शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

किसकी पंचायत किसका राज


विनोद उपाध्याय

सच्ची आजादी, लोकतंत्र में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी तथा सत्ता का सही अर्थो में विकेंद्रीकरण जैसी घोषणाओं के साथ 15 वर्ष पूर्व देश में नए पंचायती राज को बहुत उत्साह और उम्मीद से लागू किया गया था। तब से लेकर अब तक विभिन्न राज्यों में इस घोषणा को कार्यरूप में अमलीजामा पहनाने की कोशिश अपने-अपने तरीके से की जाती रही है। यह कोशिश कितनी ईमानदारी के साथ हुई और यह कितनी सफल या असफल रही इस पर कई तरह के मतभेद हैं। कुल मिलाकर सच यही है कि जिस सोच और सपने के साथ नया पंचायती राज लाया गया है वह सफलता अभी कोसों दूर है। हालांकि इसके कारण भी कम नहीं हैं, लेकिन इसमें एक जो सबसे बड़ा कारण है वह लोगों की उदासीनता है। यह उदासीनता इस अर्थ में नहीं कि पंचायत के चुनाव में लोगों की भागीदारी कम है, बल्कि इस अर्थ में कि पंचायतों के कामकाज में लोगों की कोई खास रुचि नहीं है। यह अरुचि जहां एक ओर पंचायतों में व्याप्त अनियमितताओं का कारण है तो दूसरी ओर पंचायत के प्रति लोगों में स्वामित्व और अपनत्व का जो भाव आना चाहिए था वह अभी तक नहीं आ पाया है।
पंचायती राज के माध्यम से आम लोगों की सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी का प्रयास करते हुए पंचायती व्यवस्था को तीसरी सरकार यानी लोकल सेल्फ गवर्नमेंट का दर्जा दिया गया है और इसके लिए 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से कई महत्वपूर्ण प्रावधान भी किए गए हैं। जैसे दायित्वों के निर्धारण के लिए 11वीं अनुसूची का प्रावधान, स्थानीय निकायों के चुनावों को नियमित एवं व्यवस्थित करने के लिए राज्य चुनाव आयोग का गठन, संसाधनों को निश्चित करने के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन, पंचायत व्यवस्था को पूर्ण संवैधानिक दर्जा दिया गया, जिस कारण राज्यों के लिए यह एक बाध्यकारी प्रावधान बना। तीसरी सरकार को चरितार्थ करने के लिए ग्राम सभा को सांविधानिक मान्यता दी गई। आदर्श रूप में ग्राम सभा का वही स्थान होता है जो केंद्र सरकार में लोकसभा का और राज्यों में विधानसभा का है। भारत में सरकार के तीन मुख्य अंग होते हैं- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। केंद्र में विधायिका लोकसभा, कार्यपालिका केंद्रीय मंत्रिमंडल और न्यायपालिका सुप्रीम कोर्ट है। इसी प्रकार राज्य स्तर पर भी सरकार की एक व्यवस्था है, जिसमें विधानसभा, राज्य मंत्रिमंडल और हाईकोर्ट बनाया गया है।
ग्राम सरकार को तीसरी सरकार का दर्जा दिया गया है, इसे स्थानीय स्वशासन की संज्ञा भी दी गई है। इस स्तर पर विधायिका ग्रामसभा है, कार्यपालिका चुने हुए सदस्यों से बनने वाली ग्राम पंचायत और न्यायपालिका का स्थान ग्राम कचहरी या न्याय पंचायत होती है, लेकिन यहां महत्वपूर्ण अंतर यह है कि ऊपर की दोनों सरकारों के स्तर पर चुनाव में मतदाता लोकसभा अथवा विधानसभा के लिए अपना प्रतिनिधि चुनता है। अर्थात वह इन दोनों ही विधायिका के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से करता है, जबकि तीसरी सरकार के स्तर पर वह विधायिका के सदस्यों का नहीं, बल्कि मंत्रिमंडल यानी ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करता है, क्योंकि वह तो तीसरी सरकार की विधायिका का स्वयंभू स्थाई सदस्य है। जहां वह केंद्र और राज्य सरकार के लिए मतदाता की हैसियत से विधायिका के सदस्यों का अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनाव करता है, वहीं तीसरी सरकार में वह ग्राम विधायिका के सम्मानित सदस्य की हैसियत से कार्यपालिका यानी मंत्रिमंडल का चुनाव करता है। निश्चित रूप से उसकी यह भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण और गौरवशाली होती है, लेकिन क्या गांव के इस आम आदमी को अपनी इस हैसियत और महत्वपूर्ण भूमिका का कहीं से कोई अहसास या समझ होता है? यह एक बड़ा प्रश्न है। इसी प्रश्न को लेकर पंचायत चुनाव में गांव के नागरिकों के बीच में जाने की आवश्यकता है। पंचायत चुनाव के दौरान लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए इस सवाल को केंद्रीय विषय के रूप में लेना होगा। इसी के इर्द-गिर्द लोकतंत्र और विकास में आम आदमी की भूमिका को सही अर्थो में समझना और समझाना होगा। इसे और अधिक गहराई से समझने की आवश्यकता है-सही अर्थो में ग्रामसभा ही वास्तविक पंचायत यानी तीसरी सरकार है।
संस्कृति और संविधान दोनों दृष्टियों से पंचायत भारतीय संस्कृति की एक प्रवाहमान धारा है। शताब्दियों से लोकजीवन में यह स्वीकार्य है और व्यवहार में है। लोकजीवन में पंचायत शब्द का प्रयोग उस बैठक के अर्थ में होता आया है जो किसी बिंदु पर लोगों की परस्पर चर्चा के लिए होती रही है यानी गांव की बैठकी को ही पंचायत कहा जाता रहा है। दूसरे रूप में गांव की बैठक अर्थात गांव की सभा को ही सही अर्थो में पंचायत कहा जाता है। इस तरह संस्कृति और लोकजीवन में गांव की बैठक यानी ग्रामसभा ही पंचायत है। 73वें संविधान संशोधन में पंचायतीराज की जो अवधारणा विकसित हुई उसमें आम आदमी का लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्यक्ष भागीदारी का लक्ष्य केंद्र में रहा। महात्मा गांधी सहित देश के सभी प्रमुख राष्ट्र नायकों ने पंचायती व्यवस्था को सहभागी लोकतंत्र की संज्ञा देते हुए इसे प्रतिनिधित्व लोकतंत्र के विकल्प के रूप में परिभाषित किया है। सहभागी लोकतंत्र चुने हुए सदस्यों के निकाय ग्राम पंचायत से नहीं अभिव्यक्त होता, बल्कि वह तो सामान्य मतदाताओं के समूह ग्रामसभा में होता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से संविधान की दृष्टि में भी ग्रामसभा ही वास्तविक पंचायत है। दुर्भाग्य से यह समझ आज तक लोगों के बीच नहीं फैलाई जा सकी है और साथ ही सरकार के स्तर पर अभी ग्राम सभाओं को उनका यह दर्जा भी पूरी तरह से नहीं दिया गया है। चुने हुए सदस्यों के समूह को ही एकमात्र पंचायत के रूप में चिह्नित किया जा रहा है और दुर्भाग्य तो यह है कि सदस्यों का समूह नहीं, बल्कि केवल सरपंच, प्रधान या मुखिया ही एकमात्र अकेले पंचायत बनकर बैठा हुआ है।
पंचायत चुनाव में मतदाताओं की जागरूकता की बजाय ग्रामसभा सदस्यों की जागरूकता का अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है। चूंकि चुनाव में ग्रामसभा अपनी कार्यकारिणी का चुनाव करने जा रही है इसलिए ग्रामसभा के सदस्यों को ग्रामसभा की सही स्थिति के प्रति सचेत करते हुए गांव के सार्वजनिक हित के दूरगामी लक्ष्य को लेकर सदस्यों के चुनाव के प्रति सजग करना होगा। इस अंतर को देखते हुए निश्चित रूप से ग्रामपंचायत के चुनाव में आम नागरिक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि वह अपनी इस भूमिका को मात्र एक मतदाता के रूप में ही पहचान और समझ पा रहा है तो निश्चित रूप से उसके प्रति वह उतना गंभीर नहीं होगा जितना वास्तव में उसे होना चाहिए। इस रूप में ग्रामसभा के सदस्य की महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति इस मतदाता को जागरूक करना होगा ताकि वह गांव में तीसरी सरकार के लिए एक प्रभावी और सक्षम मंत्रिमंडल गठित कर सके और साथ ही इस मंत्रिमंडल पर निरंतर अपनी पकड़ बनाए रख सके। यहां उसकी भूमिका इतने भर से समाप्त नहीं होती, बल्कि इससे भी दो कदम और आगे बढ़कर उसे आगामी कार्यपालिका के मंत्रिमंडल को अगले पांच वर्ष के लिए एक लोक एजेंडा भी सौंपना होगा। इसके लिए पंचायत सदस्यों के चुनाव से पूर्व जनभागीदारी से ग्रामसभा बैठक बुलाकर एक ऐसा लोक घोषणापत्र तैयार करना होगा, जिसमें मनुष्य और प्रकृति दोनों ही संसाधनों के विकास के विषय तय किए जाएं। शिक्षा, स्वास्थ्य और सदभावना जैसे मुद्दे यदि मानव विकास के लिए हों तो जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों के मुद्दे भी शामिल किए जाएं। यह लोक घोषणापत्र स्थानीय आवश्यकता और संसाधनों की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाना चाहिए। इसी लोक घोषणापत्र को आधार बनाकर तीसरी सरकार के मंत्रिमंडल यानी ग्राम पंचायत के लिए सुयोग्य, तटस्थ एवं सक्षम सदस्यों को चुनने में जनता को मदद मिलेगी। ग्रामसभाओं को इस घोषणापत्र के आधार पर प्रत्याशियों के बीच उनकी समझ और प्रतिबद्धता का मापन करने के लिए सार्वजनिक चर्चा का भी कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए, ताकि सही सदस्यों के चुनाव में सुविधा हो। यहां पर एक और महत्वपूर्ण संदर्भ को रेखांकित करना आवश्यक होगा। यह है लोक उम्मीदवार का। लोक उम्मीदवार यानी एक ऐसा प्रत्याशी जो सामान्य जनता या आम मतदाताओं की परस्पर सहमति के आधार पर तय किया गया हो। निश्चित रूप से आज की तारीख में यह सबसे कठिन कार्य है। बहुमत पर आधारित संसदीय चुनाव व्यवस्था के समर्थक और अभ्यस्त लोगों के लिए यह एक अव्यावहारिक स्थिति है, लेकिन भारत का गांव समाज जो शताब्दियों से परस्पर सहमति और सहयोग के संस्कार का अभ्यस्त है, उसके लिए यह कठिन नहीं कहा जा सकता।
विशेषकर पंचायत चुनाव के संदर्भ में जो उसके प्रत्यक्ष संबंधों की ही परिधि में सिमटा होता है। यहां जयप्रकाश नारायण का यह कथन प्रासंगिक होगा, जो उन्होंने पंडित नेहरु द्वारा पंचायतीराज लागू किए जाते समय 1962 में कहा था कि जाति और धर्म में बंटे हुए गांवों में यदि बहुमत के आधार पर पंचायत चुनाव हुए तो इन गांवों को नष्ट होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। उन्होंने लोगों से अपील भी किया कि वे सर्वसहमति से पंचायतों में चुनाव संपन्न करें। यह एक अच्छी बात है कि वर्तमान समय में लगभग सभी राज्य सरकारें इसे प्रोत्साहित कर रही हैं। जिन गांवों में सर्वसहमति से पंचायत चुनाव होते हैं, उन्हें विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जा रहा है। भले ही ऐसी पंचायतों की संख्या बहुत कम है, लेकिन इससे इस दिशा में संभावनाओं का द्वार तो खुला ही है।
यह कहना गलत न होगा कि ग्राम पंचायतें हमारे लोकतंत्र का मूल आधार हैं। आज जबकि राजनीतिक मूल्यों और परंपराओं में तेजी से गिरावट आ रही है तो ऐसे में यह संस्था राजनीति की दिशा बदलने और उसे जनसरोकारों से जोडऩे में अहम भूमिका निभा सकती है। पंचायत चुनाव आज की राजनीतिक गंदगी का शिकार न होने पाएं इसके लिए जरूरी है कि समाजसेवी कार्यकर्ताओं के माध्यम से इन चुनावों के महत्व के बारे में जनजागरूकता लाई जाए। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि पंचायत चुनावों को भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तर्ज पर दलगत आधार पर संपन्न कराया जाता है तो इससे हमारी सामाजिक संरचना के साथ-साथ लोकतांत्रिक संरचना पर भी गंभीर असर पड़ेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज ग्रामपंचायत चुनावों में भी धीरे-धीरे धर्म, जाति जैसे मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों की तरह इस्तेमाल किए जाने लगे हैं। गांवों के विकास के लिए सरकार द्वारा काफी धन दिया जा रहा है, जिसे देखते हुए अब गांवों में बाह्य हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। इसका प्रभाव पंचायत चुनावों के दौरान भी देखने को मिलता है, जब बाहुबल और धनबल के माध्यम से यहां चुनाव का प्रबंधन किया जाता है।
आज यह आवश्यक हो चुका है कि संविधान में यह प्रावधान किया जाए कि ग्राम स्तर पर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप न हो। यदि ऐसा होता है तो इसके लिए इन्हें दंडित किया जाए। हालांकि लोकतंत्र में सभी को प्रचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह प्रवृत्ति घातक साबित हो सकती है। इसलिए तात्कालिक दृष्टि से चुनाव ढ़ांचे में गुणात्मक बदलाव की दिशा में पहल की जा सकती है। हालांकि यह देखने में आया है कि ज्यादातर राज्य सरकारों ने ग्राम स्तर के चुनावों को प्रभावित करने से खुद को अलग ही रखा है, लेकिन आने वाले समय में भी यह बना रहे इसके लिए संवैधानिक नियम बनाने जरूरी होंगे। जनजागरुकता लाकर सर्वसहमति द्वारा उम्मीदवारों का चयन हो और इसे राजनीतिक दंगल का रूप न दिया जाए।
मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों और ग्राम पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करके राज्य सरकार महिला सशक्तिकरण का दम भर रही है, लेकिन अब तक के अनुभव बताते हैं कि जन प्रतिनिधि बनने और शहरों एवं गांव की सत्ता संचालन करने के बाद भी महिलाओं को मारपीट, प्रताडऩा, अपमान और अत्याचार से मुक्ति नहीं मिली है. पुरुषों के वर्चस्व वाले हमारे समाज की मानसिकता में कोई सुधार नहीं आया है.
2007-08 में एक ग़ैर सरकारी सामाजिक संगठन ने गहन सर्वेक्षण और अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि छह महीनों के दौरान राज्य में लगभग एक हज़ार महिला पंचायत प्रतिनिधियों के साथ मारपीट, प्रताडऩा और अपमान के मामले सामने आए! लेकिन इससे कहीं अधिक संख्या में वे महिला जनप्रतिनिधि हैं, जो अपना अपमान उजागर नहीं होने देतीं. महिला सरपंचों को उनके अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है. स्वतंत्रता दिवस-गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर उन्हें झंडारोहण तक नहीं करने दिया जाता.
पिछले दिनों शिवपुरी जि़ले में एक आदिवासी महिला सरपंच के साथ सरेआम मारपीट कर उसे अपमानित किया गया. सरपंच का अपराध यह था कि उसने दबंगों का कहना मानने से इंकार कर दिया था. शिवपुरी जि़ले के सतनापाड़ा कला गांव की सरपंच तुलसीबाई ने आदिवासी होकर गांव के तथाकथित बड़े लोगों के सामने मुंह खोलने की हिम्मत की थी. सरपंच की पिटाई ग्राम पंचायत के पंचों ने की. तुलसीबाई बताती है कि दो पंच अपने चार अन्य साथियों के साथ उसके घर आए और पांच हज़ार रुपये एवं एक बोरी गेहूं की मांग करने लगे. इंकार करने पर उसे घसीटते हुए घर से बाहर लाया गया और सरेआम उसकी पिटाई की गई. सभी हमलावर ठाकुर जाति के हैं, जिनका उस गांव में खासा दबदबा है. तुलसीबाई ने थाने में घटना की रिपोर्ट लिखवा दी है, लेकिन अब वह इतनी डर गई है कि सरपंची छोडऩे का विचार कर रही है.
2007-08 में एक ग़ैर सरकारी सामाजिक संगठन ने गहन सर्वेक्षण और अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि छह महीनों के दौरान राज्य में लगभग एक हज़ार महिला पंचायत प्रतिनिधियों के साथ मारपीट, प्रताडऩा और अपमान के मामले सामने आए! यह पहला मामला नहीं है, जब किसी महिला सरपंच के साथ इस तरह की घटना हुई है, बल्कि प्रदेश में लगभग हर दिन कोई न कोई महिला पंच या सरपंच पुरुष प्रधान समाज की प्रताडऩा का शिकार बनती है. सागर जि़ले के केरनवा ग्राम पंचायत की सरपंच संतोष रानी तो आज भी उस दिन को कोसती है, जब उसने घर-परिवार विशेष रूप से श्वसुर के दबाव में आकर सरपंच का चुनाव लडऩे का फैसला किया था. गांव के दबंगों को उसका सरपंच बनना कभी भी रास नहीं आया.
लिहाज़ा चुनाव के दौरान यहां हिंसा से निपटने के लिए पुलिस की देखरेख में मतदान हुए. यही नहीं, चुनावी रंजिश के चलते गांव में हुई एक हत्या के लिए उसके पति को गिरफ़्तार कर लिया गया. अब संतोष रानी पति के बरी होने की आस लगाए बैठी है. वह केवल नाममात्र की सरपंच है. दबंगों के खौफ़ से संतोष रानी गांव के बाहर खेत में बने मकान में रहती है.सिवनी जि़ले की डुगरिया गांव की स्नातक सरपंच सईजा इईके को भी आएदिन गांव के बड़े लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है. दबंग उसे सरपंच मानने से इंकार करते हैं. यहीं नहीं, सरेआम शराब पीकर गाली-गलौच, अपशब्दों का प्रयोग करना वे अपना अधिकार समझते हैं. अधिकारियों से शिकायत करने पर भी कोई कार्रवाई नहीं होती है. आष्टा की एक अन्य महिला सरपंच को अपने बेटे की बारात निकालने से इसलिए वंचित रहना पड़ा, क्योंकि वह दलित थी. छतरपुर जि़ले के महोईकला गांव में तो अराजकता की सारी हदें पार करते हुए महिला सरपंच इंदिरा कुशवाह के साथ पहले तो कुछ लोगों ने जमकर मारपीट की और फिर उसे निर्वस्त्र करके गांव भर में घुमाया गया. गांव में दो गुटों के बीच वर्षों से चली आ रही रंजिश का खामियाज़ा पिछड़े वर्ग की इस महिला सरपंच को भुगतना पड़ा.यहां बात सर्फ़ि किसी महिला की प्रताडऩा, अपमान अथवा तिरस्कार की नहीं है. विचारणीय तथ्य यह है कि महिला सरपंच किसी पंचायत का प्रतिनिधित्व करती है, जो लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है. किसी सरपंच का अपमान गांधी जी के उस सपने का अपमान है, जो उन्होंने पंचायती राज के ज़रिए देखा था.
पंचायतों के जरिए गंावों के हालात बदलने का सपना महात्मा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक ने देखा था और अब मनमोहन सिंह एवं राहुल गांधी भी देख रहे हैं, लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के चुनावों के लिए जो मारामारी और हिंसा हो रही है, उसने पंचायती राज के उद्देश्यों पर पानी फेर दिया है। ग्राम प्रधानी और पंचायत सदस्यों का चुनाव जीतने के लिए कई दावेदारों के बीच जंग छिड़ी हुई है। इन चुनावों से गांवों में दलबंदी, गुटबंदी और वैमनस्य का वातावरण पैदा हो गया है। हिंसा और गुटबंदी की बुनियाद पर हुए ग्राम पंचायतों के चुनाव से गांवों की दशा और दिशा के सुधार की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है। केंद्र सरकार ने गांवों के विकास के लिए भारत निर्माण के नाम से एक विशाल योजना भी लागू की है। सिंचाई, सड़क, आवास निर्माण, विद्युतीकरण और दूरसंचार के जरिए ग्रामीण आधारभूत संरचना खड़ी करने के लिए यह एक महत्वाकांक्षी योजना है। सरकार ने अब तक इस पर 1740 अरब रुपये खर्च खर्च किए हैं। यूपीए सरकार पंचायतों के जरिए महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना पर भारी धनराशि खर्च कर रही है। केंद्र एवं राज्य सरकारें हर साल गांवों और ग्रामीणों के विकास के नाम पर अरबों रुपये भी खर्च करती हैं, लेकिन खेत खलिहान और मजदूर की दशा जस की तस है। अब सवाल इस बात का है कि आखिर यह धन जाता कहां है। इस सवाल का ईमानदारी से जवाब राजीव गांधी ने तब दिया था, जब वह राजनीति में नए-नए थे। उन्होंने माना था कि सरकार से मिले धन का एक चौथाई से भी कम हिस्सा योजनाओं में लग पाता है, शेष दलालों की जेब में चला जाता है। जब जमीनी हकीकत ऐसी भयावह हो तब विकास और खुशहाली की कल्पना कैसे की जा सकती है?
किसान और गांव हमारे नेताओं का प्रिय शगल है। आजादी के बाद हर सरकार और प्रत्येक प्रधानमंत्री ने ग्रामीण विकास के लिए कोई न कोई योजना शुरू की। आज स्थिति यह है कि योजनाओं की भरमार से भ्रम की स्थिति बनी हुई है। एक ही उद्देश्य को लेकर कई-कई योजनाएं हैं और उनके बीच तारतम्य का अभाव है। इन योजनाओं का नियंत्रण अलग-अलग मंत्रालयों और प्रशासकीय इकाइयों के अधीन होने से पैसे का उपयोग कम, दुरुपयोग अधिक होता है। पेंचदार नियम-कायदों में उलझी इन योजनाओं का दुहने का रहस्य केवल बिचौलिए और भ्रष्ट अफसर ही जानते हैं। जिस गरीब जनता के लिए इन्हें तैयार किया जाता है, बहुधा उसे इनकी भनक तक नहीं लग पाती। राजीव गांधी ने इस मकडज़ाल को काटने के लिए पंचायती राज कानून बनाया, लेकिन वह भी अफसरशाही अनुभवहीनता, तकनीकी जानकारी की कमी और अधिकारों के अभाव में प्रभावी नहीं बन पाया। जब से सरकार ने ग्राम पंचायतों को विकास के लिए धन देने की व्यवस्था की है, ग्राम पंचायतों में जातिवाद व दलबंदी और अधिक बढ़ गई है। ग्राम पंचायत की योजनाओं से गांवों का तो कोई खास भला नहीं हुआ, लेकिन प्रधान से लेकर ब्लॉक के अधिकारी तक मालामाल हो गए। साइकिल पर चलने वाले ग्राम प्रधान और ब्लॉक प्रमुख देखते ही देखते मोटर साइकिल और शानदार जीपों पर चलने लगे। जाहिर है कि जो धनराशि योजनाओं पर खर्च होनी चाहिए, उसका बड़ा हिस्सा ग्राम प्रधान, ब्लॉक के अधिकारी, बैंक के मैनेजर और ठेकेदार किस्म के दलालों के हाथ में चला गया। गांव का गरीब तो देखता ही रह गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि इस देश की ग्राम सभा एवं ग्राम समाज व्यवस्था पूरी तरह से विफल हो चुकी है। संस्थाएं भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी हैं। ऐसी स्थिति में इस व्यवस्था को नीचे से ऊपर तक पुनरीक्षित किए जाने की जरूरत है।
न्यायालय ने भारत सरकार और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वह ग्राम सभा एवं ग्राम समाज की वर्तमान व्यवस्था को तत्काल पुनरीक्षित करें। आम लोगों को अक्सर यह कहते सुना जाता है कि पंचायती राज कानून तो लागू हुआ, लेकिन वह उनके पास नहीं पहुंचा है। उनकी शिकायत है कि अंग्रेजी राज्य के समय में जिस ढंग से और जिस प्रकार के लोगों का शासन उन पर चलता था, वैसा ही अब भी चल रहा है। वे पाते हैं कि स्थानीय शासन कार्यो में उनका कोई हाथ नहीं है और छोटा से छोटा राजकर्मचारी भी उनके प्रति किसी रूप से उत्तरदायी नहीं है। उल्टे वही उन पर धौंस जमाता है और पहले की ही तरह उनसे रिश्वत वसूलता है। इस सच्चाई का सामना करना होगा कि जनता को स्वराज्य-भावना की अनुभूति नहीं हो पाई है।
हमारे लोकतांत्रिक कार्यकलाप में केवल थोड़े से शिक्षित मध्यम वर्ग के लोग संलग्न हैं, और उनमें भी वही हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक कार्यो में लगे हुए हैं। इस परिस्थिति के परिणामस्वरूप हम पाते हैं कि हमारा लोकतंत्र एक बहुत ही संकीर्ण आधार पर टिका हुआ है। पंचायती राज में सत्ता एवं प्रशासन के तीन स्तर हैं- ग्राम पंचायत, प्रखंड पंचायत समिति और जिला परिषद। इनमें से प्रत्येक स्तर पर जनता की शक्ति की मर्यादा के अंदर उसे दायित्व उठाने का अवसर दिया जाना चाहिए। ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत जिला दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) एवं समाहर्ता (कलेक्टर) मुख्य अधिकारी होते थे। उनकी स्थिति आज भी वैसी ही है, लेकिन पंचायती राज में यदि सत्ता का वास्तविक वितरण होता है तो जिला दंडाधिकारी का अंतत: लोप हो जाना चाहिए या उसको राज्य सरकार के प्रतिनिधि मात्र के रूप में रखना चाहिए, जैसा कि राज्यों में राज्यपाल केंद्रीय सरकार के प्रतिनिधि मात्र होते हैं। पंचायती राज, राजस्थान में भी जहां उसकी शुरुआत हुई, इस उद्देश्य से बहुत दूर है। पंचायती राज के जन्म के पहले भी ग्राम पंचायतें थीं, लेकिन वे उस समय ग्रामीण लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करती थीं, बल्कि राज्य सरकारों या उससे भी बदतर स्थानीय अधिकारियों के एजेंट के रूप में काम करती थीं। अगर पंचायती राज के अंतर्गत भी ग्राम पंचायतें, सुसंगत रूप से ग्रामीण समुदाय की शक्ति, सत्ता और पोषण प्राप्त नहीं करती हैं तो वे पहले की तरह राज्य सरकार व उसके अधिकारियों द्वारा ग्रामीण जनता को नियंत्रित व प्रभावित करने का औजार बनी रहेंगी। ऐसी बुनियाद पर खड़ा पंचायती राज नीचे से ऊपर उठने वाले लोकतंत्र का ढांचा नहीं है, बल्कि ऊपर से संचालित नौकरशाही शासन-पद्धति का विस्तार ही कहा जाएगा। गांधी जी ने जिस पंचायती राज की कल्पना की थी, उसमें ग्राम पंचायतों के लिए अपनी जरूरत का तमाम अनाज, कपड़े के लिए कपास खुद पैदा करने की योजना बनाई गई थी। पंचायतों को धन देकर भ्रष्ट बनाने की बात कहीं नहीं कही गई है।
गांधी जी चाहते थे कि हर गांव को अपने पांव पर खड़ा होना होगा और अपनी जरूरतें खुद पूरी करनी होंगी ताकि वह अपना सारा कारोबार खुद चला सकें। आवश्यकता इस बात की है कि हम उपलब्ध संसाधनों का उपयोग अपनी देश की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार करें। फिलहाल केंद्र सरकार पंचायतों को ताकतवर बनाने के लिए जिस कार्य योजना पर काम कर रही है, उसके तहत यह तय हुआ है कि हर राज्य जिला योजना कमेटियां गठित करेगा, जो योजना और बजट निर्माण में राज्य और निचली पंचायतों के बीच पुल का काम करेंगी। लेकिन अभी इसकी कार्यप्रणाली स्पष्ट नहीं है। इस सिलसिले में यह याद दिलाने की जरूरत है कि पंचायती राज का पूरा ढांचा तब तक बेमतलब है, जब तक कि हर स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही तय नहीं होती। इसलिए सूचना का अधिकार अपने पूरे अर्थ में लागू करना होगा और साथ में सूचना को प्रशासनिक एवं आंकड़ों की लफ्फाजी से आजाद कर इतना सहज बनाना होगा कि हर कोई उसे समझ ले। असल में किसी अधिकार और कानून को सही तरह से लागू करने में ही उसका इम्तिहान होता है। हमारी पंचायतें भी उतनी ही निकम्मी, भ्रष्ट और अन्यायकारी हो सकती हैं, जितनी कि कोई और संस्था। इसलिए बाबूशाही से बचते हुए, कायदे-कानूनों के छेद भरते हुए, मनमर्जी फैसलों की गुंजाइश खत्म करते हुए और व्यावसायिक तरीकों के लिए जगह बनाते हुए पंचायती राज व्यवस्था को नए सिरे से गढऩा होगा। तभी वह नए भारत की तकदीर लिख सकेगा।
आजादी के बाद देश में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए ढेर सारे प्रयास किए गए और इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। इन्हीं प्रयासों की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत में पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना भी रही है। हालांकि भारत के ऐतिहासिक संदर्भ को खंगालने से स्पष्ट हो जाता है कि पंचायतीराज व्यवस्था भारत के लिए कोई नई बात नहीं है। वैदिक कालीन समाज के ऐतिहासिक संदर्भो से तमाम ऐसी जानकारियां प्राप्त होती हैं, जिससे साबित हो जाता है कि उस दौर में भी स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था विद्यमान थी। दक्षिण भारत के चोलकालीन प्रशासन का तो आधार ही स्थानीय स्वशासन पर टिका था। पंचायती राज व्यवस्था को लोकतांत्रिक स्वरूप देने का काम आजादी के बाद ही शुरू हुआ।
आजादी के बाद 2 अक्टूबर, 1952 को जब सामुदायिक विकास कायक्रम प्रारंभ किया गया तो सरकार की मंशा यही थी कि गांधीजी की पंचायती राज की संकल्पना को जरूर पंख लगे। इस कार्यक्रम के अधीन ही खंड को इकाई मानकर खंड के विकास हेतु सरकारी मुलाजिमों के साथ सामान्य जनता को विकास की प्रक्त्रिया से जोडऩे का प्रयास किया गया, लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि जनता को वास्तविक अधिकार न दिए जाने के कारण यह कार्यक्रम सफेद हाथी ही सिद्ध हुआ। सामुदायिक कार्यक्रम की असफलता के बाद पंचायती राज व्यवस्था को परवान चढ़ाने के लिए 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में ग्रामोद्धार समिति का गठन किया गया। इस समिति ने भारत में त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की। इसी समिति ने पंचायती राज को सशक्त बनाने के लिए गांवों के समूहों के लिए प्रत्यक्षत: निर्वाचित पंचायतों, खंड स्तर पर निर्वाचित तथा नामित सदस्यों वाली पंचायत समितियों तथा जिला स्तर पर जिला परिषद गठित करने का सुझाव दिया।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश को 1 अप्रैल, 1958 को लागू किया गया। राजस्थान राज्य की विधानसभा ने इसी समिति के सुझाव के आधार पर 2 सितंबर, 1959 को पंचायती राज अधिनियम की संस्तुति कर दी। 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था को सबसे पहले लागू किया गया। इसके बाद पंचायती राज व्यवस्था को अन्य राज्यों ने भी अपने यहां लागू करना शुरू कर दिया।

