शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

इस परिवारवाद और मौकापरस्ती पर शर्म आती है

टिकट नहीं मिलने पर टिकटार्थी अपने ही दल के दफ्तर में आग लगा दे,ऐसा बिहार में इस दफा पहली बार हुआ है। टिकट से वंचित लोगों के समर्थकों ने पूर्णिया के कांग्रेस पार्टी कार्यालय भवन में रविवार को पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। इतना ही नहीं, करीब-करीब सभी प्रमुख दलों के राज्य मुख्यालयों में या उसके आसपास टिकटार्थियों ने ऐसा हंगामा किया कि कुछ पार्टी दफ्तरों में ताले लगाने पड़े। टिकट बांटने के काम में लगे कुछ बड़े नेताओं को अपमान से बचने के लिए भूमिगत होकर हर दिन अपना ठिकाना बदलना पड़ा। राज्य भर से पटना पहुंचे टिकटलोलुप या फिर टिकट वंचित लोगों के छोटे-छोटे उग्र समूह कुछ दिनों से विभिन्न दलों के दफ्तरों, नेताओं के आवासों व सड़कों पर इस तरह की हिंसा करते रहे हैं मानो वे राजनीतिक कार्यकर्त्ता नहीं बल्कि गुंडा गिरोहों के सदस्य हों।

हालांकि विद्रोह पर उतारू ऐसे लोगों में सब गलत तत्व ही नहीं हैं। उनमें से कुछ वास्तविक राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं ने आरोप लगाया कि नेतत्व ने गैर राजनीतिक कारणों से विवादास्पद तत्वों को टिकट दे दिये। कहा जा रहा है कि कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों द्वारा टिकट वितरण में किसी तरह के मापदंड नहीं अपनाये जाने के कारण भी इस तरह के अराजक तत्वों को अपना कौशल दिखाने का साहस हो रहा है। चुनाव अभियान के दौरान ऐसे लोग कैसी करामात दिखाएंगे, इसको लेकर अटकलों का बाजार गर्म है।

टिकटों का फैसला करके प्रदेश कांग्रेस के नेता जब 2 अक्तूबर को दिल्ली से लौटे तो पटना हवाई अड्डे पर बेटिकट हुए कांग्रेसियों की उग्र भीड़ ने चौधरी महबूब अली कैसर और डा. अशोक राम के साथ धक्कम धुक्की की। उन्हें अपमानित किया। उनकी गाड़ी के शीशे तोड़ डाले और अश्लील नारे लगाये। कैसर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और डा.राम कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं। ऐसा पहली बार हुआ।

बेटिकट हुए लोगों की भीड़ के सामने आने से महाबली लालू प्रसाद भी कतराते रहे। इस संबंध में लालू प्रसाद ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रंस में स्वीकार किया कि मैं टिकटार्थियों के साथ सात दिनों तक लुकाछिपी का खेल खलता रहा। टिकटार्थी डाल-डाल तो मैं पात पात रहता था। जदयू के राज्य कार्यालय में रोष पूर्ण प्रदर्शन के कारण पार्टी पदाधिकारियों ने कार्यालय जाना छोड़ दिया और कार्यालय में ताला लगा दिया गया। भाजपा के राज्य कार्यालय में भारी तोड़फोड़ की गई। कई लोग जो अपने सुप्रीमो की चमचागिरी में उन्हें भगवान कहा करते थे, टिकट नहीं मिलने पर वही लोग सुप्रीमो को सार्वजनिक रूप से राक्षस की संज्ञा देने लगे। ऐसे मनोरंजक किंतु शर्मनाक दृश्य देख कर लोगबाग क्षुब्ध हैं।

राजनीति में इन अभूतपूर्व गिरावटों के कई कारण रहे। कई मामलों में वाजिब उम्मीदवारों के बदले अन्य गैर राजनीतिक कारणों से अयोग्य व अपात्र लोगों को विभिन्न दलों ने टिकट दिये। दूसरी महत्वपूर्ण बात देखी गई कि अपवादों को छोड़कर राजनीति अब पूरी तरह व्यापार बन चुकी है। सैकड़ों टिकटार्थी जिस तरह के आलीशान वाहनों में सवार होकर जितनी कीमती पोशाक में पटना आ रहे हैं, राजनीतिक दलों के दफ्तरों के आसपास उन्हें देख कर लगता है कि टिकट नहीं बल्कि किसी थोक व्यापार की एजेंसी लेने आये हैं।

टिकट धर्मा, टिकट कर्मा, धर्मा-कर्मा टिकट-टिकट की रणनीति में विश्वास रखने वाले महत्वाकांक्षी टिकटार्थियों ने पिछले कुछ सप्ताहों में टिकट के लिए जितने बड़े पैमाने पर इस बार दल बदल किया है, और अब भी कर रहे हैं, वह अपने आप में एक रिकार्ड है।

चुनाव के मौके अनेक नेताओं और कार्यकर्त्ताओं के असली चेहरे उजागर कर देते हैं। बिहार में इस बार कुछ अधिक ही हो रहा है। नेता एक दल में सांसद है और उनके परिजन दूसरे दल में टिकट पा रहे हैं। ऐसा एक नहीं, बल्कि अनेक नेताओं के मामलों में हो रहा है। गत चुनावों में परिवारवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने वाले एनडीए ने इस बार परिवारवाद के सामने घुटने टेक दिये हैं। राजनीति में परिवारवाद बहुत पहले से है, पर परिवारवाद का ऐसा विस्तार पहले कभी नहीं देखा गया।

