सन 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए दस राज्यों की कांग्रेस कमेटियों ने महात्मा गांधी के नाम का प्रस्ताव किया।पांच राज्यों ने सरदार पटेल और तीन राज्यों ने जवाहर लाल नेहरू के नाम प्रस्तावित किये ।
महात्मा गांधी अध्यक्ष चुन लिये गये। पर उन्होंने यह पद अस्वीकार कर दिया। मोतीलाल नेहरू तब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि यदि गांधी जी यह पद स्वीकार नहीं करते हैं तो यह पद जवाहर लाल को ही मिलना चाहिए। नियम के अनुसार दूसरी वरीयता के आधार पर सरदार पटेल अध्यक्ष बनते । पर सरदार पटेल ने खुद ही अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया। इसके बाद मोती लाल नेहरू ने लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता का भार अपने पुत्र यानी जवाहर लाल के कंधे पर डाल दिया। जब जवाहर लाल नेहरू अध्यक्ष बने तो कांग्रेस के सम्मेलन मंच पर खुशी में मोती लाल नेहरू ने पंजाबी लुंगी पहन कर डांस किया था। यह सब देख कर कई लोग अचंभित थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि चूंकि गांधी जी इस बात के पक्ष में नहीं थे, इसलिए उन्होंने जवाहर लाल के नाम का प्रस्ताव तक नहीं किया जबकि उन्होंने खुद उससे पहले अन्य अवसरों पर सरोजनी नायडु और डा.अंसारी के नाम का प्रस्ताव किया था।
इससे पहले महात्मा गांधी मोतीलाल नेहरू को यह लिख चुके थे कि मैं जवाहर लाल नेहरू को अभी अध्यक्ष पद के योग्य नहीं मानता। मोतीलाल नेहरू को गांधी जी ने 26 अगस्त 1927 को लिखा था कि मैं अभी तक जवाहर लाल के निर्वाचन के पक्ष में नहीं हूं। मोतीलाल नेहरू पत्र और तार के जरिए लगातार उनसे जवाहर लाल को यह पद देने का आग्रह करते रहे थे। ऐसा नहीं कि गांधी जी 1929 में इस पक्ष में हो गये थे। पर वे ऐसा होने से रोक भी नहीं सके।
अब आजादी के बाद की कहानी सुनिए। कुलदीप नायर को लाल बहादुर शास्त्री ने कभी बताया था कि जवाहर लाल जी के मन में उनकी बिटिया है। इस संबंध में श्री नायर का एक अप्रैल 2009 को एक अखबार में लेख छपा । नायर के अनुसार,‘लाल बहादुर शास्त्री ने मुझे बताया था कि नेहरू के मन में हमेशा इंदिरा को आगे लाने की बात रहती थी।’ जवाहर लाल नेहरू किसे अपना उत्ताधिकारी बनाना चाहते थे,यह बात 1958 और 1959 में ही देश और कांग्रेस के सामने साफ हो गई थी । इंदिरा गांधी सन 1958 में कांग्रेस कार्य समिति की सदस्य बना दी गईं।उस समय उनकी उम्र मात्र 41 साल थी। याद करिए कि उन दिनों अनेक दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी कांग्रेस में मौजूद थे जिनके वाजिब हक को नजरअंदाज करके इंदिरा गांधी को यह महत्वपूर्ण पद दिया गया था। यह परिवारवाद के अलावा और क्या था ? सन 1959 में तो हद हो गई जब इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष ही बन गई। याद रहे कि यह सब जवाहर लाल जी के जीवन काल में ही हुआ। नेहरू का निधन 1964 में हुआ।
जब मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू परिवार वाद को आगे बढ़ाने पर अमादा थे तो बाद के नेहरूवंशियों के बारे में क्या कहना ? नतीजा है कि अब तक नेहरू-इंदिरा वंश के चार सदस्य कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके है। राहुल गांधी लाइन में हैं। ऐसा दुनिया के किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में नहीं हुआ है कि एक ही खानदान सबसे लंबे समय तक न केवल प्रधान मंत्री पद पर रहे बल्कि पार्टी के अध्यक्ष पद पर भी।
मोती लाल नेहरू,जवाहर लाल नेहरू,इंदिरा गांधी,राजीव गांधी और सोनिया गांधी का अध्यक्ष पर मिला जुला कार्यकाल करीब एक चौथाई सदी का रहा।अभी तो यह सिलसिला जारी ही है।
यह गहन शोध का विषय है कि लोकतंत्र में कोई एक खानदान इतने अधिक वर्षों तक सत्ता में कैसे रह पा रहा है। क्या लोकतंत्र में कोई खोट है ?क्या प्रतिपक्षी दल में जान नहीं है।क्या देश का राजनीतिक नेतृत्व दिवालिया है ?क्या भारत के अधिकतर लोग किसी न किसी रूप में राजतंत्र या फिर खानदान तंत्र को ही पसंद करते हैं ?