हाशिए पर 'अन्नदाता'




पंजाब में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रूक रहा है। पंजाब कृषि में अग्रणी राज्य है। सिर्फ संगरूर और बरनाला जिले में पिछले दशक में 3,000 से अधिक किसान अपमान से बचने के लिए संघातिक रास्ता अपना चुके हैं। बढ़ते कर्ज के बोझ तथा ऋणदाताओं द्वारा पैसे वसूलने के लिए किए जा रहे अपमान के कारण किसान खुद को हताश महसूस कर रहे हैं। खेती सम्बन्धी व्यथा का यदि यथार्थवादी और समग्रता से अध्ययन कराया जाए तो मैं पूर्ण रूप से आश्वस्त हूं कि पंजाब आत्महत्या के मामले में कुख्यात महाराष्ट्र के विदर्भ को भी पीछे छोड़ते हुए सबसे ऊपर होगा।
भारत खेती सम्बन्धी समस्याओं का सामना ऎसे समय कर रहा है जब हाल ही में कनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने खेती की आधुनिक तकनीक बेचने के लिए 50,000 करोड़ रूपए के समझौते किए हैं।
यह घोषणा चार दिन तक चंडीगढ़ में चले एग्री-टेक मेले के समापन पर की गई। कृषि मंत्री शरद पवार ने भी मेले में भाग लिया। पवार उन लोगों में से एक थे जिन्होंने खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने के लिए कृषि-व्यापार उद्योग की जमकर तारीफ की। उद्योगों के मुखिया, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ भी खर्चीले प्रौद्योगिकी उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए कतारबद्घ खड़े थे। इससे अधिक विरोधाभास और कुछ नहीं हो सकता। भारी-कर वाली कृषि मशीनरी ऎसे समय बेची जा रही है जब किसान खेती के मोर्चे पर पहले से कहीं अधिक संकट में जकड़े हुए हैं। इन सबसे ऊपर, पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने यह कहते हुए किसानों का कष्ट दूर करने में असमर्थता जता दी है कि राज्य के पास ऎसा कोई बजट नहीं है कि वह कृषि समुदाय की मदद के मुद्दे पर ध्यान दे सकें।

इतना ही नहीं, कृषि मेले में उन्होंने यह भी कहा कि कर्मचारियों के वेतन भुगतान और राज्य की विभिन्न योजनाओं में धन के आवंटन के बाद पंजाब सरकार के पास किसानों की मदद के लिए धन नहीं बचता है। किसान कितने समय तक व्यवस्थित तरीके से लूटे जाते रहेंगे? किसान न केवल बिचौलियों व साहूकारों द्वारा, अपितु कृषि वैज्ञानिकों , बीज-खाद आपूर्तिकर्ताओं, बीज कम्पनियों तथा सरकार के द्वारा भी लूटे जा रहे हैं। सरकार समर्थन मूल्यों का अनुचित तरीके से निर्धारण करती है। यही समय है जब किसान आर्थिक गुलामी के चंगुल से निकलकर आर्थिक आजादी के लिए नए चरण में प्रवेश करें। किसानों को प्रत्यक्ष आय मदद की मांग क्यों नहीं करना चाहिए। इसका मतलब यह है कि सरकार किसानों को प्रति एकड़ या बीघा हर माह एक निश्चित राशि दे। विदेशों में यह व्यवस्था है।
मेरा दृढ़ता से मानना है कि यही एकमात्र जरिया है जिसके सहारे खेती से जुडे समुदाय को उबारा जा सकता है। कर्ज के बोझ से पिसते किसान को मुक्ति दिलाने और भविष्य की उज्जवल तस्वीर दिखाने का सही तरीका भी यही है। अनाज से भरपूर पंजाब को यह रास्ता दिखाना है। मुझे नहीं मालूम कि पंजाब सरकार यह क्यों नहीं महसूस करती कि उसे किसानों को कम से कम सरकार के चपरासी के समकक्ष तो मानना ही चाहिए। कम से कम हम इतना तो देश के अन्नदाता के लिए कर ही सकते हैं। आप कहेंगे, चपरासी क्यों? बहुत ठीक, क्योंकि एक कृतघ्न राष्ट्र की यह मंशा भी नहीं है कि वह अपने एक चपरासी को जितना वेतन देती है, उसका एक चौथाई ही किसानों को मिले।
मुझसे अक्सर यह कहा जाता है कि मैं नीति-निर्माताओं से कहूं कि वह ऎसी व्यवस्था बनाएं कि एक किसान के परिवार की मासिक आय सरकार के क्लर्क के समकक्ष हो, यह सिफारिश बहुत अधिक की होगी। कम से कम शुरूआत तो होने दीजिए कि किसान सरकार के चपरासी के बराबर आ सके। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद सरकार के एक चपरासी की मासिक आय 15,000 रूपए है। इसके विपरीत नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) द्वारा वर्ष 2003-04 में किए गए सर्वे के अनुसार एक किसान की मासिक औसत आय लगभग 2,115 रूपए आंकी गई थी। किसानों की आय पर एनएसएसओ ने यह आकलन आखिरी बार किया था। इसके बाद सम्भवत: यह आकलन इस वजह से बन्द कर दिया गया कि सरकार जमीनी हकीकत से काफी उलझन महसूस करने लगी। पंजाब में एक कृषक परिवार की मासिक औसत आय प्रतिमाह 32,00 रूपए से अधिक नहीं है। केवल दो ही राज्य ऎसे हैं जहां किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से अधिक है। ये राज्य हैं जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसान एक माह में नरेगा मजदूर से अधिक नहीं कमा पाता। क्या यह दुखभरी बात नहीं है कि भारत का किसान, जो देश का अन्नदाता है, उसकी आय नरेगा मजदूर से भी कम है, लेकिन इससे भी अधिक दुखदायी त्रासदी तो यह है कि बौद्धिक वर्ग हो या कृषि वैज्ञानिक या फिर नीति-निर्माता, कोई भी किसानों की आय बढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं करता। गरीब किसान अपने परिवार समेत खेत में काम करता है, उसे उतने से ज्यादा नहीं मिलता, जितना कि घरेलू नौकरानी रोजाना के एक घंटे के काम में कमा लेती है। यही सचाई है। हम किस तरह का व्यवहार अपने किसान, अपने अन्नदाता के साथ करेंगे?

