दल बदल करने और कराने में जगदेव प्रसाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंडल मंत्रिमंडल के जगदेव प्रसाद भी सदस्य बने।
राजनीतिक ईमानदारी के साथ -साथ व्यक्तिगत ईमानदारी पर भी लोहिया जी बड़ा जोर देते थे।वे कहते थे कि इसी से जनता में समाजवादियों के प्रति विश्वास बढ़ेगा।समाजवादियों को यदि कांग्रेस का स्थायी विकल्प बनना है तो उन्हें जनता के बीच खुद को कांग्रेसियों से बिलकुल अलग दिखाना पड़ेगा।पर हुआ ठीक इसके उल्टा।व्यक्तिगत ईमानदारी के मामले में लोहिया का नाम लेने वाले बिहार व उत्तर प्रदेश के कुछ तथाकथित आधुनिक समाजवादी जितने बेशर्म साबित हुए है,उसकी कोई मिसाल ही नहीं है।
हां, राजनीति की मुख्य धारा से बाहर रह कर कुछ लोहियावादियों ने जरूर आले दर्जे की व्यक्तिगत ईमानदारी दिखाई जिनमें किशन पटनायक प्रमुख थे।
औरत-मर्द का सवाल हो या फिर हिंदू मुस्लिम का प्रश्न।अनेक सरकारी या यूं कहें कि वोट-बाज लोहियावादियों ने लोहिया की नीतियों के बिलकुल खिलाफ काम किया है और विरोधी रुख अपनाया है।लोहिया जी हिंदू सांप्रदायिकता और मुस्लिम सांप्रदायिकता को समान रूप से खराब मानते थे।पर आज के चुनाव लड़ने वाले अधिकतर समाजवादी ऐसे मामले में बिलकुल एकतरफा रवैया अपनाते हैं जो कभी -कभी देशहित के खिलाफ भी लगता है।समाजवादियों के इस एकतरफा रवैऐ से भाजपा को राजनीति में बढ़त मिल जाती है।
डा.लोहिया सभी जातियों की महिलाओं को पिछड़ा मानते थे।पर आधुनिक सरकारी व वोटबाज लोहियावादियों ने महिलाओं को भी जातियों के चश्मे से देख कर अपना रवैया तय किया हैं।राजनीति में परिवारवाद का सवाल हो या फिर कांग्रेस के प्रति समाजवादियों के रुख-रवैये का प्रश्न हो,समाजवादियों ने लोहिया की बातों को साफ भुला दिया है।
12 अक्तूबर 1967 को मात्र 57 साल की उम्र में डा.राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया था।पर, इतनी ही कम उम्र में उन्होंने इस देश की राजनीति को जितना प्रभावित किया,वह अनेक समकालीन नेताओं के लिए ईर्ष्या का विषय बना। आखिर वे लोगों को इतना अधिक प्रभावित क्यों कर पाये ?
उनकी इस पुण्य तिथि के अवसर पर भी लोगबाग उनके गुणों को याद करेंगे ही।
पर ऐसे अवसर पर अधिकतर मामलों में अधिकतर नेता लोग और उनमें से भी अधिकतर लोग भी जो खुद को लोहियावादी कहते हैं,उनके गुणों का तोता रटंत मात्र ही करते हैं। पैसा- वाद,पद -वाद और परिवार-वाद के जंजाल में फंसी आज की मुख्य धारा की राजनीति और उसके नेतागण इसके अलावा कुछ कर भी नहीं सकते।यदि इक्के दुक्के कोई नेता आज भी इस जाल-जंजाल से बचना चाहता है और सरकार में रह कर या फिर प्रतिपक्ष में भी भरसक बेहतर राजनीति करना चाहता है तो उसे राजनीति में शून्य बना देने की चौतरफा कोशिश शुरू हो जाती है।
ऐसे तो डा.राम मनोहर लोहिया में अनेक गुण थे,पर उनमें से एक गुण ने उन्हें सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र बनाया।वह गुण यह था कि वे जो कहते थे,वही करते भी थे।
यदि आज के नेतागण भी लोहिया जी के इस गुण का अनुसरण करते हुए अपनी कथनी और करनी का फर्क मिटा दें तो जनता देर -सवेर उन्हें हाथों -हाथ ले लेगी।आज इस देश की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यह है कि अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेतागण अपनी ही बातों और वायदों को खुद ही बाद में चबा जाते हैं।यानी जनता को जो सब्ज बाग दिखा कर वे सत्ता में आते हैं,अपने स्वार्थ में अंधे होकर व गद्दी मोह में पड़ कर उन वायदों को बेहिचक तोड़ देते हैं।