अब जरा उस कहानी को एक बार फिर याद कर लिया जाए जिसमें नेहरू का पुत्री -प्रेम जागृत हुआ था।
इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का विरोध करते हुए मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व गांधी जी के सहकर्मी महावीर त्यागी ने 31 जनवरी 1959 को तत्कालीन प्रधान मत्री जवाहर लाल नेहरू को लिखा कि मेरी राय है कि इंदु को कांग्रेस प्रधान चुने जाने से रोको या फिर आप प्रधान मंत्री पद से अलग होकर इंदु की मार्फत कांग्रेस संगठन को मजबूत कर लो। आपके दरबारियों ने केवल निजी स्वार्थवश आपके चारों ओर खुशामद के इतने घनघोर बादल घेर लिये हैं कि आपकी दृष्टि धुंधला गई है। अब समय आ गया है कि आप इन चरण चुम्बकों से सचेत हो जाओ अन्यथा आपकी मान मर्यादा,सरकार और पार्टी सबका ह्रास होने वाला है।
संविधान सभा के सदस्य व कंद्रीय मंत्री रह चुके स्पष्टवादी त्यागी जी ने लिखा कि जैसे मुगलों के जमाने में मंत्रिगण नवाबों के बच्चों को खिलाया करते थे,आज उसी तरह आपकी आरती उतारी जा रही है।आपके इन भक्तों ने इसी प्रकार आपकी भोली भाली इंदु का नाम कांग्रेस प्रधान के पद के लिए पेश किया है और शायद आपने आंख बंद कर इसे स्वीकार भी कर लिया है। इंदु मेरी बेटी के समान है। उसका नाम बढ़े,मान बढ़े इसकी मुझे खुशी है। पर इसके कारण आप पर कोई हर्ज आवे सो मुझे स्वीकार नहीं है। इंदु को अध्यक्ष बनाने का प्रयास सिर्फ आपको खुश करने के लिए किया जा रहा है। इतनी छोटी बात यदि आप नहीं समझ सकते तो मैं कहूंगा कि आपकी आंखों पर परदे पड़ गये, परदे।’
तब की ही सरकार में पनप रहे भ्रष्टाचार के बारे में महावीर त्यागी ने नेहरू को लिखा था कि ‘आज जबकि शासन का ढांचा ढीला पड़ चुका है,रिश्वत और चोरबाजारी का बोलबाला है,साथियों में वह काटा वह मारा वाले पतंगबाजी के नारे लग रहे हैं,जबकि अधिकांश नेतागण मिनिस्ट्री , लोक सभा और विधान सभा की मेम्बरी कर रहे हैं,और केवल चार आने वाले सदस्य मंडलों में रह गये हों,ऐसे जर्जरित कांग्रेस के ढांचे को बेचारी इंदु कैसे संभाल सकेगी ?’
महावीर त्यागी को प्रधान मंत्री ने जवाब देते हुए लिखा कि इंदु को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना ठीक होगा। त्यागी और नेहरू के पत्र की फोटोकापी महावीर त्यागी की उस चर्चित पुस्तक में छपी हैं जिसका नाम है ‘ आजादी का आंदोलन हंसते हुए आंसू।’ जवाहर लाल नेहरू ने महावीर त्यागी को एक फरवरी 1959 को लिखा कि ‘तुमने जो इंदिरा के बारे में लिखा है,उन पहलुओं पर मैंने काफी गौर किया है। मेरा खयाल है कि बहुत तरह से उसका इस वक्त कांग्रेस का अध्यक्ष बनना मुफीद भी हो सकता है। (आजादी का आंदोलन:हंसते हुए आंसू-पेज-229 /)
अब जिनके जीवन काल में उनकी बिटिया कांग्रेस अध्यक्ष बन गई,उनके निधन के बाद उन्हें प्रधान मंत्री ही बनना है,ऐसा संकेत जवाहर लाल जी अपने प्रशंसकों के लिए छोड़ गये। स्वाभाविक है कि खुद गददी से उतर कर इंदिरा को तो नेहरू जी बैठा नहीं सकते थे या फिर बैठाना नहीं चाहते होंगे। याद रहे कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद उन दिनों का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद हुआ करता था।
1964 में नेहरू के निधन के तत्काल बाद ही इंदिरा गांधी को क्यों नहीं प्रधान मंत्री बनाया गया,इस बात का पता नहीं चल सका। पर जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधान मंत्री बने तो इंदिरा गाधी को सूचना व प्रसारण मंत्री जरूर बना दिया गया था। इंदिरा जी की ओर से यह शिकायत शास्त्री जी तक जरूर पहुंचती रही कि प्रधान मंत्री देश को चलाने में इंदिरा जी का सलाह नहीं लेते। महत्वाकांक्षा तो देखिए ! इस बीच 1966 में रहस्यमय परिस्थितियों में ताशकंद में शास्त्री जी की मौत हो गई। इसके बाद कांग्रेस के भीतर और बाहर के नेहरू के खास प्रशंसकों और कांग्रेस के भीतर की लॉबी ने इंदिरा जी को प्रधान मंत्री बनवा ही दिया।