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

दागदार हो रहा समाजवाद

समाजवाद एक आर्थिक-सामाजिक दर्शन है। समाजवादी व्यवस्था में धन-सम्पत्ति का स्वामित्व और वितरण समाज के नियन्त्रण के अधीन रहते हैं। समाजवाद अंग्रेजी और फ्रांसीसी शब्द सोशलिज्म का हिंदी रूपांतर है। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इस शब्द का प्रयोग व्यक्तिवाद के विरोध में और उन विचारों के समर्थन में किया जाता था जिनका लक्ष्य समाज के आर्थिक और नैतिक आधार को बदलना था और जो जीवन में व्यक्तिगत नियंत्रण की जगह सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे। लेकिन आज के दौर में समाजवाद के पहरूओं की कार्यप्रणाली देखकर ऐसा लगता है जैसे व्यक्तिवाद के बिना समाजवाद की कल्पना ही बेमानी है।
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव समाजवाद के नाम पर राजनीति कर रहे हैं लेकिन उन्होंने और उनके समर्थकों के समाजवाद की एक ऐसी परिभाषा गढ़ दी है कि स्वर्ग में बैठे उनके गुरू
राम मनोहर लोहिया भी आहें भर रहे होंगे। समाजवाद के नाम पर मुलायम ने अपनी महत्वकांक्षाएं पूरी करने के लिए वह सब कुछ किया जिसकी कभी लोहिया ने कल्पना भी नहीं की होगी। आज वही सब मुलायम के लिए परेशानी का सबस बन गया है। समाजवादी पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने आप को स्थापित करके रखना मुश्किल-सा नजर आ रहा है। जो चेहरे कभी समाजवादी पार्टी की पहचान हुआ करते थे, पिछले कुछ समय में एक-एक कर सपा से दूर हो गए. इनमें अमर सिंह भी शामिल हैं जो खुद इनमें से कई की विदाई का सबब बने और अंतत: खुद भी विदा हुए. जमे-जमाए नेताओं के जाने से सपा के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती रही हैं.
'कभी न जिसने झुकना सीखा, उसका नाम मुलायम थाÓ, दो-ढाई वर्ष पहले जब समाजवादी पार्टी के मुख्यालय के गेट के बाहर यह नारा लगा रहे नौजवानों के एक झुंड को कुछ लोगों ने रोकने की कोशिश की और सही नारा - 'कभी न जिसने झुकना सीखा, उसका नाम मुलायम हैÓ, लगाने को कहा तो नाराज नौजवानों ने जवाब दिया, 'नहीं हम तो यही नारा लगाएंगे. या फिर नेता जी अमर सिंह के आगे अकारण झुकना बंद करें.Ó हालांकि यह घटना बहुत छोटी-सी थी, मगर इससे समाजवादी पार्टी के भीतर अमर सिंह की भूमिका और अमर सिंह के कारण समाजवादी आंदोलन को हो रहे नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता था. हालांकि तब तक कार्यकर्ताओं को तो इस बात का एहसास हो गया था कि अमर सिंह के क्या मायने हैं और उनका नफा-नुकसान क्या हैं, लेकिन जमीनी राजनीति के धुरंधर मुलायम सिंह यादव पर अमर सिंह का जादू कुछ इस तरह चढ़ा हुआ था कि वे सब कुछ जानते हुए भी इस हकीकत से अनजान बन रहे थे कि 'अमर प्रभावÓ का घुन समाजवादी आंदोलन को लगातार खोखला करता जा रहा है.
समाजवादी पार्टी को खोखला करने में 'अमर प्रभावÓ ने दो तरह से काम किया. एक ओर इसने समाजवादी पार्टी को अभिजात्य चेहरा ओढ़ाकर अपना चरित्र बदलने के लिए उकसाया तो दूसरी ओर पार्टी में जमीन से जुड़े नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा शुरू हो गई. मुलायम के केंद्रीय रक्षा मंत्री रहते हुए जब 1997 में लखनऊ में समाजवादी पार्टी कार्यकारिणी की बैठक एक पांच सितारा होटल में आयोजित की गई तो आलोचना करने वालों में मुलायम के राजनीतिक विरोधियों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के आम नेता और कार्यकर्ता भी थे. मुलायम सिंह के खांटी समाजवाद का यह एक विरोधाभासी चेहरा था. लेकिन इसके बाद तो यही सिलसिला शुरू हो गया. पार्टी समाजवादी सिद्धांतों और जमीनी राजनीति को एक-एक कर ताक पर रखते हुए 'कॉरपोरेट कल्चरÓ के शिकंजे में फंसती चली गई. नेतृत्व में एक ऐसा मध्यक्रम उभरने लगा जिसे न समाजवादी दर्शन की परवाह थी और न समाजवादी आचरण की चिंता.
समाजवादी पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी हैसियत बचाए रखना इतना मुश्किल कभी नहीं रहा. सिकुड़ती राजनीतिक ताकत, लगातार साथ छोड़ते पुराने साथी, कुछ अपनी उम्र पूरी कर चुकने की वजह से तो कुछ पार्टी में अपनी उपेक्षा के कारण. एक ओर विधानसभा में मायावती का प्रचंड बहुमत और दूसरी ओर लोकसभा चुनाव परिणामों में कांग्रेसी उलटफेर के चलते राज्य में तीसरे स्थान पर सिमटने का खतरा, एक ओर पिछड़ी जातियों पर कमजोर पड़ती पकड़ और दूसरी ओर मुसलिम वोट बैंक पर नजर गड़ाए प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल, बसपाई चालों के चलते सहकारी संस्थाओं और ग्रामीण लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से नियंत्रण खोते जाने का एहसास और छात्रसंघों की राजनीति पर मायावती का अंकुश, केंद्र में महत्वहीन स्थिति और इन सबसे ऊपर, पार्टी पर मुलायम के घर की पार्टी बन जाने की अपमानजनक तोहमत. ऐसी न जाने कितनी वजहें एक साथ समाजवादी पार्टी के हिस्से आई हैं कि कुछ समय पहले तक तो यह भी समझा जाने लगा था कि समाजवादी पार्टी अब उत्तर प्रदेश में तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी बन गई है. कुछ राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने तो इसे गुजरे जमाने की कहकर इतिहास की किताबों में दर्ज रहने के लिए छोड़ देने की बातें तक कह डाली थीं. राजनीति के बारे में यह कहा जाता है कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं होता. उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी इन दिनों यह एक बड़ा सवाल है कि क्या सपा अपने दामन के धब्बों को कभी धो पाएगी और क्या उसका ग्रहण काल अब खत्म होने जा रहा है.