यदि किसी नेता का राजनीतिक जीवन तीस साल का है तो आप जरा उस तीस साल के स्थानीय अखबारों की फाइलें उलटिए। उसके बयानों व भेंट वार्ताओं को देख कर पाइएगा कि ऐसा झूठा नेता तो इस धरती पर पैदा ही नहीं हुआ।चुनावों के अवसरों पर अधिकतर नेताओं के झूठ और भी खुल कर सामने आते हैं।चूंकि अखबारों के पाठकों की स्मृति छोटी होती है,इसलिए उस नेता पर गुस्सा समय के साथ कम हो जाता है।या फिर इस बीच कोई दूसरा नेता उससे भी अधिक बड़ी गलती करके पिछले नेता की गलती के असर को धुंधला कर दिया होता है।
ओर स्वतंत्रता सेनानी ,विचारक और समाजवादी डा.लोहिया के जीवन में ऐसा प्रकरण शायद ही मिले ! इसीलिए आज भी लोग उन्हें श्रद्धा के साथ याद करते हैं।उनकी करनी और कथनी में फर्क नहीं था।क्योंकि वे न तो पद के पीछे थे और न पैसे के। उनका कोई परिवार तो था ही नहीं।डा.लोहिया अविवाहित थे।
तोता रटंत की तरह लोहिया का नाम लेना तो आसान है,पर लोहियावादी बनना चुनाव लड़ने वाले आज के अधिकतर नेताओं के लिए बड़ा ही कठिन काम है।शायद इसीलिए लोहिया को मूर्त्तियों और चित्रों तक ही सीमित कर दिया गया है।
हालांकि मूर्त्तियों के बारे में डा.राम मनोहर लोहिया की यह राय थी कि किसी महा पुरूष की मूर्त्ति उसके निधन के सौ साल बाद ही लगनी चाहिए। तब तक उस महा पुरूष के बारे में इतिहास फैसला कर चुका होता है।यानी इतने समय बाद यह तय हो चुका होता है कि जिसे हमने महा पुरूष का दर्जा दे रखा है,उसने देश व समाज के लिए कुल मिलाकर अच्छा किया या बुरा।जब सोवियत क्रांति के 75 साल के भीतर ही सोवियत संघ में सर्वोच्च कम्युनिस्ट नेता की मूर्त्ति तोड़ दी गई तो कुछ लोगों को लोहिया की भविष्यवाणी की याद आई।
पर यहां के लोहियावादियों को देखिए।नब्बे के दशक में जब पटना में लोहिया की मूर्त्ति लगनी थी तो यह विवाद खड़ा हुआ था।पर मूर्त्ति लगाने वालों ने कहा कि लोहिया ने तो कहा था कि मरने के दस साल बाद मूर्त्ति लगवाई जा सकती है।चूंकि मूर्त्ति लगाने वालों को सिर्फ यही काम करना था,लोहिया के कहे पर चलना ही नहीं था,इसीलिए जल्दी- जल्दी मूर्त्ति वाला यह काम कर दिया गया।
यह तो मरने के बाद की बात हुई।लोहिया के जीवन काल में भी कई लोहियावादियों ने लोहिया की बात नहीं मानी।सत्ता लोलुपता इसका कारण रहा।सन 1967 में लोहियावादी विधायक जगदेव प्रसाद बिहार के करीब एक दर्जन बड़े लोहियावादियों में एक माने जाते थे।पर सत्ता के लिए उन्होंने उनके जीवन काल में ही लोहिया की इच्छा को ठोकर मार दी।
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर बी.पी.मंडल सन 1967 में लोक सभा के सदस्य चुने गये थे। डा.लोहिया संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता थे।पर लोहिया की इच्छा के खिलाफ जाकर बिहार में नवगठित महामाया मंत्रिमंडल के मंत्री बन गये।लोहिया चाहते थे कि जो जहां के लिए चुना गया है,वह वहीं जाकर काम करे।पर मंडल को यह मंजूर नहीं था।वे एम.एल.सी.बनना चाहते थे।पर लोहिया जी ने उन्हें कहा कि आप मंत्री द छोड़ो।उन्होंने पद छोड़ने के बदले महामाया मंत्रिमंडल को ही अपदस्थ करा दिया और खुद मुख्य मंत्री बन गये।दल बदल करा कर सरकार गिरवाई गई।दल बदल करने और कराने में जगदेव प्रसाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंडल मंत्रिमंडल के जगदेव प्रसाद भी सदस्य बने।
राजनीतिक ईमानदारी के साथ -साथ व्यक्तिगत ईमानदारी पर भी लोहिया जी बड़ा जोर देते थे।वे कहते थे कि इसी से जनता में समाजवादियों के प्रति विश्वास बढ़ेगा।समाजवादियों को यदि कांग्रेस का स्थायी विकल्प बनना है तो उन्हें जनता के बीच खुद को कांग्रेसियों से बिलकुल अलग दिखाना पड़ेगा।पर हुआ ठीक इसके उल्टा।व्यक्तिगत ईमानदारी के मामले में लोहिया का नाम लेने वाले बिहार व उत्तर प्रदेश के कुछ तथाकथित आधुनिक समाजवादी जितने बेशर्म साबित हुए है,उसकी कोई मिसाल ही नहीं है।
