शनिवार, 4 दिसंबर 2010

अपराध की भेंट चढ़ता देश का बचपन

नेशनल क्राइम रिकॉड्‌र्स ब्यूरो के नवीनतम आंकड़े देश के भविष्य की ख़ौ़फनाक तस्वीर पेश करते हैं. उनके मुताबिक़ पूरे देश में अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि बाल अपराधों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है. पिछले दस वर्षों यानी 1998-2008 के बीच बच्चों द्वारा किए गए अपराधों में ढाई गुना इज़ा़फा हुआ है और कुल अपराधों की तुलना में बाल अपराधों का अनुपात भी दोगुने से ज़्यादा हो चुका है. ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, साल 1998 में बाल अपराधों की कुल संख्या 9352 थी, जो 2008 में बढ़कर 24,535 हो गई. देश भर में दर्ज किए गए कुल आपराधिक मामलों के प्रतिशत के लिहाज़ से देखें तो 1998 में बाल अपराधों का प्रतिशत केवल 0.5 था, जो 2008 में 1.2 प्रतिशत के आंकड़े को छू चुका है. यदि लगातार दो वर्षों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2007 में बच्चों द्वारा किए गए कुल अपराधों की संख्या 22,865 थी, जो 2008 में बढ़कर 24,535 हो गई. यानी एक साल के अंदर बाल अपराधों की संख्या में तक़रीबन 7.3 प्रतिशत की वृद्धि हो गई. इससे पहले वर्ष 2007 में 2006 के मुक़ाबले बाल अपराधों की संख्या में 8.4 प्रतिशत का इज़ा़फा दर्ज किया गया था. ये तो केवल वे आंकड़े हैं, जो पुलिस थानों में दर्ज किए गए हैं. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि अपराध के लगभग आधे मामले पुलिस के पास नहीं पहुंच पाते या पहुंचते भी हैं तो उन्हें दर्ज नहीं किया जाता. इस तथ्य को ध्यान में रखकर यदि इन आंकड़ों पर ग़ौर करें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि देश का बचपन लगातार अपराध की आगोश में समाता जा रहा है.


चिंता की बात केवल ये आंकड़े ही नहीं हैं. लखनऊ जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के मुताबिक़, बच्चों द्वारा अंजाम दिए जा रहे अपराधों में सेक्स संबंधी अपराधों की संख्या में सबसे तेजी से वृद्धि हो रही है. कुछ साल पहले तक अधिकांश बाल अपराध चोरी, लूटपाट, छीनाझपटी आदि की श्रेणी में आते थे और वे आम तौर पर भूख एवं ग़रीबी के शिकार कम आय वर्ग वाले परिवारों के बच्चों द्वारा अंजाम दिए जाते थे, लेकिन पिछले तीन सालों के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक़, बच्चे बड़ी संख्या में बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों की ओर मुड़ रहे हैं और इन अपराधों को अंजाम देने वाले अधिकतर बच्चे समाज के उस वर्ग से संबंधित हैं, जिन्हें समृद्ध कहा जाता है. लखनऊ जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास वर्ष 2009 में बाल अपराध के 346 मामले आए, जिनमें अकेले बलात्कार के 35 मामले थे, जबकि हत्या के 20. वर्ष 2010 में अब तक दर्ज कुल 140 आपराधिक मामलों में 36 मामले बलात्कार और हत्या के हैं.

बच्चे ही किसी राष्ट्र का भविष्य होते हैं और आने वाले समय में देश की बागडोर उनके ही हाथों में होती है, लेकिन बाल अपराध के उक्त आंकड़े भारत की नई पीढ़ी में बढ़ती निराशा और हिंसक प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं. आख़िर इसकी वजह क्या है? इसका कारण है सामाजिक नैतिकता का अवमूल्यन, परिवार नामक संस्था का कमज़ोर पड़ना, बढ़ती व्यवसायिकता और कमज़ोर क़ानून. एक ओर जहां हमारा देश सामाजिक विकास के मानकों पर लगातार आगे बढ़ रहा है, वहीं समाज की नैतिकता के स्तर में लगातार हृास हो रहा है. अब संबंध मायने नहीं रखते, रिश्तों की डोर कमज़ोर पड़ती जा रही है. संयुक्त परिवार की परंपरा अब इतिहास की चीज बनती जा रही है. हम दो-हमारे दो के इस दौर में माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए समय नहीं होता, उनका सारा ध्यान ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाने में लगा रहता है. पैसे की इस धमाचौकड़ी के चलते उपजा अकेलापन बच्चों को निराशा की ओर ले जाता है. हालांकि समय की इस कमी की भरपाई के लिए माता-पिता बच्चों की हर छोटी-बड़ी इच्छा पूरी करने की कोशिश करते हैं, लेकिन बचपन का अबोध मन अक्सर अपने रास्ते से भटक जाता है. सही-ग़लत के ज्ञान के अभाव में बच्चे ऐसे रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं, जो उन्हें अपराध की दुनिया में ले जाता है.