उत्तर प्रदेश में नवंबर की शुरुआत के साथ ही जाड़ों के सर्द मौसम की शुरुआत हो जाती है, लेकिन समाजवादी पार्टी के लिए इस बार का नवंबर सर्दियों में गरमी का सा एहसास लाने वाला साबित हो रहा है. इस महीने में हुई तीन बड़ी घटनाओं ने 'एक थी समाजवादी पार्टीÓ में कुछ नई ऊर्जा का संचार किया है. इनमें पहली घटना मोहम्मद आजम खान की घर वापसी की है तो दूसरी उत्तर प्रदेश विधानसभा के दो उपचुनावों के नतीजे. तीसरी घटना बिहार के चुनाव परिणाम के रूप में है. इन तीनों घटनाओं ने सपा में नई जान फूंकने का काम किया है. कम से कम पार्टी से जुड़े लोगों का तो यही मानना है.
मुलायम के पुराने साथी बेनी प्रसाद वर्मा जो कभी समाजवादी पार्टी में मुलायम के बाद सबसे महत्वपूर्ण नेता माने जाते थे, उन्हें तक साइड लाइन करने की कोशिशें इसी दौरान शुरू हो गई थीं. उन दिनों लखनऊ में समाजवादी पार्टी के मुख्यालय में सपा के एक विधायक सीएन सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा पर आए दिन पार्टी हितों और पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए टेलीविजन कैमरों के सामने खड़े दिखाई देते थे. तब भी हर कोई यह जानता और मानता था कि इस सबके पीछे सीधे अमर सिंह का हाथ है. समाजवादी लोगों को तब इस सबसे काफी पीड़ा होती थी लेकिन समाजवादी आंदोलन को कमजोर करने वाली इस रस्साकशी पर मुलायम हमेशा खामोश ही रहे. हालांकि आज न सीएन सिंह समाजवादी पार्टी में हैं, न अमर सिंह और न ही बेनी प्रसाद वर्मा, मगर इन तीनों के रहने और तीनों के न रहने के बीच समाजवादी पार्टी ने काफी कुछ खो दिया है. जो ज्यादा चालाक थे, मौका परस्त थे, उन्होंने तो मौके का फायदा उठाते हुए अपने लिए उत्तर प्रदेश में मुलायम की सरकार के अंतिम दौर में ही सुरक्षित नावें ढूढ़ ली थीं. मगर बहुतों को बिना तैयारी असमय पार्टी से किनारा करना पड़ा. 'अमर प्रभावÓ से प्रताडि़त, पीडि़त और उपेक्षित-अपमानित होकर सपा से विदाई लेने वालों में राजबब्बर, बेनी प्रसाद वर्मा और मोहम्मद आजम खान सबसे प्रुमख रहे. गौरतलब है कि ये तीनों ही अलग-अलग कारणों से सपा के लिए महत्वपूर्ण थे. राज बब्बर जहां पार्टी के पहले सिने प्रचारक थे, भीड़ जुटाऊ चेहरे थे, वहीं बेनी जमीनी जोड़-तोड़ के माहिर और उत्तर प्रदेश के एक खास इलाके में कुर्मी वोटरों के जातीय नेता. आजम की तो राजनीतिक पैदाइश ही अयोध्या विवाद से हुई थी और इस लिहाज से वे अल्पसंख्यकों की हिमायती पार्टी के सर्वाधिक प्रभावशाली फायर ब्रांड नेता थे. इन तीनों की रुख्सती समाजवादी पार्टी के लिए जोर का झटका रही जिसका असर भी जोर से ही हुआ.
समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ विधायक मानते हैं, राजनीति में विचारधारा के आधार पर साथ छूटना एक अलग बात होती है. ऐसा तो होता ही रहता है, लेकिन समाजवादी पार्टी में तो कई बड़े नेताओं को जबरन बेइज्जत करके बाहर किया गया. इसका सीधा-सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ा. सितंबर, 2003 में जब मुलायम ने उत्तर प्रदेश विधान सभा में बहुमत साबित किया था तो समाजवादी पार्टी के हौसले सातवें आसमान पर थे. लेकिन साढ़े तीन साल की अपनी लंबी पारी में मुलायम पार्टी के हौसले के इस ग्राफ को ऊपर नहीं ले जा सके. वह नीचे ही गिरता गया और इसकी सबसे बड़ी वजह थी अमर सिंह का प्रभाव. इसके साथ ही इन साढ़े तीन वर्षों में जिस तरह का प्रशासन मुलायम सिंह ने चलाया उसने रही-सही कसर पूरी कर दी.
इस दौर में ऐसी भी स्थितियां हो गई थीं कि समाजवादी पार्टी के थिंक टैंक कहे जाने वाले, मुलायम के भाई रामगोपाल यादव तक राजनीतिक एकांतवास में चले गए थे. पार्टी के वैचारिक तुर्क जनेश्वर मिश्र और मोहन सिंह हाशिए पर थे और लक्ष्मीकांत वर्मा जैसे गैरराजनीतिक समाजवादी चिंतक दूर से तमाशा देखकर अरण्य रोदन करने पर मजबूर हो चुके थे. समाजवादी पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेता यह महसूस करते हैं कि उस दौर का खामियाजा पार्टी आज तक भुगत रही है. जिस सत्ता विरोधी लहर पर सवार होकर मायावती ने उत्तर प्रदेश फतेह कर लिया उसकी जड़ें मजबूत करने में सपा का दबंग राज, कार्यकर्ताओं एवं नेताओं की बेलगाम गुंडागर्दी और सरकार का जनसमस्याओं से हटता ध्यान जैसे कारक तो जिम्मेदार थे ही 'अमर प्रभावÓ भी काफी हद तक जिम्मेदार था. अमर सिंह के खास सौंदर्यबोध की चकाचौंध ने धरतीपुत्र को ऐसा मंत्र मुग्ध कर दिया कि वे जमीनी हकीकत से रूबरू हो ही नहीं सके. जिस मुलायम के जनता दरबार एक दौर में खचाखच भरे रहते थे उन्हीं मुलायम से मिल पाना आम आदमी या आम कार्यकर्ता तो दूर विधायकों अथवा अन्य नेताओं के लिए भी मुश्किल हो गया. अमर सिंह हमेशा छाया की तरह मुलायम के साथ होते, उनके एक-एक कदम की नाप जोख कर अमर के चश्मे से होती. सैफई को बॉलीवुड बना देने की चाहत, जया प्रदा के लिए जिद, कल्याण सिंह से एक बार अलगाव के बाद दूसरी बार उनके घर जाकर उन्हें दोस्त बनाने का नाटक, अनिल अंबानी की दोस्ती और दादरी पावर प्लांट जैसे जो तमाम काम मुलायम ने किए उनका पछतावा मुलायम को अब हो रहा होगा और कल्याण से दोस्ती के मामले में तो मुलायम गलती को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करके माफी भी मांग चुके हैं. हालांकि अमर सिंह अब सपा के लिए 'गुजरा जमानाÓ हो चुके हैं, लेकिन इस गुजरे जमाने ने समाजवादी पार्टी के प्रभा मंडल की ओजोन परत में इतना बड़ा छिद्र कर डाला है कि मायावती सरकार के तीन साल के जनविरोधी शासन के बावजूद उससे होने वाला विकिरण पूरी तरह रुक नहीं सका है.
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता अशोक वाजपेयी कहते हैं, हमें अब उज्वल संभावनाएं दिख रही हैं. मौजूदा बीएसपी सरकार से जनता में जबर्दस्त असंतोष है. लेकिन यह सरकार इतनी बर्बर है कि जनता अपने असंतोष को अभिव्यक्त नहीं कर पा रही है. सपा ही इस असंतोष को स्वर दे सकती है. उत्तर प्रदेश का संघर्ष अब मायावती सरकार के अंधेर और समाजवादी पार्टी के सिद्धांतों के बीच ही होगा.
इन उज्वल सम्भावनाओं की तह में नवंबर की वही तीन घटनाएं हैं जिन्होने समाजवादी पार्टी को नई उम्मीद दी है. आजम खान की वापसी समाजवादी पार्टी की अपने बिखरे कुनबे को फिर से बटोरने की कोशिश तो है ही, इसने अल्पसंख्यकों के बीच अपनी विश्वसनीयता बहाल करने की उम्मीद भी पार्टी के भीतर जगा दी है. हालांकि कुछ विश्लेषक इसे एक सामान्य घटना ही मान रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि आजम खान अयोध्या मुद्दे की उपज हैं. जब तक वह मुद्दा जिंदा था आजम की आवाज में दम था. अब जब हाईकोर्ट के फैसले ने अयोध्या मुद्दे की ही हवा निकाल दी है तो यह उम्मीद कैसे की जाए कि उस मुद्दे को लेकर चर्चा में रहने वाले आजम मुसलमानों के बीच कोई बड़ा गुल खिला पाएंगे? उत्तर प्रदेश में मुसलिम समुदाय की बात की जाए तो मोटे तौर पर यह माना जाता है कि किन्हीं खास लहरों को छोड़कर सामान्य चुनावों में उनका वोट 1967 में चौधरी चरण सिंह के बीकेडी बनाने के बाद से ही कांग्रेस से अलग होने लगा था. 4 नवंबर, 1992 को जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाकर अपनी अलग राजनीति शुरू की तो बाबरी मस्जिद पर उनके रुख की वजह से यह मुसलिम वोट एक तरह से उन्हें मिल गया. पिछले विधानसभा चुनाव तक मुसलिम मतदाता के पास समाजवादी पार्टी के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था, लेकिन लोकसभा चुनाव में सपा की कल्याण से जुगलबंदी के चलते कांग्रेस के रूप में उसे एक विकल्प मिल गया. अब अगर मायावती भी मुसलिम आरक्षण जैसा कोई ब्रह्मास्त्र छोड़ती हैं तो उसकी चुनौती भी सपा के सम्मुख खड़ी हो सकती है. फिर भी इतना तो माना जा सकता है कि आजम खान की घर वापसी के बाद समाजवादी पार्टी के पास एक तीखा और प्रभावशाली वक्ता और बढ़ जाएगा जो अल्पसंख्यक मामलों में खुलकर और प्रभावशाली तरीके से उसका पक्ष रख सकेगा. लेकिन कल्याण सिंह से दोस्ती की कड़वी हकीकत अब भी पार्टी के दामन पर चस्पा है. हालांकि सांप्रदायिक समझे जाने वाले पवन पांडे और साक्षी महाराज जैसों को भी मुलायम अपने साथ ला चुके हैं, लेकिन कल्याण से उनकी दोस्ती मुसलिम मानस पचा नहीं पाया है. मुलायम के इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से माफी मांग लेने के बाद भी उनके प्रति पैदा हुआ संदेह खत्म नहीं हुआ है. आजम खान इस संदेह को पूरी तरह खत्म कर पाएंगे इसमें शक है. फिर भी आजम की घर वापसी समाजवादी पार्टी के लिए एक उम्मीद की वापसी तो है ही.
उपचुनावों के नतीजे भी निश्चित तौर पर समाजवादी पार्टी के लिए उत्साहवर्धक हैं. बीएसपी के इन उपचुनावों में वाकओवर दे देने के कारण इन उपचुनावों में मुख्यत: कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को एक-दूसरे की तुलना में अपनी हैसियत आंकने का अवसर मिला था और समाजवादी पार्टी ने इसमें अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी है. वैसे तो एटा जिले की निधौली कलां और लखीमपुर दोनों की ही सीट समाजवादी पार्टी के विधायकों के निधन से खाली हुई थीं और सहानुभूति लहर का लाभ भी उसे मिलना तय था लेकिन कांग्रेस की इन दोनों ही सीटों पर जिस तरह की दुर्गति हुई उसने समाजवादी पार्टी का सीना चौड़ा कर दिया है. खास तौर पर लखीमपुर सीट पर कांग्रेस सांसद के पुत्र सैफ अली की जमानत भी न बच पाने से समाजवादी पार्टी के लिए यह मानना आसान हो गया है कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दौरान पैदा हुआ कांग्रेसी खुमार अब उतार पर है.
बिहार चुनाव के नतीजों ने समाजवादी पार्टी की इस धारणा को और भी पुख्ता कर दिया है. जिस तरह से वहां सोनिया और राहुल का जादू बेअसर होने की बात कही जा रही है उसने समाजवादी पार्टी को बेहद उत्साहित कर दिया है. खासकर बिहार में मुसलिम मतदाताओं की कांग्रेस से दूरी ने सपा को जबर्दस्त राहत दी है. जिस तरह बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष महबूब अली स्वयं सुरक्षित समझी जाने वाली सिमरी बख्तियारपुर सीट से हार गए, वह भी समाजवादी पार्टी को मुसलिम मतों के अपने पक्ष में बने रहने की आश्वस्ति दे रहा है. इससे सपा को अब फिर से यह लगने लगा है कि उत्तर प्रदेश में वही सत्ता की प्रमुख दावेदार है. समाजवादी पार्टी के एक पुराने नेता यह स्वीकार करते हैं कि पार्टी के अंदर अमर सिंह के दिनों की संस्कृति अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है. वे जिस तरह मुलायम सिंह से अपनी हर बात मनवा लेते थे उसका खामियाजा अब तक सभी को भुगतना पड़ रहा है. लेकिन अब अच्छे दिन वापस हो रहे हैं और सबसे अच्छी बात यह है कि अब मुलायम फिर से खुद सारे निर्णय करने लगे हैं.इस बदलाव की एक झलक पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव के उस पत्र से भी मिलती है जो उन्होंने 30 अक्टूबर को प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव को लिखा है. इस पत्र में कहा गया है कि पार्टी के किसी भी नेता को अगर कोई होर्डिंग लगानी है तो केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष का ही चित्र उस पर होना चाहिए. मुलायम की सरकार के दिनों में हर चौराहे पर मुलायम की तस्वीरों के साथ छुटभय्ये नेताओं की तस्वीरें लगे होर्डिंग दिखाई देते थे और नेता जी के साथ अपनी इस 'निकटताÓ का फायदा उठाने में ये नेता कोई कसर नहीं छोड़ते थे. ऐसे लोगों के कारण पार्टी को तब बहुत बदनामी मिली थी. अब मुलायम ने इसे एकदम बंद करने को कहा है. मतलब साफ है कि वे पार्टी को अब फिर से कड़े अनुशासन में रखना चाहते हैं. समाजवादी पार्टी के लिए हौसला बढ़ाने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि मुलायम सिंह यादव अब फिर से सक्रिय प्रतीत होने लगे हैं.
हालांकि मुलायम पहले कई बार यह साबित कर चुके हैं कि वे एक जबर्दस्त फाइटर हैं. अगर ऐसा न होता तो वे 1989 में 'हिंदुओं का हत्याराÓ, 'राम विरोधीÓ और 'मौलाना मुलायमÓ की चिप्पियां लगने के बाद भी सत्ता में वापसी कैसे कर पाते? मगर यह भी सच है कि तब और अब की स्थितियां बिलकुल अलग हैं. बकौल आजम खान, सपा के जहाज को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों को बाहर कर मुलायम ने अपने जीवन का नया अध्याय शुरू कर दिया है. लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनाव अभी काफी दूर हैं. फिर अभी बीएसपी, कांग्रेस और बीजेपी सभी को अभी अपने-अपने तरकश से तीर निकालने हैं. मायावती के इस बार के अब तक के और मुलायम के पिछले कार्यकाल की तुलना करें तो जनआकांक्षाओं पर खरा उतरने के मामले में दोनों में 19-20 का ही फर्क है. लेकिन मायावती के पास अभी भी काफी समय बाकी है. यह मायावती के लिए लाभ की स्थिति है. जबकि मुलायम को इसी अवधि में अपने सभी पुराने पाप धोकर जनता के सामने नई उम्मीदों के साथ पेश होना होगा. और यह काम भी बहुत आसान नही है प्रो. एचके सिंह के इस विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि सफलताओं के नये अध्याय लिखना मुलायम के लिए काफी मुश्किलों का काम है. ऐसे में मुलायम के लिए अभी भी लखनऊ बहुत दूर है. उनके लिए राहत की बात यह है कि वे भी अब लखनऊ की दौड़ में शामिल हैं.
राज बब्बर
समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के बाद अमर सिंह लगातार यह कहते रहे हैं कि भले ही उन पर पार्टी में फिल्मी सितारों को लाने का आरोप लगाया जाता रहा हो लेकिन इसकी शुरुआत खुद मुलायम सिंह ने 1994 में राज बब्बर को पार्टी में लाकर की थी. अमर सिंह की यह बात तथ्य के रूप में भले ही सही हो लेकिन इसके संदर्भ बिलकुल ढीले हैं. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व छात्र राज बब्बर का एक लंबा फिल्मी करियर रहा है, लेकिन इससे यह बात कहीं से नहीं भुलाई जा सकती कि राज बब्बर अगर आज भारतीय राजनीति में टिके हैं तो सिर्फ अपने राजनीतिक दम-खम की बदौलत, न कि अपने सिनेमाई ग्लैमर की वजह से. वे अपने कॉलेज के दिनों से ही समाजवाद और लोहिया में आस्था रखने वाले छात्र नेता के रूप में पहचाने जाते थे और अस्सी के दशक के अंत में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के समर्थन में जबर्दस्त सभाएं की और संघर्ष किया. सिनेमा से इतर उनकी राजनीतिक पहचान इसी दौर में बन चुकी थी. नब्बे के दशक की शुरुआत होते-होते राज बब्बर वीपी सिंह से दूर होकर समाजवादी पार्टी में आ गए और 1994 में पहली बार राज्यसभा से सांसद बने. यह राज बब्बर पर मुलायम सिंह का भरोसा ही था कि उन्होंने राज बब्बर को 1996 में लखनऊ से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ लोकसभा चुनावों में उतारा. राज बब्बर लखनऊ से तो हार गए लेकिन अगले दोनों लोक सभा चुनावों में उन्होंने अपने शहर आगरा की सीट समाजवादी पार्टी को दिला दी. इसी दौरान पार्टी में अमर सिंह का दबदबा लगातार बढ़ रहा था और बब्बर पार्टी में असहज हो रहे थे. अंतत: वे ऐसे पहले व्यक्ति बने जिन्होंने अमर सिंह के खिलाफ मोर्चा लेने की हिम्मत दिखाई. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अमर सिंह के लिए दलाल जैसे शब्दों का प्रयोग किया. इसके बाद तो पार्टी में एक ही रह सकता था. हुआ वही. अमर रहे और राज बब्बर गए. सपा से बाहर जाने के बाद राज बब्बर लगातार पार्टी के लिए मुश्किलें ही पैदा करते रहे. पहले 2007 के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले उन्होंने किसानों के मुद्दे पर दादरी परियोजना के विरोध में एक बार फिर वीपी सिंह के साथ मिलकर जन मोर्चा के तले एक जबर्दस्त आंदोलन छेड़ा. दादरी प्रोजेक्ट मुलायम सिंह के तत्कालीन दोस्त अनिल अंबानी का था. राज बब्बर के आंदोलन से मुलायम सिंह के खिलाफ जो माहौल बना उसने बसपा को बहुत फायदा पहुंचाया. इन चुनावों में जन मोर्चा खुद तो कोई सीट नहीं जीत पाया लेकिन उसने कम से कम 50 सीटों पर सपा को नुकसान पहुंचाया. लेकिन बब्बर सपा के लिए इससे बड़ी मुसीबत 2009 के फिरोजाबाद लोकसभा उपचुनाव में साबित हुए. मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव के छोडऩे से खाली हुई इस सीट पर कांग्रेस की तरफ से लड़ते हुए उन्होंने मुलायम सिंह की बहू डिंपल यादव को हराकर अपनी राजनीतिक हैसियत सिद्ध कर दी. इस हार को डिंपल की नहीं बल्कि मुलायम सिंह और सपा की हार के रूप में देखा गया क्योंकि फिरोजबाद सीट पर यादव, लोध और मुसलमान वोट बड़ी संख्या में हैं जिसे सपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता था. राज बब्बर के दिए इस घाव को सपा शायद ही कभी भुला पाए.
बेनी प्रसाद वर्मा
तकरीबन दो दशक तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे और पांच बार लोकसभा के लिए चुने गए बेनी प्रसाद वर्मा जब तक समाजवादी पार्टी में थे, उनकी गिनती प्रदेश के सबसे कद्दावर नेताओं में होती थी. राज्य और केंद्र दोनों की सरकारों में वे काबीना मंत्री बन चुके थे. जातियों में उलझी उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी दूसरी पार्टी के पास कुर्मी लीडर के तौर पर वर्मा की काट नहीं थी. बाराबंकी से लेकर बहराइच और लखीमपुर तक के कुर्मी वोटों पर उनकी मजबूत पकड़ थी. मुलायम सिंह यादव और बेनी प्रसाद वर्मा की दोस्ती पुरानी थी लेकिन इतनी गहरी दोस्ती होने के बाद भी बेनी वर्मा के साथ वही हुआ जो सपा के दूसरे वरिष्ठ नेताओं के साथ हुआ. जैसे-जैसे पार्टी में अमर सिंह का कद बढ़ा, बेनी उपेक्षितों की कतार में चले गए. मुलायम सिंह के साथ उनकी निर्णायक लड़ाई 2007 विधानसभा चुनावों के ठीक पहले शुरू हुई. इन चुनावों में समाजवादी पार्टी ने बहराइच सीट से वकार अहमद शाह को टिकट दिया जो सपा की सरकार में श्रम मंत्री रह चुके थे. बेनी ने शाह को टिकट दिए जाने का खुला विरोध किया. क्योंकि बेनी के मुताबिक शाह उनके एक कट्टर समर्थक राम भूलन वर्मा की हत्या में शामिल थे. बेनी इससे पहले भी इसी मुद्दे को लेकर वकार अहमद शाह को मंत्रिमंडल से हटाए जाने की मांग कर चुके थे. लेकिन जब समाजवादी पार्टी ने ऐसा नहीं किया तब बेनी बाबू ने इसे कुर्मी स्वाभिमान का मुद्दा बनाते हुए पार्टी छोड़ दी और समाजवादी क्रांति दल के नाम से एक नई पार्टी बना ली. उनके बेटे राकेश वर्मा, जो सपा की सरकार में जेल मंत्री थे, ने भी समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दे दिया और अपने पिता जी की पार्टी से उन्हीं की कर्मभूमि मसौली सीट से चुनाव मैदान में उतरे. इससे बेनी बाबू को कोई फायदा तो नहीं हुआ (चुनाव में समाजवादी क्रांति दल को एक सीट भी नहीं मिली), लेकिन उन्होंने सपा को खासा नुकसान पंहुचाया. बेनी बाबू की वजह से ही बाराबंकी सीट पर लंबे समय बाद कांग्रेस का कब्जा हुआ और पीएल पुनिया जीते. हालांकि इन दिनों बेनी वर्मा का भविष्य कांग्रेस में भी उज्जवल नजर नहीं आ रहा है और सूत्रों की मानें तो बेनी प्रसाद भी आजम खान की तरह सपा में वापस आ सकते हैं.
आजम खान
हालांकि आजम खान की सपा में वापसी तय हो चुकी है लेकिन फिर भी यहां उनका जिक्र जरूरी है. पिछले कुछ समय में पार्टी को आजम खान से भी महरूमी का सामना करना पड़ा है और इससे उसे बड़ी मुश्किल भी हुई है. आजम खान की सपा से विदाई का मुख्य कारण अमर सिंह और उनकी ही वजह से कल्याण सिंह रहे. अमर सिंह के मोह की वजह से समाजवादी पार्टी ने अपने जिन नेताओं को खोया उनमें आजम सबसे अहम थे. इसीलिए शायद हाल में आजम की पार्टी में वापसी से पहले मुलायम सिंह ने कहा कि अगर आजम चाहेंगे तो विरोधी दल के नेता का पद उन्हें दिया जाएगा.
अमर सिंह ने अपने मैनेजमेंट और सितारा संस्कृति से समाजवादी पार्टी में जो जगह और दबदबा कायम किया था उससे पुराने समाजवादी नेता एकदम उपेक्षित हो गए थे. आजम भी इन्हीं में थे. अमर सिंह और आजम के बीच की खाई उस वक्त जग जाहिर हो गयी जब आजम के न चाहते हुए भी सपा ने जया प्रदा को रामपुर से लोकसभा का उम्मीदवार घोषित कर दिया. रामपुर सदर से 7 बार के विधायक आजम का कहना था कि जया प्रदा को रामपुर से कोई सरोकार नहीं है ऐसे में उन्हें टिकट क्यों दिया गया. लेकिन अमर सिंह के दबदबे के आगे उनकी नहीं सुनी गयी. जया चुनाव लड़ी और जीत भी गईं. आजम खान की दूसरी नाराजगी मुलायम सिंह के कल्याण सिंह से हाथ मिलाने को लेकर भी थी. इन्हीं दोनों मुद्दों पर नाराज आजम खान को अंतत: पार्टी से बाहर जाना पड़ा. लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सपा को आजम खान की अहमियत का एहसास हो गया. अमर सिंह के सपा से जाते ही इस बात की अटकलें तेज हो गईं कि आजम की सपा में वापसी हो सकती है. लेकिन आजम खान बराबर यह कहते रहे कि पहले मुलायम कल्याण सिंह से हाथ मिलाने के लिए सार्वजनिक तौर पर मुसलमानों से माफी मांगें तभी वापसी पर कोई विचार किया जा सकता है. चूंकि सपा को आजम खान की अहमियत समझ में आ चुकी थी, इसलिए मुलायम ने खुद मुसलमानों से माफी भी मांग ली. इसके बाद उनका निष्कासन भी वापस ले लिया गया.
अमर सिंह
जिन हालात में अमर सिंह को पार्टी से निकाला गया, ऐसा लगा जैसे वे खुद यही चाहते हों क्योंकि राम गोपाल यादव से उनके शुरुआती विवाद के बाद ही सपा की तरफ से इसे सुलझा लेने का बयान आया लेकिन अमर सिंह की जुबान नहीं रुकी. अमर सिंह गए तो उनके साथ सपा का फिल्मी सितारों वाला ग्लैमर भी चला गया. जया प्रदा को निकाल दिया गया. मनोज तिवारी और संजय दत्त ने खुद ही इस्तीफ़ा दे दिया. जया बच्चन जब सपा में ही बनी रहीं तो अमर सिंह के साथ बच्चन परिवार के रिश्ते भी खट्टे हो गए. समाजवादी पार्टी ने उनके जाते ही उनकी जगह एक और क्षत्रिय नेता मोहन सिंह को महासचिव और प्रवक्ता बनाकर सामने ले आए. मोहन सिंह पुराने समाजवादी हैं. उन्होंने आपातकाल में 20 महीने जेल में भी गुजारे थे, लेकिन इतना सब होने के बाद भी वे सपा में अमर सिंह के चलते हाशिए पर चले गए थे
1995 में पार्टी में आने वाले अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी को एकदम बदल दिया. उन्होंने देश के सबसे चमकदार फिल्मी सितारों और उद्योगपतियों को समाजवादी पार्टी की चौखट पर ला दिया. वे शाहरुख़ खान से अपनी तकरार और कुछ फिल्मी अभिनेत्रियों से अपनी बातचीत को लेकर भी चर्चा में रहे. न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के कांग्रेस को समर्थन देने के पीछे अमर सिंह का ही दिमाग था. कल्याण सिंह को सपा में लाने की जमीन भी इन्होंने ही तैयार की थी. पार्टी से निकाले जाने के बाद अमर सिंह लोक मंच बनाकर हर मंच से चिल्लाते रहे है कि मुलायम धोखेबाज हैं और अगर उनमें हिम्मत है तो किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाएं.
जनेश्वर मिश्र एवं अन्य
इस साल की शुरुआत में समाजवादी पार्टी को अपने एक और वरिष्ठ नेता जनेश्वर मिश्र को भी खोना पड़ा. हालांकि इसकी वजह सियासी न होकर कुदरती थी. 22 जनवरी को लंबे समय से बीमार चल रहे जनेश्वर मिश्र ने इलाहाबाद के एक अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली. जनेश्वर मिश्र पुराने समाजवादी नेता थे. उन्हें लोहिया के उत्तराधिकारी के तौर पर भी देखा जाता था इसीलिए उनका लोकप्रिय नाम छोटे लोहिया भी था. धुरंधर समाजवादी नेता राज नारायण से उनके करीबी संबंध थे और राज नारायण के निधन के बाद वे समाजवादियों के बीच सबसे सम्मानित नेता की हैसियत रखते थे. चार बार लोकसभा और तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे जनेश्वर मिश्र की राजनीतिक सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गंभीर रूप से बीमार होने के बाद भी उन्होंने अपनी मृत्यु से मात्र तीन दिन पहले 19 जनवरी को सपा के महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रदेश व्यापी जनांदोलन का इलाहाबाद में नेतृत्व किया था. अमर सिंह की विकसित की गयी सितारा संस्कृति के दौर में समाजवादी पार्टी के अंदर समाजवाद की जो थोड़ी-बहुत महक बाकी रह गई थी उसका केंद्र जनेश्वर मिश्र ही थे. अगर उनकी जगह कोई और होता तो शायद वह भी अमर सिंह की भेंट चढ़ गया होता लेकिन यह जनेश्वर मिश्र का अपना कद और मुलायम सिंह से उनकी नजदीकी ही थी कि सपा में अंत तक उनकी हैसियत पर कोई असर नहीं पड़ा.
इसके अलावा पिछले कुछ समय में समाजवादी पार्टी से आजम खान के अलावा जो मुसलमान नेता बाहर गए उनमें सलीम शेरवानी, शफीकुर्रहमान बर्क और शाहिद सिद्दीकी भी शामिल हैं. भले ही ये नेता पार्टी छोडऩे के लिए कोई वजह बताएं लेकिन इसके लिए उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं ही ज्यादा जिम्मेदार रहीं.

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

अपराध की भेंट चढ़ता देश का बचपन

नेशनल क्राइम रिकॉड्‌र्स ब्यूरो के नवीनतम आंकड़े देश के भविष्य की ख़ौ़फनाक तस्वीर पेश करते हैं. उनके मुताबिक़ पूरे देश में अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि बाल अपराधों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है. पिछले दस वर्षों यानी 1998-2008 के बीच बच्चों द्वारा किए गए अपराधों में ढाई गुना इज़ा़फा हुआ है और कुल अपराधों की तुलना में बाल अपराधों का अनुपात भी दोगुने से ज़्यादा हो चुका है. ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, साल 1998 में बाल अपराधों की कुल संख्या 9352 थी, जो 2008 में बढ़कर 24,535 हो गई. देश भर में दर्ज किए गए कुल आपराधिक मामलों के प्रतिशत के लिहाज़ से देखें तो 1998 में बाल अपराधों का प्रतिशत केवल 0.5 था, जो 2008 में 1.2 प्रतिशत के आंकड़े को छू चुका है. यदि लगातार दो वर्षों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2007 में बच्चों द्वारा किए गए कुल अपराधों की संख्या 22,865 थी, जो 2008 में बढ़कर 24,535 हो गई. यानी एक साल के अंदर बाल अपराधों की संख्या में तक़रीबन 7.3 प्रतिशत की वृद्धि हो गई. इससे पहले वर्ष 2007 में 2006 के मुक़ाबले बाल अपराधों की संख्या में 8.4 प्रतिशत का इज़ा़फा दर्ज किया गया था. ये तो केवल वे आंकड़े हैं, जो पुलिस थानों में दर्ज किए गए हैं. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि अपराध के लगभग आधे मामले पुलिस के पास नहीं पहुंच पाते या पहुंचते भी हैं तो उन्हें दर्ज नहीं किया जाता. इस तथ्य को ध्यान में रखकर यदि इन आंकड़ों पर ग़ौर करें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि देश का बचपन लगातार अपराध की आगोश में समाता जा रहा है.