इस लॉबी ने इसलिए बनवाया ताकि वे गूंगी गुड़िया से जो चाहें करा सकें। मोरारजी देसाई से ऐसा वे नहीं करा सकते थे।1966 में हुए कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के चुनाव में इंदिरा गांधी को 355 और मोरार जी देसाई को 169 मत मिले थे।जब इंदिरा जी प्रधान मंत्री बनी थीं तो कुछ बड़े प्रतिपक्षी नेताओं ने उन्हें गूंगी गुड़िया ही नाम दिया था ।
पर कुछ समय बीतते-बीतते कांग्रेस की वह खास लॉबी इंदिरा के खिलाफ हो गयी। क्योंकि इंदिरा जी के सलाहकारों की एक नई मंडली बन गई। अंततः सन 1969 में कांग्रेस का विभाजन ही हो गया। सिंडिकेट के अधिकतर नेता संगठन कांग्रेस में शामिल हो गये। इंदिरा जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस का नाम पड़ा इंदिरा कांग्रेस।इंदिरा जी ने यदि सरकार व राजनीति के क्षेत्र में जनहित और गरीबहित में काम किया होता तो परिवारवाद को लोगबाग बुरा नहीं मानते। पर अपनी ताकत बढ़ाने के लिए उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा जरूर दिया। पर 1971 में जब बड़े बहुमत से सत्ता में आ गई तो वह मारूति का कारखाना खोलवा कर अपने पुत्र संजय गांधी की अमीरी बढ़ाने के काम में लग गई ।
इंदिरा गांधी ने सरकारी भ्रष्टाचार का बचाव करते हुए सार्वजनिक रूप से यह कह दिया था कि यह तो विश्वव्यापी है। इस बयान से भी देश में भ्रष्टाचार बढ़ा और गरीबों तक सरकारी धन और कम पहुंचने लगे।इसी के बारे में राजीव गांधी ने 1985 में यह स्वीकार किया था कि दिल्ली से सौ पैसे चलते हैं और जनता तक उसमें से मात्र 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। देश में ऐसी स्थिति लाने के लिए आखिर कौन जिम्मेदार थे ?आजादी के बाद लाल बहादुर शास्त्री के दो साल से भी कम समय का शासन काल को छोड़ दिया जाए तो नेहरू परिवार ही तो जिम्मेदार था। पर इसके बावजूद परिवारवाद को आगे भी बढ़ाया जा रहा है। इस बीमारी ने तो अब अन्य दलों में भी प्रवेश करके माहमारी का रूप ग्रहण कर लिया है।
आजादी के 63 साल में से 37 साल तक नेहरू परिवार के सदस्य ही प्रधान मंत्री रहे।2004 से अब तक सोनिया गांधी का परोक्ष शासन इस देश पर चल रहा है। इस बीच इंदिरा गांधी ने कुछ समय तक चरण सिंह की सरकार चलवाई और राजीव गांधी ने चंद्रशेखर की सरकार ।यदि आज देश की हालत यह हो चुकी है कि यहां के 77 प्रतिशत लोगों की रोज की औसत आय मात्र 20 रुपये है तो इस गरीबी के लिए नेहरू-इंदिरा परिवार कितना जिम्मेदार है और अन्य लोग कितना ,इस पर चर्चा होती रहती है।
ऐसा नहीं है कि इस देश के पास साधन नहीं है। पर जो भी साधन है उसे मुटठी भर लोग लूट रहे हैं और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। इसके लिए भी कौन जिम्मेदार है ? इसके लिए परिवारवाद कितना जिम्मेदार है ?क्या परिवारवाद के नाम पर अयोग्य नेतृत्व को देश पर थोपे जाने के कारण ही देश की ऐसी दुर्दशा हो रही है ? यह गहन जांच का विषय है।
1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधान मंत्री बना दिया गया जिन्हें सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। उसका नतीजा भी देश ने भुगता। अब सोनिया गांधी कांग्रेस को प्रत्यक्ष और सरकार को परोक्ष रूप से चला रही हैं।जिस एक ही परिवार के सदस्य बारी बारी से 35 वर्षों तक प्रधान मंत्री और 25 वर्षों तक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहे ,उसे इस देश की सफलता या विफलता के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाएगा तो किसे माना जाएगा ? देश की आज जो विकट आर्थिक,राजनीतिक और सामरिक स्थिति है,क्या उसके लिए परिवारवाद को जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए ?/
पाक्षिक पत्रिका पब्लिक एजेंडा से साभार/
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