बाल अपराधों की बढ़ती संख्या के लिए मीडिया की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता. फिल्में हों या टेलीविजन चैनल, इनमें हिंसा और अपराध के दृश्यों की भरमार होती है. यहां तक कि अख़बारों में भी अपराध की ख़बरों को ही ज़्यादा जगह मिलती है. कई बार अपराधियों को नायक के रूप में महिमामंडित भी किया जाता है. बच्चे इससे प्रभावित होकर उनकी नकल करने की कोशिश करते हैं और अपराधी बनकर रह जाते हैं. बाल अपराध और अपराधियों से निपटने के लिए देश में ज्युवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2000 बनाया गया है, लेकिन इसके प्रावधानों का सही तरीक़े से पालन नहीं किया जाता. इस क़ानून के मुताबिक़, हर पुलिस स्टेशन में बाल अपराध शाखा का होना अनिवार्य है, जिसमें बाल अपराध से निबटने और उसे रोकने में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारियों को नियुक्त किया जाता है, लेकिन ऐसा हक़ीक़त में नहीं होता. अधिकांश पुलिस स्टेशनों में बाल अपराध शाखा होती ही नहीं है और होती भी है तो उसमें नियुक्त अधिकारी दूसरे कामों की अधिकता के चलते अपनी प्राथमिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर पाते. बाल अपराधियों को बाल सुधार गृहों में रखा जाता है, लेकिन इन सुधार गृहों की हालत ऐसी होती है कि अच्छे बच्चे भी यहां आकर अपराधी बन जाते हैं. एक-एक कमरे में 25-30 बच्चों को रहने के लिए मजबूर किया जाता है. बच्चों के सुधार के लिए जो कार्यक्रम हैं, वे मौजूदा दौर के अनुकूल नहीं हैं. कंप्यूटर क्रांति के इस जमाने में उन्हें बढ़ईगिरी और हथकरघा जैसे कामों का प्रशिक्षण दिया जाता है. एक सच्चाई यह भी है कि जो बच्चे एक बार बाल सुधार गृह में आ जाते हैं, वे हमेशा के लिए अपराधी बनकर रह जाते हैं, हमारा समाज उन्हें उसी रूप में स्वीकार करता है.

बाल अपराधों की बढ़ती संख्या भविष्य के लिए ख़तरे का संकेत है. बच्चे भविष्य की धरोहर हैं, लेकिन सामाजिक कमज़ोरियों और सरकार के ढुलमुल रवैये के चलते हमारी यह धरोहर लगातार पतन के रास्ते पर आगे बढ़ रही है. बाल अपराधों की बढ़ती संख्या हमारे समाज के माथे पर एक ऐसा कलंक है, जिससे तत्काल निजात पाने की ज़रूरत है. इसके लिए आवश्यक है कि ज्युवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2000 में सुधार किए जाएं और इसके प्रावधानों के पूरी तरह पालन की व्यवस्था की जाए. सामाजिक स्तर पर भी इसके लिए अलग से क़दम उठाने की दरकार है. इसके साथ-साथ मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास दिलाने की ज़रूरत है, अन्यथा हमारे देश का भविष्य इसी तरह अपराध की भेंट चढ़ता रहेगा.

बाल अपराध के आंकड़े (1998-2008)
वर्ष बाल अपराधों कुल अपराध कुल अपराध में बाल अपराध दर

की संख्या बाल अपराधों (प्रतिशत में)

का प्रतिशत

1998 9352 1778815 0.5 1.0

1999 8888 1764629 0.5 0.9

2000 9267 1771084 0.5 0.9

2001 16509 1769308 0.9 1.6

2002 18560 1780330 1.0 1.8

2003 17819 1716120 1.0 1.7

2004 19229 1832015 1.0 1.8

2005 18939 1822602 1.0 1.7

2006 21088 1878293 1.1 1.9

2007 22865 1989673 1.1 2.0

2008 24535 2093379 1.2 2.1

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