चिंता की बात केवल ये आंकड़े ही नहीं हैं. लखनऊ जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के मुताबिक़, बच्चों द्वारा अंजाम दिए जा रहे अपराधों में सेक्स संबंधी अपराधों की संख्या में सबसे तेजी से वृद्धि हो रही है. कुछ साल पहले तक अधिकांश बाल अपराध चोरी, लूटपाट, छीनाझपटी आदि की श्रेणी में आते थे और वे आम तौर पर भूख एवं ग़रीबी के शिकार कम आय वर्ग वाले परिवारों के बच्चों द्वारा अंजाम दिए जाते थे, लेकिन पिछले तीन सालों के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक़, बच्चे बड़ी संख्या में बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों की ओर मुड़ रहे हैं और इन अपराधों को अंजाम देने वाले अधिकतर बच्चे समाज के उस वर्ग से संबंधित हैं, जिन्हें समृद्ध कहा जाता है. लखनऊ जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास वर्ष 2009 में बाल अपराध के 346 मामले आए, जिनमें अकेले बलात्कार के 35 मामले थे, जबकि हत्या के 20. वर्ष 2010 में अब तक दर्ज कुल 140 आपराधिक मामलों में 36 मामले बलात्कार और हत्या के हैं.

बच्चे ही किसी राष्ट्र का भविष्य होते हैं और आने वाले समय में देश की बागडोर उनके ही हाथों में होती है, लेकिन बाल अपराध के उक्त आंकड़े भारत की नई पीढ़ी में बढ़ती निराशा और हिंसक प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं. आख़िर इसकी वजह क्या है? इसका कारण है सामाजिक नैतिकता का अवमूल्यन, परिवार नामक संस्था का कमज़ोर पड़ना, बढ़ती व्यवसायिकता और कमज़ोर क़ानून. एक ओर जहां हमारा देश सामाजिक विकास के मानकों पर लगातार आगे बढ़ रहा है, वहीं समाज की नैतिकता के स्तर में लगातार हृास हो रहा है. अब संबंध मायने नहीं रखते, रिश्तों की डोर कमज़ोर पड़ती जा रही है. संयुक्त परिवार की परंपरा अब इतिहास की चीज बनती जा रही है. हम दो-हमारे दो के इस दौर में माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए समय नहीं होता, उनका सारा ध्यान ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाने में लगा रहता है. पैसे की इस धमाचौकड़ी के चलते उपजा अकेलापन बच्चों को निराशा की ओर ले जाता है. हालांकि समय की इस कमी की भरपाई के लिए माता-पिता बच्चों की हर छोटी-बड़ी इच्छा पूरी करने की कोशिश करते हैं, लेकिन बचपन का अबोध मन अक्सर अपने रास्ते से भटक जाता है. सही-ग़लत के ज्ञान के अभाव में बच्चे ऐसे रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं, जो उन्हें अपराध की दुनिया में ले जाता है.

बाल अपराधों की बढ़ती संख्या के लिए मीडिया की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता. फिल्में हों या टेलीविजन चैनल, इनमें हिंसा और अपराध के दृश्यों की भरमार होती है. यहां तक कि अख़बारों में भी अपराध की ख़बरों को ही ज़्यादा जगह मिलती है. कई बार अपराधियों को नायक के रूप में महिमामंडित भी किया जाता है. बच्चे इससे प्रभावित होकर उनकी नकल करने की कोशिश करते हैं और अपराधी बनकर रह जाते हैं. बाल अपराध और अपराधियों से निपटने के लिए देश में ज्युवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2000 बनाया गया है, लेकिन इसके प्रावधानों का सही तरीक़े से पालन नहीं किया जाता. इस क़ानून के मुताबिक़, हर पुलिस स्टेशन में बाल अपराध शाखा का होना अनिवार्य है, जिसमें बाल अपराध से निबटने और उसे रोकने में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारियों को नियुक्त किया जाता है, लेकिन ऐसा हक़ीक़त में नहीं होता. अधिकांश पुलिस स्टेशनों में बाल अपराध शाखा होती ही नहीं है और होती भी है तो उसमें नियुक्त अधिकारी दूसरे कामों की अधिकता के चलते अपनी प्राथमिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर पाते. बाल अपराधियों को बाल सुधार गृहों में रखा जाता है, लेकिन इन सुधार गृहों की हालत ऐसी होती है कि अच्छे बच्चे भी यहां आकर अपराधी बन जाते हैं. एक-एक कमरे में 25-30 बच्चों को रहने के लिए मजबूर किया जाता है. बच्चों के सुधार के लिए जो कार्यक्रम हैं, वे मौजूदा दौर के अनुकूल नहीं हैं. कंप्यूटर क्रांति के इस जमाने में उन्हें बढ़ईगिरी और हथकरघा जैसे कामों का प्रशिक्षण दिया जाता है. एक सच्चाई यह भी है कि जो बच्चे एक बार बाल सुधार गृह में आ जाते हैं, वे हमेशा के लिए अपराधी बनकर रह जाते हैं, हमारा समाज उन्हें उसी रूप में स्वीकार करता है.

बाल अपराधों की बढ़ती संख्या भविष्य के लिए ख़तरे का संकेत है. बच्चे भविष्य की धरोहर हैं, लेकिन सामाजिक कमज़ोरियों और सरकार के ढुलमुल रवैये के चलते हमारी यह धरोहर लगातार पतन के रास्ते पर आगे बढ़ रही है. बाल अपराधों की बढ़ती संख्या हमारे समाज के माथे पर एक ऐसा कलंक है, जिससे तत्काल निजात पाने की ज़रूरत है. इसके लिए आवश्यक है कि ज्युवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2000 में सुधार किए जाएं और इसके प्रावधानों के पूरी तरह पालन की व्यवस्था की जाए. सामाजिक स्तर पर भी इसके लिए अलग से क़दम उठाने की दरकार है. इसके साथ-साथ मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास दिलाने की ज़रूरत है, अन्यथा हमारे देश का भविष्य इसी तरह अपराध की भेंट चढ़ता रहेगा.

बाल अपराध के आंकड़े (1998-2008)
वर्ष बाल अपराधों कुल अपराध कुल अपराध में बाल अपराध दर

की संख्या बाल अपराधों (प्रतिशत में)

का प्रतिशत

1998 9352 1778815 0.5 1.0

1999 8888 1764629 0.5 0.9

2000 9267 1771084 0.5 0.9

2001 16509 1769308 0.9 1.6

2002 18560 1780330 1.0 1.8

2003 17819 1716120 1.0 1.7

2004 19229 1832015 1.0 1.8

2005 18939 1822602 1.0 1.7

2006 21088 1878293 1.1 1.9

2007 22865 1989673 1.1 2.0

2008 24535 2093379 1.2 2.1

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की शिकायतें गंभीर मसला है। क्योंकि देश की जनता को विधायिका और कार्यपालिका से कहीं ज्यादा न्यायपालिका पर विश्वास है। आज यह विश्वास कुछ जजों के कारनामों के कारण छिन्न-भिन्न होता दिख रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं होने के लिए सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और इस दिशा में सरकार व न्यायपालिका को मिलकर कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए। भ्रष्टाचार के अलावा आज इस बात पर भी विचार किए जाने की जरूरत है कि अदालतों में मुकदमों के सुनवाई की समयसीमा निश्चित हो, ताकि त्वरित फैसले आ सकें और न्याय की धारणा को वास्तविक रूप में परिणत किया जा सके। अब अदालतों में यह साफ तौर पर देखने को मिलता है कि वकीलों के जजों से घनिष्ठ संबंध बन रहे हैं और वह फैसलों को प्रभावित करने के लिए इन संबंधों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जो नई बात अब सामने आ रही है, वह है नाते-रिश्तेदारों का उन अदालतों में वकालत करना, जहां ये जज नियुक्त हैं। यह वाकई काफी हैरान करने वाली बात है कि अभी तक इन सब पर किसी का भी ध्यान क्यों नहीं गया था। क्या सुप्रीम कोर्ट इस बारे में अदालतों में नियुक्त जजों से हलफनामा नहीं मांग सकता कि जहां वह कार्यरत हैं, वहां उनके कोई नातेदार-रिश्तेदार वकालत नहीं कर रहे हैं। यदि ऐसा कोई नियम बनाया जाए तो संभवत: इस तरह की प्रवृत्ति अपने आप ही रोकी जा सकती है। न्यायिक आयोग की उस रिपोर्ट को तत्काल लागू किए जाने की आवश्यकता है, जिसमें न्यायिक सुधारों की दिशा में कई उपयोगी सुधारों के लिए सुझाव दिए गए हैं। सरकार को दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाते हुए यह तय करना होगा कि न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाया जाए। हमारा लोकतंत्र तभी मजबूत और सुरक्षित होगा जब कि लोगों को समय पर सही न्याय मिले। यदि लोगों को न्याय ठीक तरह से समय पर नहीं मिल पाएगा तो वह सरकार पर भी अपना विश्वास खो देंगे। अदालतों में लाखों की संख्या में मामले पेंडिंग पड़े हैं और ऐसे लाखों मामले हैं जो वर्षो से अदालतों में चल रहे हैं। एक पीढ़ी के झगड़े का फैसला कई-कई पीढि़यां गुजर जाने के बाद भी अदालतों में बने रहना किस बात का संकेत है? भले ही सरकार त्वरित न्याय के लिए फैमिली कोर्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट, इवनिंग कोर्ट जैसी संकल्पनाओं पर अमल कर रही है और न्यायपालिका की आधारभूत संरचनाओं की कमी को दूर करने के लिए अधिक पैसा दे रही है, लेकिन सवाल जब नैतिकता और नियत का हो तो यह सब कुछ बेकार हो जाता है। आज स्मार्ट न्याय और फेयर न्याय की जरूरत है, जिसके लिए जजों का व्यक्तिगत कमिटमेंट जरूरी है। इसके लिए ऐसे कानून और प्रावधान बनाए जाने चाहिए ताकि जजों को निष्पक्षता से काम करने में किसी तरह की परेशानी न हो। यदि कोर्ट में रिश्तेदार वकील होंगे तो उन पर दबाव पड़ना स्वाभाविक है और ऐसे में कुछ गलत फैसले भी हो सकते हैं।
न्यायिक व्यवस्था में गुजिश्ता कुछ बरसों से बढ़ता भ्रष्टाचार हमारी चिंताओं का सबब है। अभी तलक बेदाग मानी जाती रही न्यायपालिका पर भी अब भ्रष्टाचार के इल्जाम लगने लगे हैं। गोया कि भ्रष्टाचार ने न्याय के मंदिर को भी आहिस्ता-आहिस्ता प्रदूषित करना शुरू कर दिया है। कानून का राज कायम करने के लिए न्यायिक शुचिता एक बुनियादी जरूरत है। न्यायपालिका में यदि शुचिता नहीं होगी तो जाहिर है, उसका असर इंसाफ पर भी पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अभी हाल ही में एक मामले की सुनवाई करते हुए जिस तरह से इलाहाबाद के कुछ न्यायाधीशों की ईमानदारी पर सवाल उठाए हैं, उसने हमारी न्याय व्यवस्था को कठघरे में ला खड़ा किया है। न्यायिक क्षेत्र में घर करते जा रहे भ्रष्टाचार पर तल्ख टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक मिसाल के मार्फत अपनी बात कही, शेक्सपियर ने अपने मशहूर नाटक हेमलेट में कहा था कि डेनमार्क राज्य में कुछ गड़बड़ है, ठीक उसी तर्ज पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में भी कहा जा सकता है कि वहां भी कुछ न कुछ गड़बड़ है, जिसे फौरन दुरुस्त किया जाना चाहिए। न्यायाधीश मार्कडेय काटजू और न्यायाधीश ज्ञानसुधा मिश्रा की दो सदस्यीय पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा कि वे इसे ठीक करने के लिए कठोर कार्रवाई करें। सुाप्रीम कोर्ट ने यह तल्ख टिप्पणी हाईकोर्ट के कुछ न्यायाधीशों के अंकल जज सिंड्रोम से ग्रस्त होने का इशारा करते हुए की। उच्चतम न्यायालय ने अपनी यह नाराजगी इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ के उस आदेश को निरस्त करते हुए दी, जिसमें उसने अपने क्षेत्राधिकार में न होते हुए भी एक सर्कस मालिक के हक में फैसला सुना दिया, जबकि वह मामला लखनऊ खंडपीठ के अंतर्गत आता था। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ मिल रही शिकायतों पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह के आदेशों से तो न्यायपालिका पर से आम आदमी का यकीन ही उठ जाएगा। गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में सुप्रीम कोर्ट के पास लगातार कई दिनों से गंभीर शिकायतें आ रहीं थीं, जिसमें सबसे चौंकाने वाली शिकायत यह थी कि कुछ न्यायाधीशों के सगे-संबंधी उसी अदालत में वकालत कर रहे हैं और देखते-देखते वकालत शुरू करने के कुछ ही अरसे में लखपति-करोड़पति हो गए। जाहिर है, इलाहाबाद हाईकोर्ट पर लगा यह गंभीर इल्जाम यों ही हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। यदि न्यायिक तंत्र ही भ्रष्ट हो जाएगा तो आम आदमी इंसाफ के लिए अपनी फरियाद कहां लेकर जाएगा। यह बात सच है कि न्यायाधीशों के सगे संबंधियों को भी अपना व्यवसाय खुद चुनने का अधिकार है, लेकिन इससे उन्हें अपने संबंधों का बेजा फायदा उठाने का हक नहीं मिल जाता। न्यायाधीशों के लिए उच्चतम न्यायालय ने जो आचार संहिता तय की है, उसमें यह बात साफ तौर पर लिखी है कि न्यायाधीशों को न्याय की निष्पक्षता की खातिर वकीलों से नजदीकी ताल्लुकात बनाने से बचना चाहिए। यही नहीं, आचार संहिता इस बात की भी इजाजत नहीं देती कि किसी न्यायाधीश के सगे संबंधी वहीं वकालत करें। विधि आयोग की 230वीं रिपोर्ट कहती है कि जो न्यायाधीश अपने सगे-संबंधियों का पक्ष लेते हुए दिखाई दें या उन पर इस बात का जरा-सा भी शक हो तो उनका तुरंत दूसरे राज्य में तबादला कर दिया जाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह सब तमाम गड़बडि़यां होती रहीं और उन पर कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया। जिसका नतीजा यह निकला कि वहां बड़े पैमाने पर इंसाफ प्रभावित होने लगा। सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधों का गलत इस्तेमाल कर रहे न्यायाधीशों के खिलाफ तबादले जैसी ठोस कार्रवाई करने की यदि सिफारिश की है तो यह सही भी है। इस प्रवृत्ति ने ईमानदारवादियों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता दोनों को ही बहुत नुकसान पहुंचाया है। फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह मामला कोई अकेला अपवाद नहीं है, मुल्क की कई अदालतें इस वक्त अंकल जज सिंड्रोम से ग्रसित हैं। अदालतों में न्यायाधीशों के सगे संबंधियों के बड़ी तादाद में वकालत करने की ऐसी ही एक शिकायत ग्वालियर हाईकोर्ट की थी। वहां भी ग्वालियर खंडपीठ के अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी यह शिकायत दर्ज की थी कि कुछ न्यायाधीशों के परिवार के लोग और रिश्तेदार वहां वकालत कर रहे हैं। हालांकि न्यायपालिका और न्याय प्रक्ति्रया से जुड़े लोगों ने इस समस्या के निदान के लिए अपनी और से काफी पहल की, लेकिन फिर भी इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। हालत यह है कि हमारे यहां न्यायिक सुधार कई सालों से लंबित हैं, लेकिन फिर भी सरकार ने इस पर कोई कारगर कदम नहीं उठाया है। सच बात तो यह है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति, उनकी पदास्थापना और जवाबदेही को कारगर आचार संहिता के जरिये ही तय किया जा सकता है। न्यायाधीशों की नियुक्ति और आचरण से जुड़े मसलों पर आज प्रभावी और तर्कसंगत ढंग से विचार करने की बेहद जरूरत है, क्योंकि किसी भी तंत्र में प्रभावी जवाबदेह प्रणाली के अभाव में उसके अंदर गड़बडि़यां पैदा होना शुरू हो जाती हैं। न्यायपालिका का भ्रष्टाचार हमारे लिए इसलिए भी चिंता का सबब है कि न्यायाधीशों की सेवाशर्ते कुछ इस तरह से बनाई गई हैं कि उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई करना बेहद मुश्किल भरा काम होता है। मसलन, भ्रष्टाचार के इल्जाम में न्यायाधीश सोमित्र सेन के खिलाफ बीते 4 साल से कार्रवाई चल रही है, मगर फिर भी उन्हें अभी तलक नहीं हटाया जा सका है। दरअसल, न्यायाधीशों को हटाने की मौजूदा संवैधानिक प्रणाली इतनी बोझिल और जटिल है कि इसमें लंबा समय लग जाता है। हमारे संविधान में यह व्यवस्था है कि संसद की मंजूरी से ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को हटाया जा सकता है। असल में न्यायाधीशों को मजबूत सुरक्षा कवच और विस्तृत अधिकार इसलिए प्रदान किए गए कि वे अपना काम निष्पक्ष और बिना किसी डर के कर सकें, लेकिन उन्होंने न्यायिक जबावदेही से ही अपना मुंह मोड़ लिया। जिसका नतीजा यह निकला कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार का घुन लगता चला गया। न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और गरिमा बची रहे, इसके लिए अब इसमें और सुधार की आवश्यकता है। सर्वोच्च अदालत के कथन के बाद तो, इन सुधारों की जरूरत और भी ज्यादा महसूस की जाने लगी है। सरकार को एक न्यायिक आयोग की कायमगी में अब बिल्कुल भी देर नहीं करनी चाहिए, जो न सिर्फ न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बिना प्रभावित किए उस पर लगे इल्जामों का फौरन संज्ञान ले, बल्कि एक तय समय सीमा में कार्रवाई की सिफारिश भी करे। उम्मीद है, सरकार इस दिशा में जल्द ही कोई प्रभावी कदम उठाएगी।