हां, राजनीति की मुख्य धारा से बाहर रह कर कुछ लोहियावादियों ने जरूर आले दर्जे की व्यक्तिगत ईमानदारी दिखाई जिनमें किशन पटनायक प्रमुख थे।
औरत-मर्द का सवाल हो या फिर हिंदू मुस्लिम का प्रश्न।अनेक सरकारी या यूं कहें कि वोट-बाज लोहियावादियों ने लोहिया की नीतियों के बिलकुल खिलाफ काम किया है और विरोधी रुख अपनाया है।लोहिया जी हिंदू सांप्रदायिकता और मुस्लिम सांप्रदायिकता को समान रूप से खराब मानते थे।पर आज के चुनाव लड़ने वाले अधिकतर समाजवादी ऐसे मामले में बिलकुल एकतरफा रवैया अपनाते हैं जो कभी -कभी देशहित के खिलाफ भी लगता है।समाजवादियों के इस एकतरफा रवैऐ से भाजपा को राजनीति में बढ़त मिल जाती है।
डा.लोहिया सभी जातियों की महिलाओं को पिछड़ा मानते थे।पर आधुनिक सरकारी व वोटबाज लोहियावादियों ने महिलाओं को भी जातियों के चश्मे से देख कर अपना रवैया तय किया हैं।राजनीति में परिवारवाद का सवाल हो या फिर कांग्रेस के प्रति समाजवादियों के रुख-रवैये का प्रश्न हो,समाजवादियों ने लोहिया की बातों को साफ भुला दिया है।
12 अक्तूबर 1967 को मात्र 57 साल की उम्र में डा.राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया था।पर, इतनी ही कम उम्र में उन्होंने इस देश की राजनीति को जितना प्रभावित किया,वह अनेक समकालीन नेताओं के लिए ईर्ष्या का विषय बना। आखिर वे लोगों को इतना अधिक प्रभावित क्यों कर पाये ?
उनकी इस पुण्य तिथि के अवसर पर भी लोगबाग उनके गुणों को याद करेंगे ही।
पर ऐसे अवसर पर अधिकतर मामलों में अधिकतर नेता लोग और उनमें से भी अधिकतर लोग भी जो खुद को लोहियावादी कहते हैं,उनके गुणों का तोता रटंत मात्र ही करते हैं। पैसा- वाद,पद -वाद और परिवार-वाद के जंजाल में फंसी आज की मुख्य धारा की राजनीति और उसके नेतागण इसके अलावा कुछ कर भी नहीं सकते।यदि इक्के दुक्के कोई नेता आज भी इस जाल-जंजाल से बचना चाहता है और सरकार में रह कर या फिर प्रतिपक्ष में भी भरसक बेहतर राजनीति करना चाहता है तो उसे राजनीति में शून्य बना देने की चौतरफा कोशिश शुरू हो जाती है।
ऐसे तो डा.राम मनोहर लोहिया में अनेक गुण थे,पर उनमें से एक गुण ने उन्हें सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र बनाया।वह गुण यह था कि वे जो कहते थे,वही करते भी थे।
यदि आज के नेतागण भी लोहिया जी के इस गुण का अनुसरण करते हुए अपनी कथनी और करनी का फर्क मिटा दें तो जनता देर -सवेर उन्हें हाथों -हाथ ले लेगी।आज इस देश की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यह है कि अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेतागण अपनी ही बातों और वायदों को खुद ही बाद में चबा जाते हैं।यानी जनता को जो सब्ज बाग दिखा कर वे सत्ता में आते हैं,अपने स्वार्थ में अंधे होकर व गद्दी मोह में पड़ कर उन वायदों को बेहिचक तोड़ देते हैं।
यदि किसी नेता का राजनीतिक जीवन तीस साल का है तो आप जरा उस तीस साल के स्थानीय अखबारों की फाइलें उलटिए। उसके बयानों व भेंट वार्ताओं को देख कर पाइएगा कि ऐसा झूठा नेता तो इस धरती पर पैदा ही नहीं हुआ।चुनावों के अवसरों पर अधिकतर नेताओं के झूठ और भी खुल कर सामने आते हैं।चूंकि अखबारों के पाठकों की स्मृति छोटी होती है,इसलिए उस नेता पर गुस्सा समय के साथ कम हो जाता है।या फिर इस बीच कोई दूसरा नेता उससे भी अधिक बड़ी गलती करके पिछले नेता की गलती के असर को धुंधला कर दिया होता है।
ओर स्वतंत्रता सेनानी ,विचारक और समाजवादी डा.लोहिया के जीवन में ऐसा प्रकरण शायद ही मिले ! इसीलिए आज भी लोग उन्हें श्रद्धा के साथ याद करते हैं।उनकी करनी और कथनी में फर्क नहीं था।क्योंकि वे न तो पद के पीछे थे और न पैसे के। उनका कोई परिवार तो था ही नहीं।डा.लोहिया अविवाहित थे।
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