राम विलास पासवान के चार रिश्तेदार राजद-लोजपा गठबंधन की ओर से इस बार विधान सभा का चुनाव लड़ रहे हैं। हां, राजद के सांसद जगदानंद अपवाद के रूप में जरूर उभरे हैं। उनके पुत्र सुधाकर सिंह ने सांसद पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर टिकट के लिए भाजपा की सदस्यता स्वीकार कर ली। पर वे अपने पुत्र को राजनीति में लाने के खिलाफ रहे हैं। बाद में जगदानंद ने कहा कि मैं राम गढ़ विधान सभा क्षेत्र में अपने दल राजद के ही उम्मीदवार के पक्ष में ही काम करूंगा। भाजपा-जदयू गठबंधन ने सुधाकर को राम गढ़ से उम्मीदवार बनाया है जहां से कभी जगदानंद विधायक हुआ करते थे। अभी वहां से राजद के अम्बिका यादव विधायक हैं।

इस बार जितनी बड़ी संख्या में पूर्व सांसदगण विभिन्न दलों के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं, उतनी संख्या में एक साथ पहले कभी नहीं लड़े थे। किसी न किसी सदन में जल्द से जल्द पहुंचने की आतुरता ने ऐसी स्थिति ला दी है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार जब राजनीति का सबकुछ आम तौर पर सदन की सदस्यता व मंत्रीपद की ऐन केन प्रकारेण प्राप्ति ही बन जाए तो फिर और क्या होगा?

अपने या अपने परिजन के लिए एक चुनावी टिकट की तलाश में कई छोटे-बड़े नेताओं को इन दिनों न जाने कहां-कहां गुहार लगाते देखा गया। जहां उन्हें नहीं जाना चाहिए, वहां भी गये और जा रहे हैं। विभिन्न जेलों में बंद बाहुबलियों से भी वोट और टिकट के लिए सहयोग मांगे जा रहे हैं। माफियाओं और डॉन लोगों से बड़े-बड़े नेतागण गुप्त मुलाकातें कर रहे हैं। राजनीति में पतन की पराकाष्ठा और क्या है? कहां तक है? यह अभी तय नहीं हुआ है।

टिकट के लिए साले, बहनोई से विद्रोह कर रहे हैं और बेटा, बाप से। कई पुत्रों ने तो अपने अनिच्छुक पिता को भी पैरवीकार बनने के लिए बाध्य कर दिया ताकि वे उसके लिए जैसे भी हो, टिकट का जुगाड़ करें। कुछ सांसदों ने अपना बुढ़ापा कष्टमय होने से बचाने के लिए पुत्र के टिकट के लिए भरसक प्रयास किया भी। जदयू के कई सांसदों ने परिवारवाद पर अपने दल की नीति को बदलने के लिए नेतृत्व को इस बार बाध्य ही कर दिया। अब परिवारवाद के मामले में जदयू एक कदम पीछे और दो कदम आगे की रणनीति पर चल रहा है। पिछले चुनावों में जदयू ने और उसकी देखा-देखी भाजपा ने भी किसी नेता के परिजन को टिकट नहीं दिया था। पर इस बार राजग को अपनी यह नीति छोड़नी पड़ी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पर कहा कि हमारी परिवारवाद विरोधी नीति को गत चुनाव में मतदाताओं का पूर्ण समर्थन नहीं मिला था। इसलिए हमें उस नीति को छोड़ना पड़ रहा है।

दरअसल गत साल के बटाईदारी विवाद को लेकर प्रतिपक्ष द्वारा राज्य सरकार व राजग के खिलाफ अब भी चलाये जा रहे अफवाह- अभियान से दबाव महसूस कर रहे राजग ने अन्य तरह के कुछ समझौतों के जरिए उसकी क्षतिपूर्ति की कोशिश की है।

इस चुनाव के अवसर पर राजनीति में व्याप्त भारी टिकटलोलुपता व सत्तालोलुपता को देखकर बिहार के राजनीतिक व प्रशासनिक भविष्य को लेकर अनेक लोगों को चिंता हो रही है। विधायक फंड ने इसे भारी लाभदायक पेशा बना दिया है। जाहिर है कि ऐसे ही लोलुप नेतागण सत्ता व शक्ति प्राप्त करके निजी धनोपार्जन कार्य में तुरंत लग जाते हैं जो आम जनता के विकास में बाधक होता है। वे सरकारी लाभ को आम गरीब लोगों तक नहीं पहुंचने देते। इससे गरीबी और विषमता बढ़ती है। परिणामस्वरूप नक्सली तथा दूसरे अराजक व देशद्रोही तत्वों को बल मिल जाता है। भ्रष्ट, स्वार्थी और टिकट लोलुप लोग तर्क देते हैं कि क्या कीजिएगा, जमाना ही बदल गया है। पर इस जमाने को और भी अधिक गिरावट की ओर बदलने में आपका कितना योगदान हो रहा है, यह बात वे नहीं बताते। वे इस बात पर भी कोई टिप्पणी नहीं करते कि टिकटलोलुपों के ऐसे व्यवहार के कारण ही वंचित लोगों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अनास्था बढती है। इस अनास्था का लाभ अराजक व देशद्रोही तत्व उठा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि ऐसे टिकटलोलुप व स्वार्थी लोगों को सत्ता या ताकत के पद तक पहुंचने से मतदान के जरिए ही जनता ही रोक सकती है। वह अवसर आ गया है। इस बार चूक जाने पर काफी देर हो चुकी होगी। इसलिए भरसक बेहतर उम्मीदवारों का चुनाव जरूरी है।

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