जहां फरिश्ते भी पांव रखने से डरते हैं

जिस प्रशासनिक भ्रष्टाचार व लाल फीताशाही को ठीक करने का नीतीश सरकार ने बीड़ा उठाया है, उस राह गुजरने से कभी फरिश्ते भी घबराते थे। किस तरह घबराते थे, उसके कुछ नमूने यहां पेश हैं।

एक बार एक अत्यंत ईमानदार व कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारी को बिहार सरकार का कार्मिक सचिव बना दिया गया था। जब उन्होंने कड़ाई शुरू की तो एक बड़ा बाबू ने अभियान चलवा कर उन्हें वहां से हटवा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यानी सचिव हारा, क्लर्क जीता। दरोगा जीता, डीजीपी हारा, इसके भी कई उदाहरण सामने आये।

उस बड़ा बाबू के बारे में यह कहा जाता था कि किसी डिप्टी कलक्टर से भी सिर्फ बात कर लेने के लिए वह अपना सिर तभी उठाता था जब उसके टेबुल और चश्मे के बीच में लंबा करके सौ रुपये का एक नोट धीरे से बढ़ा दिया जाता था। नोट के दर्शन होते ही वह अपना सिर ऊपर उठा कर पोस्टिंग की प्रतीक्षा में सचिवालय की दौर लगा रहे अफसर की ओर देखता था। बाकी काम के लिए फीस अलग से।

सत्तर के दशक में आबकारी विभाग का एक निरीक्षक एक आबकारी कमिश्नर को हटवा सकता था। एक आबकारी अधीक्षक किसी आबकारी मंत्री को हटवा सकता था। तीन आबकारी अधीक्षकों का एक चर्चित सिंडिकेट तो किसी मंत्रिमंडल को भी अपदस्थ करवा सकता था।

इसके अलावा अन्य मलाईदार विभागों का भी बिहार में यही हाल था। यह सब अस्सी के दशक तक चलता रहा। बाद में तो स्थिति और भी बिगड़ी। गत पांच साल में नीतीश कुमार ने राम-राम कहते-कहते किसी तरह इसी प्रशासनिक तंत्र से काम निकाला। ऐसा नहीं कि पूरे प्रशासन में सारे के सारे कर्मचारी व अफसर गड़बड़ ही हैं। पर उपर से नीचे तक घूसखोरों की संख्या इतनी अधिक जरूर है कि स्थिति कंट्रोल से बाहर हो रही है। ऐसा कोई सरकारी दफ्तर जल्दी खोज लेना बड़ा कठिन काम है जहां रिश्वत के बिना कोई काम हो जाता हो। इस स्थिति से रोज ब रोज पीड़ित हो रही जनता को निजात दिलाने के लिए नीतीश सरकार ने कड़े कदम उठाने का दृढ निश्चय किया है। पर यह काम कितना कठिन है, इसे समझने के लिए कुछ ईमानदार अफसरों के लिखित अनुभवों को एक बार फिर याद कर लेना मौजूं होगा।

राज्य सरकार में विभिन्न स्तरों पर जो भीषण भ्रष्टाचार जारी है, उसके लिए सिर्फ उपर्युक्त बड़ा बाबू जैसे लोग ही जिम्मेदार नहीं हैं। राजनीति सहित कई क्षेत्रों के लोग जिम्मेदार हैं। किसी भी कारगर व निर्णायक कार्रवाई का भारी विरोध हो सकता है। इसलिए इस काम में नीतीश सरकार को ईमानदार जनता की मदद की भारी जरूरत पड़ेगी।

क्योंकि प्रस्तावित ‘राइट टू सर्विस कानून’ बन कर लागू हो जाने से इस गरीब प्रदेश की बहुत सारी बीमारियों का इलाज हो जाने वाला है। पर इसे लागू करना कितना कठिन है, उसका अनुमान एन सी सक्सेना के एक पत्र से लग जाएगा। केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एन सी सक्सेना ने 5 फरवरी 1998 को बिहार सरकार के मुख्य सचिव बी पी वर्मा को एक नोट लिखा। सक्सेना ने यह सलाह दी कि वे इस नोट को अफसरों के बीच बंटवा सकते हैं।

सक्सेना ने अन्य बातों के अलावा बिहार की ब्यूरोक्रेसी के बारे में लिखा कि ‘अफसरों में कोई कार्य संस्कृति नहीं है। जन कल्याण की कोई चिंता नहीं है। राष्ट्र के निर्माण की कोई भावना नहीं है। राष्ट्रीय लक्ष्य और आधुनिक भारत के मूल्य की कोई धारणा मन में नहीं है। वे लोभी और धन लोलुप बन गये हैं। उनमें प्रतिबद्धता, क्षमता और ईमानदारी का नितांत अभाव हो गया है। अफसरशाही शोषकों का औजार बन चुकी है।

उन्होंने यह भी लिखा कि ‘ बिहार की स्थिति मध्य युग की याद दिला रही है- अराजक, क्रूर, दिशाहीन, गरीबों की जरूरत के प्रति निर्दयी। बिहार के बड़े अफसर और उगाही करने वाले नेताओं, इंस्पेक्टरों और बाबुओं में फर्क करना अब असंभव हो गया है। जन समस्याओं के प्रति बेदर्दी का एक उदाहरण देते हुए सक्सेना ने लिखा कि बिहार सरकार को इस साल हमने पेय जल के मद में एक पैसा नहीं दिया क्योंकि राज्य सरकार पिछले एक साल से यह तय नहीं कर सकी कि पाइप खरीदने का तरीका क्या होगा।

याद रहे कि एक तरफ सक्सेना जैसे अफसर पेय जल योजना के बारे यह बात कह रहे थे, दूसरी ओर राज्य के सत्ताधारी नेता सार्वजनिक रूप से केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर यह आरोप लगा रहे थे कि केंद्र सरकार हमारी आर्थिक मदद नहीं कर रही है।

लंबे समय से इसी गति से चल रही बिहार सरकार का मुख्य सचिव बनने के लिए पी एस अप्पू पहले तैयार नहीं हो रहे थे। सत्तर के दशक में जबर्दस्ती तत्कालीन मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने यह कह कर उन्हें मुख्य सचिव बनाया कि आपके काम में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। पर जब कर्पूरी ठाकुर अपना वायदा पूरा नहीं कर सके तो पी एस अप्पू ने पद छोड़ दिया। साथ ही अप्पू ने मुख्य सचिव के रूप में अपना कटु अनुभव बाद में इन शब्दों में लिखा, ‘वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी महत्वपूर्ण पदों को हथियाने में अपना खाली समय जाया करते हैं। अधिकतर महत्वपूर्ण पद पैरवी के मार्फत भरे जाते हैं। सामान्यतः कैबिनेट, तबादलों व पदस्थापन से जुड़े मेरे फैसलों पर विश्वास नहीं करता। यहां तक कि मुख्यमंत्री भी स्वतंत्र फैसला नहीं ले सकते। कुछ मंत्री अपनी जाति के लोगों और उसमें भी अपने खास प्रिय पात्र अफसरों को ही अपने विभाग में रखना चाहते हैं। कभी-कभी प्रतिभाशाली अधिकारी छांट दिये जाते हैं। इनकी जगह मंत्री भ्रष्ट, और निकम्मे अधिकारियों की मांग करते हैं।’

याद रहे कि यह उस समय की बात है जब कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री थे जो कहा करते थे कि हमारे मंत्रिमंडल का एक-एक सदस्य खुद को मुझसे अधिक ताकतवर समझता है। ऐसे बिगड़े बिहार प्रशासन में राइट टू सर्विस कानून बनाना और उसे लागू करना कितना मुश्किल मगर जरूरी काम है, इसका अनुमान कठिन नहीं है। ईश्वर व जनता नीतीश कुमार को शक्ति दे!

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

अंबानी ने ठगा शिव राज को

देश समेत दुनियाँ के जाने-माने उद्योगपतियों की मौजूदगी ने खजुराहो निवेशकों के सम्मेलन में मध्यप्रदेश में नई सुबह लाने का सच्चा पैगाम दे दिया। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-2 के कुल निवेश के करारनामों की तादाद 107 और रकम की मात्रा दो लाख 35 हजार 966 करोड़ रूपये हो गई। आज विविध उद्योगों के 57 करारनामों में 39 हजार 115 करोड़ रूपये, ऊर्जा के 15 करारनामों में 76 हजार 80 करोड़ रूपये, खाद्य प्रसंस्करण के सात करारनामों में 534 करोड़ रूपये, स्वास्थ्य के दो करारनामों में 400 करोड़ रूपये और नवीनीकृत ऊर्जा के चार करारनामों में एक हजार 200 करोड़ रूपये लगाए जाने की रजामंदी हो गई। सरकार और उसके कारिंदों ने इस इरादे का खुलासा भी अच्छे से कर दिया कि करारनामों की तकरीबन रोज़ाना ही मानीटरिंग की जाएगी ताकि उद्योगों की तयशुदा वक्त में स्थापना हो जाए और प्रदेश तथा यहाँ के लोगों को वास्तविकता की अनुभूति जल्द से जल्द हो जाए। लेकिन ठीक इसके उलट अनिल धीरू भाई अंबानी समूह (एडीजी) के चेयरमैन अनिल अंबानी खजुराहो निवेश सम्मेलन में शिव और उनके राज को मूर्ख बनाकर चले गए।
जिस तरह भाजपा ने कुछ साल पहले देश के आम चुनाव में शाइनिंग इंडिया व फीलगुड का फर्जी नारा देकर चुनाव हारा था उसी तर्ज पर अब प्रदेश में शाइनिंग एमपी के आकर्षक बोर्ड टांगे जा रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की प्रदेश व इन्दौर को अव्वल बनाने की नेकनीयती में तो कोई शक-शुभा नहीं है मगर मैदानी हकीकत इन तमाम दावों के ठीक उलट नजर आती है। खजुराहो समिट के बड़े भारी निवेश में सवा 2 लाख करोड़ से अधिक के 107 एमओयू यानी करार निवेशकों के साथ किए जाने के साथ मुख्यमंत्री के साथ अनिल अंबानी ने प्रदेश में 75 हजार करोड़ निवेश करने का दावा करते हुए हर घंटे ढाई करोड़ के निवेश का जो आंकड़ा परोसकर जबर्दस्त मीडिया में सुर्खियां बटोरी उसकी असली हकीकत यह है कि अनिल अंबानी ने खजुराहो में कोई नया करार किया ही नहीं, बल्कि इन्दौर में 2007 में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में जो पचास हजार करोड़ का करार किया था, उसी को बढ़ाकर 75 हजार करोड़ का कर दिया। इतना ही नहीं 25 साल तक अनिल अंबानी से प्रदेश सरकार 20 से 25 पैसे प्रति मिनट महंगी बिजली खरीदेगी जिससे अंबानी 10 से 15 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त कमाएंगे। प्रदेश शासन के वित्त विभाग ने इस लूट पर आपत्ति दर्ज कराई थी मगर पिछले दिनों कैबिनेट ने इसे मंजूरी दे दी।
बड़े लोगों के बड़े खेल... यह बात रिलायंस पर सबसे सटीक साबित होती है। प्रदेश का कोई छोटा-मोटा बिल्डर या कालोनाइजर अगर कुछ फायदा उठा लेता है तो अखबारों की सुर्खियां बन जाती हैं, लेकिन दूसरी तरफ बड़े निवेशक हजारों करोड़ रुपये का गोलमाल कर लेते हैं, लेकिन इसे शहर और प्रदेश की तरक्की से जोड़कर प्रचारित किया जाता है। अभी खजुराहो में जितने भी करार हुए, वे सब प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट यानी माइनिंग से जुड़े हुए हैं। इस पूरी समिट में सबसे बड़ी खबर अनिल अंबानी की मौजूदगी ने बनाई, जिसमें 75 हजार करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश के दावे किए गए, जिसकी असलियत यह है कि इन्दौर में 26 व 27 अक्टूबर 2007 को खजुराहो की तर्ज पर ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट आयोजित की गई थी और उसमें अनिल अंबानी ने 50 हजार करोड़ रुपये का एमओयू साइन किया था, जिसमें शासन के 3960 मेगावाट अल्ट्रा पावर प्रोजेक्ट के अलावा चितरंगी तहसील सीधी जिले के एक अन्य मेगा थर्मल पावर स्टेशन के साथ चार बड़े सीमेंट के संयंत्र लगाने, जिनकी क्षमता 5 मिलियन टन हर साल होगी, वहीं सीधी जिले में एयरपोर्ट व एयर स्ट्रीप के विकास के साथ ही भोपाल में एक तकनीकी इंस्टिट््यूशन खोला जाना था। जिसके लिए खजुराहो समिट के दो दिन पूर्व प्रदेश शासन अनिल अंबानी की संस्था को भोपाल एयरपोर्ट के पास 110 एकड़ जमीन धीरूभाई अंबानी कॉलेज के लिए आवंटित कर चुका है। वहीं समिट में 75 हजार करोड़ रुपये के जिस निवेश का दावा किया गया, उसमेंं कोई नया करार नहीं हुआ, बल्कि लगने वाले सीमेंट प्लांटों की क्षमता को दोगुना करने और आठ हजार मेगावाट के बिजली संयंत्रों के पुराने करारों की क्षमता बढ़ाकर उसे 12 हजार मेगावाट से अधिक करने का निर्णय लिया गया है। मगर प्रचारित इस तरह हुआ मानो अनिल अंबानी ने 75 हजार करोड़ रुपये का कोई नया करार सरकार से किया हो।
इस पूरे मामले की एक और बड़ी हकीकत यह है कि आने वाले 25 सालों तक प्रदेश सरकार की एमपी पावर ट्रेडिंग कंपनी जो बिजली रिलायंस से खरीदेगी, वह काफी महंगी होगी। अभी 5 अक्टूबर को शिवराज कैबिनेट ने दो कंपनियों रिलायंस पावर और एस्सार पावर से बिजली खरीदने का 25 सालों का करार किया है। अनिल अंबानी के रिलायंस पावर से पहले 2 रुपये 70 पैसे और एस्सार से 2 रुपये 95 पैसे प्रति यूनिट की दर तय की गई थी। मगर बाद में निगोसिएशन के पश्चात 2 रुपये 45 पैसे प्रति यूनिट की दर फायनल की गई। इतना ही नहीं रिलायंस ने सीधी जिले के सासन अल्ट्रा पावरमेगा प्रोजेक्ट के लिए आवंटित कोलब्लाक से अपने अन्य चितरंगी पावर प्रोजेक्ट के लिए भी कोयला प्राप्त करने की मंजूरी पहले केन्द्र शासन से और फिर राज्य से प्राप्त कर ली। इसी आधार पर प्रदेश के वित्त विभाग ने यह तर्क दिया कि चूंकि रिलायंस पावर को बाहर से कोयला नहीं खरीदना पड़ेगा और वह प्रदेश से ही कोयला लेकर बिजली बनाएगा, लिहाजा परिवहन के साथ अन्य खर्चों में कमी होगी। इसलिए जनता को दी जाने वाली बिजली की दर 20 से 25 पैसे प्रति यूनिट तक और कम होना चाहिए। यह भी उल्लेखनीय है कि मात्र 1 पैसे प्रति यूनिट की अगर कमी की जाती है तो 25 सालों में लगभग 700 करोड़ रुपये की बचत एमपी पावर ट्रेंिडंग कंपनी को होती। इस लिहाज से 20 से 25 पैसे प्रति यूनिट बिजली रिलायंस पावर और एस्सार पावर से खरीदने के निर्णय से 10 से 15 हजार करोड़ रुपये का फायदा इन निजी कंपनियों को पहुंचाया गया। वित्त विभाग ने अपनी आपत्ति में रिलायंस पावर को जमीन देने के अलावा अन्य सुविधाओं का उल्लेख करते हुए प्रति यूनिट बिजली की दरों में कमी लाने का सुझाव दिया था, लेकिन अनिल अंबानी की तगड़ी ऊपरी पकड़ के चलते वित्त विभाग की इन आपत्तियों को दरकिनार करते हुए पिछले दिनों शिवराज कैबिनेट ने 25 सालों तक बिजली खरीदी का निर्णय ले लिया। अभी मध्यप्रदेश की जनता वैसे ही महंगी बिजली से हलाकान है और आने वाले दिनों में बिजली तो भरपूर निजी संयंत्रों के कारण मिलेगी, लेकिन उसके दाम इतने अधिक होंगे कि आम आदमी को दिन में ही तारे नजर आने लगेंगे।
अभी तक रिलायंस पावर के तीन साल पूर्व किए गए प्रोजेक्ट के लिए जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी है। दरअसल शासन को रिलायंस पावर को 3879 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित कर उपलब्ध कराना है, जिसमें 1179 हेक्टेयर जमीन निजी, 445 हेक्टेयर सरकारी और 2255 हेक्टेयर जमीन वन भूमि है। लिहाजा इस अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट के बदले 10 लाख से अधिक पेड़ों को काटना भी पड़ेगा। वहीं सैकड़ों परिवारों को विस्थापित किया जाना है। हालांकि वन भूमि का मामला उच्चस्तरीय है और इसके लिए केन्द्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति भी लगेगी। उल्लेखनीय है कि अभी हजारों करोड़ रुपये के वेदांता ग्रुप को पर्यावरण विभाग ने किसी कारण अनुमति नहीं दी।

खजुराहो समिट में 75 हजार करोड़ रुपये के निवेश का दावा अनिल अंबानी द्वारा किया गया। हालांकि इस संबंध में कोई करार नहीं हुआ, क्योंकि तीन साल पहले ही इन्दौर में अनिल अंबानी खुद पचास हजार करोड़ रुपये का करार कर चुके हैं। इस 12 पेजी करार 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर किए गए है। 26 अक्टूबर 2007 को तत्कालीन वाणिज्यिक व उद्योग तथा रोजगार विभाग के प्रमुख सचिव अवनी वैश्य जो कि वर्तमान में प्रदेश शासन के मुख्य सचिव हैं, ने खुद रिलायंस पावर लिमिटेड के साथ उक्त करार किया था और अनिल अंबानी की ओर से डायरेक्टर बिजनेस डेवलपमेंट जेपी चालासानी ने इस करार पर हस्ताक्षर किए। इस करार में सीधी के सासन और चितरंगी के दोनों पावर प्लांटों के अलावा चार सीमेंट फैक्ट्रियों को खोलने, भोपाल में तकनीकी इंस्टिट््यूशन जिसकी जमीन अभी खजुराहो समिट के दो दिन पूर्व भोपाल एयरपोर्ट के पास आवंटित की गई। 26 अक्टूबर 2007 को किए गए इस इन्दौरी करार के वक्त भी खजुराहो की तरह अनिल अंबानी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के साथ मौजूद थे, जिसका उल्लेख भी उक्त करार में किया गया है।
मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार अभी तक 9 निवेश सम्मेलन आयोजित कर चुकी है। खजुराहो समिट में दो लाख 36 हजार करोड़ के 107 करार करना बताए, जिसमें इन्दौर का क्रिस्टल आईटी पार्क भी शामिल है, जिसमें साफ्टवेयर टेक्नोलाजी आफ इंडिया को दिया गया, जिसका सबसे पहले खुलासा अभी पिछले दिनों अग्रिबाण ने ही किया था। खुजराहो समिट के पूर्व जो 8 निवेश सम्मेलन हुए, उनमें कुल मिलाकर पौने पांच लाख करोड़ रुपये के एमओयू यानी करार किए गए और वास्तविक धरातल पर मात्र 58 हजार करोड़ रुपये का निवेश ही हो पाया है। यहां तक कि इन्दौरी ग्लोबल मीट में 102 करार सवा लाख करोड़ रुपए के किए गए थे और इनमें से मात्र 13 हजार करोड़ का निवेश हुआ है। चूंकि ज्यादादर एमओयू रियल स्टेट यानी होशियार जमीनी कारोबारियों ने कर लिए, जिनकी पोलपट्टïी भी उजागर की गई और ये सारे करार अंतत: कागजी ही साबित हुए। हालांकि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान लगातार प्रयासरत हैं अधिक से अधिक निवेश जुटाने में, लेकिन मैदानी हकीकत इसके विपरीत ही नजर आती है।

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

जिंदगी भर का जख्म देते रिश्ते

देश का हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश हो या फिर केरल, गोवा, उत्तर-पूर्वी सीमांत राज्य हों या अन्य राज्य अथवा देश की राजधानी दिल्ली, मासूम अबोध बच्चियों से लेकर, युवती या प्रौढ़ा कोई भी सुरक्षित नजर नहीं आ रही हैं। बलात्कार की बढ़ती वारदातों के पीछे कोई और नहीं है, बल्कि वह लोग हैं जिन्हें प्यार से अपना कहा जाता है और जो मौका मिलते ही खून के रिश्तों तक को कलंकित करने से नहीं चूकते। जब पिता बेटी से मुंह काला करने में हिचक महसूस नहीं करता तो सौतेले पिता की बात ही क्या? दामन को दागदार करने में पिता, बच्चों के प्यारे अंकल, मामाजी, ससुर, दोस्त, प्रेमी, शिक्षक और सबसे ज्यादा पड़ोसी पाए जा रहे हैं। ऐसे में बच्चियां और महिलाएं कैसे सुरक्षित रह सकती हैं? फिर जब चारदीवारी और अपने प्रियजनों के घर में ही मौजूद आपका रक्षक भक्षक बन जाए और ईंट-पत्थरों से बना घर पिंजरा, ऑफिस के सहकर्मी जिनके साथ अपना सुख-दुख बांटने की उम्मीद बांधे, से सदैव अप्रिय आचरण की आशंका रहे या उनसे हरपल सतर्क रहना पड़े तो इससे बड़ी राष्ट्रीय समस्या और चिंता क्या हो सकती है। देश में बीते सालों में हुए बलात्कारों में अधिकांश में पड़ोसी ही संलिप्त पाए गए हैं। आंकड़े गवाह हैं कि 98.28 फीसदी बलात्कार की शिकार महिलाएं आरोपियों से पूर्व परिचित थीं। इनमें अधिकांश पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार, मकान मालिक, किराएदार या शिक्षक थे, जबकि सिर्फ दस ही अजनबी थे। इनमें तीन फीसदी सहकर्मी थे।
मध्य प्रदेश में तो स्थिति और भी बदतर है। अभी हाल ही में दमोह नगर की बी.काम की एक छात्रा ने युवकों द्वारा आये दिन की जा रही छेडखानी से तंग आकर मालगाडी के सामने कूद कर जान दे दी। घटना के संबंध में मृतका के भाई पारस जैन एवं चाचा नवल चौरसिया ने बताया कि 20 वर्षीय कजली युवकों की छेडखानी से परेशान हो गई थी। इस बावत पुलिस में भी शिकायत की गई थी लेकिन पुलिस द्वारा आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने पर युवती ने ट्रेन के सामने कूद कर अपनी जान दे दी। उधर इसी जिले के तेजगढ़ थानांतर्गत ग्राम मगदूपुरा में बारहवीं की छात्रा के साथ पड़ोस के सौरभ पटेल दुराचार करने के बाद दूसरे दिन किशोरी के घर में जाकर उस पर कैरोसीन डालकर जिंदा जला दिया। गंभीर रूप से जली छात्रा ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। बताया जाता है कि घटना वाले दिन शाम पांच बजे छात्रा अपने घर के पास बाड़ी में थी। तभी पड़ोसी सौरभ पटेल वहां पहुंचा और उसने किशोरी के साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद सौरभ ने जान की धमकी देकर उससे इस बारे में किसी नहीं बताने के लिए कहा था। लेकिन पीडि़त छात्रा ने अपने परिजनों के इस बारे में बता दिया। पीडि़ता के पिता नोनेलाल ने


बताया कि उसी दिन वे बेटी के साथ तेजगढ़ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंचे। लेकिन प्रधान आरक्षक ने बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए पैसे मांगे। इस पर वे वापस आ गए। अगले दिन सुबह वे फिर से थाना जाने की तैयारी में थे। घर के अन्य लोग बाहर थे और घर में बेटी अकेली थी। तभी सौरभ,उसके पिता परसुराम,चाचा टीकाराम,सीताराम और नन्नू घर में घुसे और बेटी पर कैरोसीन डालकर आग लगा दी। उसके चिल्लाने पर आरोपी भाग निकले। नोनेलाल ने बताया कि बेटी के आवाज सुनकर अंदर गए तो आरोपी भाग रहे थे।
सलामतपुर थाना क्षेत्र के जमुनिया में एक खेत पर बने टपरे में अकेली सो रही चौदह वर्षीय एक दलित किशोरी से चाकू की नोक पर बलात्कार किए जाने का मामला प्रकाश में आया है।
गत दिनों मुंबई के एक निजी अस्पताल में आईसीयू में भर्ती एक महिला के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में एक डॉक्टर और दिल्ली में अपनी लेक्चरर बहू के साथ बलात्कार करने का प्रयास करने के आरोप में एक प्रिंसिपल ससुर को गिरफ्तार किया गया। हिमाचल प्रदेश में प्रेरणा नामक स्वयंसेवी संस्था द्वारा मूक-बधिर बच्चों के पुनर्वास के लिए बने केंद्र में प्रिंसिपल और कुछ अध्यापकों द्वारा भी बच्चों से बलात्कार की खबरें हैं। एक समय वह था, जब कभी-कभार ही इस तरह की खबरें सुनने को मिलती थीं, लेकिन अब यह आए दिन की बात हो गई है। पहले चाचा, ताऊ, मामा आदि इन अपराधों के दोषी पाए जाते थे, लेकिन आज तो पुत्री को जन्म देने वाले कुछ पिता और उसकी रक्षा की कसम खाने वाले कुछ भाई भी इन रिश्तों को कलंकित करने का काम कर रहे हैं। शिक्षक जिन पर देश और समाज निर्माण का दायित्व है, उनके बारे में यह सब सुनकर घृणा होती है। अब तो ऐसा लगता है कि आज हम एक ऐसे समाज के अंग बन चुके हैं, जहां नैतिकता और संवेदनाओं के लिए कोई जगह ही नहीं है। आखिर समाज को हो क्या गया है? आज समाज नाम की वस्तु असल में रह ही नहीं गई है। यह एक गंभीर समस्या है। इसी तरह देश व समाज की सुरक्षा का दायित्व निभा रहे सेना व पुलिस, न्याय व्यवस्था के अलंबरदार, लोकतंत्र के सजग प्रहरी और डॉक्टर जैसे सम्मानित पेशे से जुड़े लोग भी यदि यदि इस तरह का आचरण करें तो यही कहावत चरितार्थ होती है कि जब बाड़ ही फसल को खाने लगे उस हालत में आखिर न्याय की आशा किससे की जा सकती है? हालात इसकी गवाही देते हैं कि ऐसे लोग मौका मिलते ही टूट पड़ते हैं और अपने शरीर की भूख शांत करने में पीछे नहीं रहते हैं। दरअसल, ऐसी घटनाएं समाज के लिए कलंक हैं। हालांकि ऐसी घटनाएं नई बात नही है। कहा जाता है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता यानी जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता वास करते हैं। इस विशिष्ट संस्कृति, परंपरा, मान्यता वाले देश में आज पल-पल सर्वत्र नारी शोषित-उत्पीडि़त हो रही है। यहां तक कि नवरात्र में जिस अबोध-मासूम बच्ची को गोद में उठाए, कंधे पर बिठाकर पूजा हेतु ले जाते हैं, उसी आयु वर्ग की बच्चियों को आए-दिन लोग अपनी शैतानी हवस का शिकार बना रहे हैं। ऐसी खबरें रोज-ब-रोज अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। आखिर हमारा समाज इन घटनाओं पर मौन क्यों है। भौतिक विकास के बाद हम पाषाण युग में तो वापस नहीं जा सकते, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि आज भौतिकता ने नैतिकता को निगल लिया है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि न आज मानवता रही, न वह संस्कार रहे, न चरित्र और न ही आदर्श जिसके लिए समूची दुनिया में हमारा देश जाना जाता है। मुंबई के जेजे अस्पताल और ग्रांट मेडिकल कॉलेज में वर्ष 2004 में कराए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि वहां कार्यरत 249 नर्सो में से 12.39 फीसदी ने यह स्वीकार किया कि अस्पताल में काम के दौरान वे अक्सर शारीरिक शोषण की शिकार हुई। पूर्व केंद्रीय मंत्री व वन्य जीव प्रेमी मेनका गांधी भले यह दावा करें कि देश से गिद्ध खत्म हो रहे हैं जबकि हकीकत में देश में मानव रूपी गिद्धों की बहुतायत है जो मौका मिलते ही स्त्री मांस नोचने को भूखे-भेडिय़ों की तरह टूट पड़ते हैं। बलात्कार मानवीयता और नैतिकता की दृष्टि से एक जघन्य और अक्षम्य अपराध है। ऐसे में बच्चियों के साथ बलात्कार निस्संदेह हैवानियत और नीचता की पराकाष्ठा है। इन घटनाओं में तेजी से हो रही वृद्धि चिंताजनक है। कोई भी समाज न तो बलात्कार की अनुमति देता है और न बलात्कारी को माफ कर सकता है। जाहिर है अति विकसित समाज का नियंत्रण राज्य के पास होने से बलात्कार एक असामाजिक जघन्य अपराध न होकर तकनीकी अपराध माना जाता है। बलात्कार वह चाहे बच्ची के साथ किया गया हो या कि वयस्क या अवयस्क के साथ, यह भूल-अज्ञानतानवश या धोखे में किया जाने वाला अपराध नहीं है। यह तो निश्चित है कि बलात्कार स्थान, समय, सुरक्षा आदि का ध्यान रखते हुए योजनाबद्ध साजिश के तहत पूरे संज्ञान में किया जाने वाला अपराध है। जहां तक बलात्कारी का सवाल है वह कोई भी क्यों न हों, उसके लिए सौंदर्य और आयु की कोई कसौटी नहीं है। उसकी कसौटी तो यही है कि वह आसानी से हमला कर अपनी भड़ास निकाल सके। अपनी ताकत का वहां प्रदर्शन करे जहां उसका कोई प्रतिवाद न कर सके। यदि ताकत का प्रदर्शन वह बाहर करेगा, तो निश्चित ही उसे विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसीलिए बच्चियां और घर की बेटी-बहू तो बलात्कारी को सबसे आसानी से और बिना प्रतिरोध के शिकार के रूप में मिल जाती हैं। तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार के बाद हत्या करने, पिता द्वारा बेटी से बलात्कार और ससुर द्वारा बहू से बलात्कार की कोशिशें और हिमाचल की घटना इसका प्रमाण है कि आज आदमी की मानसिकता किस हद तक विकृत और दिवालिया हो चुकी है। इसमें दो राय नहीं कि हमारे यहां बलात्कार की कोई कड़ी सजा नहीं है। इस मामले में छात्र, शिक्षक, बुद्धिजीवी और आमजन सभी की एक राय है कि देश में लचीली कानून व्यवस्था होने के कारण ऐसे अपराधों में वृद्धि हो रही है। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद कड़ी सजा नहीं होने के कारण कुछ दिनों बाद ही अपराधी छूट जाता है। जब तक कोई ऐसी सजा का प्रावधान नहीं होगा जिससे अपराधियों में भय बना रहे, तब तक ये अपराध इसी तरह होते रहेंगे और बलात्कारी बेखौफ खुलेआम घूमते रहेंगे। इससे बलत्कृत लड़की व उसके परिजन समाज में बदनामी से बचने की खातिर बार-बार घर-बार शहर छोड़ दर-दर भटकते रहेंगे।

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

धन और बल है आज के लोकतंत्र का असली चेहरा

आजकल उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं। दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा। जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। अब नेताओं का लिबास भी जुदा हो गया है। कुर्ता-पायजामा गुजरे जमाने की बात हो गयी है। झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद ही जूते आजकल के नेताओं का ‘ड्रेस कोड’ है। हालांकि यही ‘ड्रेस कोड’ माफियाओं का भी हो चला है। स्टेनगन धारी गनर, होलेस्टर में लटके रिवाल्वर भी आजकल के नेताओं के लिए ‘स्टेट्स सिम्बल’ हैं। आजकल यह तय करा मुश्किल है कि कौन नेता है और माफिया। वैसे भी अब माफिया और नेताओं के बीच बहुत बारीक अन्तर रह गया है। बहरहाल, नेताओं की उस भीड़ में ‘आम आदमी’ का तड़का भी था। थके-मांदे चेहरे। साधारण कपड़े पहने आम आदमी या कह लीजिए हर चुनाव में ‘मुंडने वाली भेड़ें’ भी शामिल थीं, जिनकी याद नेताओं को चुनाव में ही आती है। इस वक्त आम आदमी नेताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। उसे सिर आंखों पर बैठाया जाता है। आम आदमी को लगजरी गाड़ियों का सुख भी कुछ देर के लिए चुनाव के वक्त मिल जाता है। चुनाव के बाद कौन लगजरी गाड़ी में सवारी कराएगा।

चुनाव प्रचार शुरु हुआ तो आंखें चकाचौंध हो गयीं। हर गांव रंगीन पोस्टरों और बैनरों से पट गया। एक जमाना था, जब जिला पंचायत और ग्राम पंचायत के चुनाव बिना किसी शोर-शराबे के पूरे हो जाते थे। लेकिन अब बिना ‘शोर’ और ‘शराब’ के पूरे नहीं होते। आबकारी विभाग का कहना है कि जितना राजस्व तीन महीने में आता है, इस बार एक महीने में ही आ गया। अवैध और हरियाणा से तस्करी से लाई गयी शराब का कोई हिसाब-किताब किसी के पास नहीं है। वोटर ने भी सोचा मुफ्त की शराब है, जमकर पियो। नतीजे में कई ‘वोटर’ अपनी जाने से हाथ धो बैठे तो कई अस्पतलों की शरण में चले गए। ऐसा नहीं है कि ऐसी हालत सभी गांवों की है। जब हमारा देश भूखमरी और कुपोषण के मामले में पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों से भी बहुत पिछड़ा हो, तो ऐसा हो भी नहीं सकता। पैसे की भरमार उन गांवों में हुई है, जो शहरों से लगे हुए हैं। इन गांवों की जमीन अनाज उगलती हो या नहीं, लेकिन बढ़ती आवास समस्या और एक्सप्रेस हाइवे के निर्माण की वजह से जमीनें सोना उगल रही हैं। पैसा आया है तो राजनैतिक महत्वकांक्षा भी जागी है।

इस पंचायत चुनाव में एक खास बात यह भी हुई है कि एक ही परिवार के चार सदस्यों को र्निविरोध सदस्य निर्वाचित किया गया है। मेरठ के हस्तिानापुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं योगेश वर्मा। मेरठ के दौराला ब्लॉक से उनके माता-पिता सहित दो सगे भाई बीडीसी के सदस्य र्निविरोध निर्वाचित हो गए है। अब लोग खुद तय करें कि एक ही परिवार के चार सदस्य किस तरह से र्निविरोध चुने जा सकते हैं ? जब चार सदस्य एक ही परिवार के हों तो उस परिवार के सदस्य को ब्लॉक प्रमुख बनने से कौन रोक सकता है ? इस तरह से हो गयी न एक ही परिवार की सरकार ? सवाल यह है कि यह कौनसा लोकतंत्र है और इस तरह का लोकतंत्र देश और समाज को कहां ले जाएगा ? किसी चुनाव में एक ही परिवार के चार सदस्यों का र्निविरोध चुना जाना ‘गिनीज वर्ल्ड बुक’ में दर्ज हो चाहिए।

आरक्षण के तहत बड़ी संख्या में महिलाएं भी पंचायत चुनाव में उतरी हैं। लेकिन इनकी हैसियत किसी मुखौटे से ज्यादा नहीं है। जो सीट महिला आरक्षण में चली गयी है, उस सीट पर नेताजी ने मजबूरी में अपनी पत्नि, बहन, मां या पुत्रवधु को पर्चा भरवा दिया है। इसलिए पोस्टरों, बैनरों और अखबार के विज्ञापनों में वह हाथ जोड़े खड़ी हैं। साथ में यह जरुर लिखा है कि उम्मीदवार किस की पत्नि, बहु, मां या बेटी है। साथ में पति, ससुर, बेटे या भाई की तस्वीर भी हाथ जोड़े चस्पा है। सब जानते हैं कि चुनाव महिला नहीं लड़ रही बल्कि महिला की आड़ में पुरुष लड़ रहा है। इसलिए महिला उम्मीदवारों की सूरत सिर्फ पोस्टरों, बैनरों और अखबारों में ही दिख रही है। कहीं-कहीं तो मुस्लिम महिला उम्मीदवार की सूरत ही सिरे से गायब है। चुनाव प्रचार से भी महिलाएं दूर है। इसकी जिम्मेदारी पुरुषों ने संभाल रखी है। असली उम्मीदवार को तो पता ही नहीं कि बाहर क्या हो रहा है। वह तो आज भी घर के अन्दर चूल्हा झोंक रही है, भैंसों को सानी कर रही है या गोबर से उपले पाथ रही है। किसी महिला के निर्वाचित होने के बाद भी उनकी हैसियत कुछ नहीं होगी। सारा काम पुरुष ही करेगा। महिला तो सिर्फ ‘रबर स्टाम्प’ होगी।
सोचा गया था कि महिलाओं को आरक्षण देने से महिलाओं का सशक्तिकरण होगा। क्या इन हालात में महिलाओं का सशक्तिकरण हो सकता है ? कुछ लोग जब महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मुखालफत करते हैं तो इसके पीछे एक तर्क यह भी होता है कि इससे महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होगा, बल्कि पुरुष ही अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा करेगा। यदि फायदा होगा भी तो शबाना आजमी, जया प्रदा या नजमा हैपतुल्ला जैसी महिलाओं का होगा, जो पहले से ही पुरुषों से भी ज्यादा सशक्त हैं। ग्राम पंचायत को तो छोड़ दें। मैट्रो शहरों के नगर-निगम में चुने जाने वाली ज्यादतर महिला पार्षद भी बस नाम की ही पार्षद होती हैं। सारा काम तो ‘पार्षद पति’ ही करते हैं। इस तरह से ‘पार्षद पति’ का एक पद स्वयं ही सृजित हो गया है। मेरे वार्ड से एक महिला पार्षद है लेकिन मैंने अपनी पार्षद का चेहरा आज तक नहीं देखा।

लोकसभा और विधान सभा के चुनाव लगातार महंगे होते गए। धन और बल वाला आदमी ही दोनों जगह जाने लगा। आम आदमी के लिए लोकसभा और विधानसभा में जाना सपना सरीखा हो गया है। नैतिकता, चरित्र, आदर्शवाद और विचारधारा अब गुजरे जमाने की बातें हो गयी हैं। अबकी बार जिला पंचायत और ग्राम पंचायत जैसे छोटे चुनाव में बहता पैसा इस बात का इशारा कर रहा है कि अब इन छोटे चुनावों में भी उतरने के लिए आम आदमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। धन और बल ही आज के लोकतंत्र का असली चेहरा है।

किसी मस्जिद का नाम बाबरी हो ही नहीं सकता!

अयोध्या पर हाई कोर्ट के फैसले के बाद विवाद और असंतोष वहां से उभरा, जहां से इसकी गुंजाइश बिल्कुल न के बराबर थी। कुछ राजनेता, जिनकी हमेशा यह लाइन रही कि समझौता करो या कोर्ट का फैसला मानो, उन्होंने भी इससे मुंह बिचकाया। निर्मोही अखाड़े ने कोर्ट के द्वारा विहिप को वरीयता देने पर आपत्ति जताई है। उसके अनुसार सरकार ने उसी से 1949 में यह जमीन लेकर रिसीवर नियुक्त किया था, लिहाजा जमीन उसे मिलनी चाहिए।

कुछ हिंदू संगठनों को लगता है कि बाबर और उसके सिपहसालार मीरबाकी ने इतिहास में जो भी किया, उसका बदला लेने का वक्त आ गया है। उधर मुख्य याचिकाकर्ता हाशिम अंसारी की पहल को कुछ मुस्लिम संगठन इसलिए जमींदोज करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर अब झुके तो हमेशा झुकना पड़ेगा।

इस बीच कुछ बौद्ध संगठन बेहद मुखर हुए हैं। यद्यपि उनके दावे को अभी हाल ही में फैजाबाद की जिला अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन उनके तर्क खारिज नहीं किए जा सकते। उनके अनुसार सुग्रीव टीला और कुबेर टीला को भारतीय पुरातत्व के पितामह कनिंघम ने बौद्ध स्तूप बताया है। किसी मस्जिद का नाम बाबरी हो ही नहीं सकता, क्योंकि इस्लाम में किसी व्यक्ति विशेष के नाम से मस्जिद तामीर नहीं की जा सकती। उनके अनुसार अयोध्या में एक बौद्ध भिक्षु बाबरी नाम के हुए हैं, उन्हीं के नाम पर यहां बाबरी स्तूप था। अयोध्या प्रसिद्ध कवि अश्वघोष की नगरी रही है और तथागत ने यहां पर 16 वर्ष वर्षावास किया था। उनके अनुसार हनुमानगढ़ी एक संघाराम के ऊपर बनी है और मीरबाकी का लेख अंग्रेजों ने आगरा से लेकर अयोध्या में चुपके से रख दिया था।

दरअसल, अयोध्या मुद्दे का समाधान भारतीय संस्कृति की जड़ों में खोजा जाना चाहिए। अयोध्या कभी किसी एक मजहब या संस्कृति की जागीर नहीं रहा। ठीक उसी तरह जैसे हिंदुस्तान कभी किसी एक मजहब का होकर नहीं रहा। हनुमानगढ़ी का निर्माण अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने कराया था। यह जगह एक मुसलमान जमींदार की थी। जब से हनुमानगढ़ी आबाद हुई, तभी से उसका पहला प्रसाद एक मुस्लिम फकीर को दिया जाता है। हुनमानगढ़ी में इस परंपरा को सहेजते हुए एक सर्वधर्म सत्यार मंदिर का निर्माण किया गया था। इस मंदिर में आज भी राम, बुद्ध, महावीर के साथ मक्का-मदीना और जरथुस्त्र की तस्वीरें आबाद हैं। हनुमानगढ़ी के महंत पहले अपने आंगन में रोजा-इफ्तार की दावत दिया करते थे जिसमें अयोध्या के मुसलमान शिरकत करते थे, हालांकि 1990 के बाद से इस पर ग्रहण लगा है।

इसी अयोध्या में हजरत शीश की दरगाह है। यहीं हजरत नूह की नौगजा दरगाह है, जहां पर मुसलमानों से ज्यादा अकीदतमंद हिंदू हुआ करते हैं। 12वीं शती में अयोध्या को सूफी परंपरा का एक अजीम शिक्षा केंद्र माना जाता था। मध्य एशिया से काजी कुतुबुद्दीन यहां पर शिक्षा ग्रहण करने आए। सूफी परंपरा के फिरदौसी कबीले के शेख जमाल गूजरी जो हिंदू-मुस्लिम एकता के कसीदे पढ़ते थे, उन्होंने अयोध्या की सर्वधर्म समभाव परंपरा को देखते हुए इसे अपना केंद्र बनाया था।

प्रख्यात नर्तकी उमराव जान जो बाद में मुजफ्फर अली की अजीम शाहकार बनकर पर्दे पर उतरी और बेगम अख्तरी बाई जिसने ठुमरी, गजल और दादरा को अवध की सरहदांे से निकालकर दीगर सूबों में पहुंचाया, वे इसी अयोध्या की आबरू थीं। अयोध्या में भगवा ध्वज, मालाएं, प्रसाद बनाने वाले आधे से अधिक कारीगर मुसलमान हैं। आज भी अयोध्या में सूफी संतों और फकीरों की 80 से अधिक मजारें और दरगाहें हैं और मध्यकाल से ही अयोध्या को आसपास जिलों के मुस्लिम घरों में मक्का खुर्द (छोटी मक्का) कहा जाता है। यह भी केवल इकबाल जैसे किसी शायर का ही जिगर हो सकता है जो राम को ईमाने-हिंद माने, ‘है राम के वजूद पर हिंदुस्तान को नाज/अहले-नजर समझते हैं उसको ईमाने-हिंद।’

अयोध्या जैन र्तीथकरों की भी जन्मस्थली रही है। चौबीस र्तीथकरों में से पांच यहीं पैदा हुए। अयोध्या का जो नामकरण साकेत से अयोध्या (वह क्षेत्र जहां युद्ध और वध नहीं होते) हुआ, उस पर बौद्ध धर्म के साथ जैन धर्म की अहिंसा का भी प्रभाव माना गया है। यह भी इतिहास का एक तथ्य है कि सिख गुरुओं में नानक, तेगबहादुर और गुरु गोविंद सिंह ने अयोध्या के ब्रह्मकुण्ड में ध्यान साधना की थी।

ब्रह्मघाट पर स्थित गुरुद्वारा सिख धर्म के सबसे पुराने गुरुद्वारों में से एक है। अस्तु अयोध्या किसी एक का नहीं है। हाई कोर्ट ने जिस मंदिर-मस्जिद का सहअस्तित्व माना है, उसको आगे बढ़ाने की जरूरत है। इस विवादित स्थल पर राम मंदिर के साथ-साथ मस्जिद, गुरुद्वारा और बौद्ध मठ एक साथ बने। जब इस जगह से सुबह-सवेरे अजान के साथ-साथ अरदास और घंटे-घड़ियालों की स्वर लहरी गूंजेगी तो हिंदुस्तान का असली अक्स नमूदार होगा, जो किसी एक का न होकर सबका है।

इस परिवारवाद और मौकापरस्ती पर शर्म आती है

टिकट नहीं मिलने पर टिकटार्थी अपने ही दल के दफ्तर में आग लगा दे,ऐसा बिहार में इस दफा पहली बार हुआ है। टिकट से वंचित लोगों के समर्थकों ने पूर्णिया के कांग्रेस पार्टी कार्यालय भवन में रविवार को पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। इतना ही नहीं, करीब-करीब सभी प्रमुख दलों के राज्य मुख्यालयों में या उसके आसपास टिकटार्थियों ने ऐसा हंगामा किया कि कुछ पार्टी दफ्तरों में ताले लगाने पड़े। टिकट बांटने के काम में लगे कुछ बड़े नेताओं को अपमान से बचने के लिए भूमिगत होकर हर दिन अपना ठिकाना बदलना पड़ा। राज्य भर से पटना पहुंचे टिकटलोलुप या फिर टिकट वंचित लोगों के छोटे-छोटे उग्र समूह कुछ दिनों से विभिन्न दलों के दफ्तरों, नेताओं के आवासों व सड़कों पर इस तरह की हिंसा करते रहे हैं मानो वे राजनीतिक कार्यकर्त्ता नहीं बल्कि गुंडा गिरोहों के सदस्य हों।

हालांकि विद्रोह पर उतारू ऐसे लोगों में सब गलत तत्व ही नहीं हैं। उनमें से कुछ वास्तविक राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं ने आरोप लगाया कि नेतत्व ने गैर राजनीतिक कारणों से विवादास्पद तत्वों को टिकट दे दिये। कहा जा रहा है कि कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों द्वारा टिकट वितरण में किसी तरह के मापदंड नहीं अपनाये जाने के कारण भी इस तरह के अराजक तत्वों को अपना कौशल दिखाने का साहस हो रहा है। चुनाव अभियान के दौरान ऐसे लोग कैसी करामात दिखाएंगे, इसको लेकर अटकलों का बाजार गर्म है।

टिकटों का फैसला करके प्रदेश कांग्रेस के नेता जब 2 अक्तूबर को दिल्ली से लौटे तो पटना हवाई अड्डे पर बेटिकट हुए कांग्रेसियों की उग्र भीड़ ने चौधरी महबूब अली कैसर और डा. अशोक राम के साथ धक्कम धुक्की की। उन्हें अपमानित किया। उनकी गाड़ी के शीशे तोड़ डाले और अश्लील नारे लगाये। कैसर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और डा.राम कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं। ऐसा पहली बार हुआ।

बेटिकट हुए लोगों की भीड़ के सामने आने से महाबली लालू प्रसाद भी कतराते रहे। इस संबंध में लालू प्रसाद ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रंस में स्वीकार किया कि मैं टिकटार्थियों के साथ सात दिनों तक लुकाछिपी का खेल खलता रहा। टिकटार्थी डाल-डाल तो मैं पात पात रहता था। जदयू के राज्य कार्यालय में रोष पूर्ण प्रदर्शन के कारण पार्टी पदाधिकारियों ने कार्यालय जाना छोड़ दिया और कार्यालय में ताला लगा दिया गया। भाजपा के राज्य कार्यालय में भारी तोड़फोड़ की गई। कई लोग जो अपने सुप्रीमो की चमचागिरी में उन्हें भगवान कहा करते थे, टिकट नहीं मिलने पर वही लोग सुप्रीमो को सार्वजनिक रूप से राक्षस की संज्ञा देने लगे। ऐसे मनोरंजक किंतु शर्मनाक दृश्य देख कर लोगबाग क्षुब्ध हैं।

राजनीति में इन अभूतपूर्व गिरावटों के कई कारण रहे। कई मामलों में वाजिब उम्मीदवारों के बदले अन्य गैर राजनीतिक कारणों से अयोग्य व अपात्र लोगों को विभिन्न दलों ने टिकट दिये। दूसरी महत्वपूर्ण बात देखी गई कि अपवादों को छोड़कर राजनीति अब पूरी तरह व्यापार बन चुकी है। सैकड़ों टिकटार्थी जिस तरह के आलीशान वाहनों में सवार होकर जितनी कीमती पोशाक में पटना आ रहे हैं, राजनीतिक दलों के दफ्तरों के आसपास उन्हें देख कर लगता है कि टिकट नहीं बल्कि किसी थोक व्यापार की एजेंसी लेने आये हैं।

टिकट धर्मा, टिकट कर्मा, धर्मा-कर्मा टिकट-टिकट की रणनीति में विश्वास रखने वाले महत्वाकांक्षी टिकटार्थियों ने पिछले कुछ सप्ताहों में टिकट के लिए जितने बड़े पैमाने पर इस बार दल बदल किया है, और अब भी कर रहे हैं, वह अपने आप में एक रिकार्ड है।

चुनाव के मौके अनेक नेताओं और कार्यकर्त्ताओं के असली चेहरे उजागर कर देते हैं। बिहार में इस बार कुछ अधिक ही हो रहा है। नेता एक दल में सांसद है और उनके परिजन दूसरे दल में टिकट पा रहे हैं। ऐसा एक नहीं, बल्कि अनेक नेताओं के मामलों में हो रहा है। गत चुनावों में परिवारवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने वाले एनडीए ने इस बार परिवारवाद के सामने घुटने टेक दिये हैं। राजनीति में परिवारवाद बहुत पहले से है, पर परिवारवाद का ऐसा विस्तार पहले कभी नहीं देखा गया।

राम विलास पासवान के चार रिश्तेदार राजद-लोजपा गठबंधन की ओर से इस बार विधान सभा का चुनाव लड़ रहे हैं। हां, राजद के सांसद जगदानंद अपवाद के रूप में जरूर उभरे हैं। उनके पुत्र सुधाकर सिंह ने सांसद पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर टिकट के लिए भाजपा की सदस्यता स्वीकार कर ली। पर वे अपने पुत्र को राजनीति में लाने के खिलाफ रहे हैं। बाद में जगदानंद ने कहा कि मैं राम गढ़ विधान सभा क्षेत्र में अपने दल राजद के ही उम्मीदवार के पक्ष में ही काम करूंगा। भाजपा-जदयू गठबंधन ने सुधाकर को राम गढ़ से उम्मीदवार बनाया है जहां से कभी जगदानंद विधायक हुआ करते थे। अभी वहां से राजद के अम्बिका यादव विधायक हैं।

इस बार जितनी बड़ी संख्या में पूर्व सांसदगण विभिन्न दलों के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं, उतनी संख्या में एक साथ पहले कभी नहीं लड़े थे। किसी न किसी सदन में जल्द से जल्द पहुंचने की आतुरता ने ऐसी स्थिति ला दी है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार जब राजनीति का सबकुछ आम तौर पर सदन की सदस्यता व मंत्रीपद की ऐन केन प्रकारेण प्राप्ति ही बन जाए तो फिर और क्या होगा?

अपने या अपने परिजन के लिए एक चुनावी टिकट की तलाश में कई छोटे-बड़े नेताओं को इन दिनों न जाने कहां-कहां गुहार लगाते देखा गया। जहां उन्हें नहीं जाना चाहिए, वहां भी गये और जा रहे हैं। विभिन्न जेलों में बंद बाहुबलियों से भी वोट और टिकट के लिए सहयोग मांगे जा रहे हैं। माफियाओं और डॉन लोगों से बड़े-बड़े नेतागण गुप्त मुलाकातें कर रहे हैं। राजनीति में पतन की पराकाष्ठा और क्या है? कहां तक है? यह अभी तय नहीं हुआ है।

टिकट के लिए साले, बहनोई से विद्रोह कर रहे हैं और बेटा, बाप से। कई पुत्रों ने तो अपने अनिच्छुक पिता को भी पैरवीकार बनने के लिए बाध्य कर दिया ताकि वे उसके लिए जैसे भी हो, टिकट का जुगाड़ करें। कुछ सांसदों ने अपना बुढ़ापा कष्टमय होने से बचाने के लिए पुत्र के टिकट के लिए भरसक प्रयास किया भी। जदयू के कई सांसदों ने परिवारवाद पर अपने दल की नीति को बदलने के लिए नेतृत्व को इस बार बाध्य ही कर दिया। अब परिवारवाद के मामले में जदयू एक कदम पीछे और दो कदम आगे की रणनीति पर चल रहा है। पिछले चुनावों में जदयू ने और उसकी देखा-देखी भाजपा ने भी किसी नेता के परिजन को टिकट नहीं दिया था। पर इस बार राजग को अपनी यह नीति छोड़नी पड़ी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पर कहा कि हमारी परिवारवाद विरोधी नीति को गत चुनाव में मतदाताओं का पूर्ण समर्थन नहीं मिला था। इसलिए हमें उस नीति को छोड़ना पड़ रहा है।

दरअसल गत साल के बटाईदारी विवाद को लेकर प्रतिपक्ष द्वारा राज्य सरकार व राजग के खिलाफ अब भी चलाये जा रहे अफवाह- अभियान से दबाव महसूस कर रहे राजग ने अन्य तरह के कुछ समझौतों के जरिए उसकी क्षतिपूर्ति की कोशिश की है।

इस चुनाव के अवसर पर राजनीति में व्याप्त भारी टिकटलोलुपता व सत्तालोलुपता को देखकर बिहार के राजनीतिक व प्रशासनिक भविष्य को लेकर अनेक लोगों को चिंता हो रही है। विधायक फंड ने इसे भारी लाभदायक पेशा बना दिया है। जाहिर है कि ऐसे ही लोलुप नेतागण सत्ता व शक्ति प्राप्त करके निजी धनोपार्जन कार्य में तुरंत लग जाते हैं जो आम जनता के विकास में बाधक होता है। वे सरकारी लाभ को आम गरीब लोगों तक नहीं पहुंचने देते। इससे गरीबी और विषमता बढ़ती है। परिणामस्वरूप नक्सली तथा दूसरे अराजक व देशद्रोही तत्वों को बल मिल जाता है। भ्रष्ट, स्वार्थी और टिकट लोलुप लोग तर्क देते हैं कि क्या कीजिएगा, जमाना ही बदल गया है। पर इस जमाने को और भी अधिक गिरावट की ओर बदलने में आपका कितना योगदान हो रहा है, यह बात वे नहीं बताते। वे इस बात पर भी कोई टिप्पणी नहीं करते कि टिकटलोलुपों के ऐसे व्यवहार के कारण ही वंचित लोगों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अनास्था बढती है। इस अनास्था का लाभ अराजक व देशद्रोही तत्व उठा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि ऐसे टिकटलोलुप व स्वार्थी लोगों को सत्ता या ताकत के पद तक पहुंचने से मतदान के जरिए ही जनता ही रोक सकती है। वह अवसर आ गया है। इस बार चूक जाने पर काफी देर हो चुकी होगी। इसलिए भरसक बेहतर उम्मीदवारों का चुनाव जरूरी है।