शनिवार, 4 दिसंबर 2010

जहां फरिश्ते भी पांव रखने से डरते हैं

जिस प्रशासनिक भ्रष्टाचार व लाल फीताशाही को ठीक करने का नीतीश सरकार ने बीड़ा उठाया है, उस राह गुजरने से कभी फरिश्ते भी घबराते थे। किस तरह घबराते थे, उसके कुछ नमूने यहां पेश हैं।

एक बार एक अत्यंत ईमानदार व कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारी को बिहार सरकार का कार्मिक सचिव बना दिया गया था। जब उन्होंने कड़ाई शुरू की तो एक बड़ा बाबू ने अभियान चलवा कर उन्हें वहां से हटवा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यानी सचिव हारा, क्लर्क जीता। दरोगा जीता, डीजीपी हारा, इसके भी कई उदाहरण सामने आये।

उस बड़ा बाबू के बारे में यह कहा जाता था कि किसी डिप्टी कलक्टर से भी सिर्फ बात कर लेने के लिए वह अपना सिर तभी उठाता था जब उसके टेबुल और चश्मे के बीच में लंबा करके सौ रुपये का एक नोट धीरे से बढ़ा दिया जाता था। नोट के दर्शन होते ही वह अपना सिर ऊपर उठा कर पोस्टिंग की प्रतीक्षा में सचिवालय की दौर लगा रहे अफसर की ओर देखता था। बाकी काम के लिए फीस अलग से।

सत्तर के दशक में आबकारी विभाग का एक निरीक्षक एक आबकारी कमिश्नर को हटवा सकता था। एक आबकारी अधीक्षक किसी आबकारी मंत्री को हटवा सकता था। तीन आबकारी अधीक्षकों का एक चर्चित सिंडिकेट तो किसी मंत्रिमंडल को भी अपदस्थ करवा सकता था।

इसके अलावा अन्य मलाईदार विभागों का भी बिहार में यही हाल था। यह सब अस्सी के दशक तक चलता रहा। बाद में तो स्थिति और भी बिगड़ी। गत पांच साल में नीतीश कुमार ने राम-राम कहते-कहते किसी तरह इसी प्रशासनिक तंत्र से काम निकाला। ऐसा नहीं कि पूरे प्रशासन में सारे के सारे कर्मचारी व अफसर गड़बड़ ही हैं। पर उपर से नीचे तक घूसखोरों की संख्या इतनी अधिक जरूर है कि स्थिति कंट्रोल से बाहर हो रही है। ऐसा कोई सरकारी दफ्तर जल्दी खोज लेना बड़ा कठिन काम है जहां रिश्वत के बिना कोई काम हो जाता हो। इस स्थिति से रोज ब रोज पीड़ित हो रही जनता को निजात दिलाने के लिए नीतीश सरकार ने कड़े कदम उठाने का दृढ निश्चय किया है। पर यह काम कितना कठिन है, इसे समझने के लिए कुछ ईमानदार अफसरों के लिखित अनुभवों को एक बार फिर याद कर लेना मौजूं होगा।

राज्य सरकार में विभिन्न स्तरों पर जो भीषण भ्रष्टाचार जारी है, उसके लिए सिर्फ उपर्युक्त बड़ा बाबू जैसे लोग ही जिम्मेदार नहीं हैं। राजनीति सहित कई क्षेत्रों के लोग जिम्मेदार हैं। किसी भी कारगर व निर्णायक कार्रवाई का भारी विरोध हो सकता है। इसलिए इस काम में नीतीश सरकार को ईमानदार जनता की मदद की भारी जरूरत पड़ेगी।

क्योंकि प्रस्तावित ‘राइट टू सर्विस कानून’ बन कर लागू हो जाने से इस गरीब प्रदेश की बहुत सारी बीमारियों का इलाज हो जाने वाला है। पर इसे लागू करना कितना कठिन है, उसका अनुमान एन सी सक्सेना के एक पत्र से लग जाएगा। केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एन सी सक्सेना ने 5 फरवरी 1998 को बिहार सरकार के मुख्य सचिव बी पी वर्मा को एक नोट लिखा। सक्सेना ने यह सलाह दी कि वे इस नोट को अफसरों के बीच बंटवा सकते हैं।

सक्सेना ने अन्य बातों के अलावा बिहार की ब्यूरोक्रेसी के बारे में लिखा कि ‘अफसरों में कोई कार्य संस्कृति नहीं है। जन कल्याण की कोई चिंता नहीं है। राष्ट्र के निर्माण की कोई भावना नहीं है। राष्ट्रीय लक्ष्य और आधुनिक भारत के मूल्य की कोई धारणा मन में नहीं है। वे लोभी और धन लोलुप बन गये हैं। उनमें प्रतिबद्धता, क्षमता और ईमानदारी का नितांत अभाव हो गया है। अफसरशाही शोषकों का औजार बन चुकी है।

उन्होंने यह भी लिखा कि ‘ बिहार की स्थिति मध्य युग की याद दिला रही है- अराजक, क्रूर, दिशाहीन, गरीबों की जरूरत के प्रति निर्दयी। बिहार के बड़े अफसर और उगाही करने वाले नेताओं, इंस्पेक्टरों और बाबुओं में फर्क करना अब असंभव हो गया है। जन समस्याओं के प्रति बेदर्दी का एक उदाहरण देते हुए सक्सेना ने लिखा कि बिहार सरकार को इस साल हमने पेय जल के मद में एक पैसा नहीं दिया क्योंकि राज्य सरकार पिछले एक साल से यह तय नहीं कर सकी कि पाइप खरीदने का तरीका क्या होगा।

याद रहे कि एक तरफ सक्सेना जैसे अफसर पेय जल योजना के बारे यह बात कह रहे थे, दूसरी ओर राज्य के सत्ताधारी नेता सार्वजनिक रूप से केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर यह आरोप लगा रहे थे कि केंद्र सरकार हमारी आर्थिक मदद नहीं कर रही है।

लंबे समय से इसी गति से चल रही बिहार सरकार का मुख्य सचिव बनने के लिए पी एस अप्पू पहले तैयार नहीं हो रहे थे। सत्तर के दशक में जबर्दस्ती तत्कालीन मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने यह कह कर उन्हें मुख्य सचिव बनाया कि आपके काम में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। पर जब कर्पूरी ठाकुर अपना वायदा पूरा नहीं कर सके तो पी एस अप्पू ने पद छोड़ दिया। साथ ही अप्पू ने मुख्य सचिव के रूप में अपना कटु अनुभव बाद में इन शब्दों में लिखा, ‘वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी महत्वपूर्ण पदों को हथियाने में अपना खाली समय जाया करते हैं। अधिकतर महत्वपूर्ण पद पैरवी के मार्फत भरे जाते हैं। सामान्यतः कैबिनेट, तबादलों व पदस्थापन से जुड़े मेरे फैसलों पर विश्वास नहीं करता। यहां तक कि मुख्यमंत्री भी स्वतंत्र फैसला नहीं ले सकते। कुछ मंत्री अपनी जाति के लोगों और उसमें भी अपने खास प्रिय पात्र अफसरों को ही अपने विभाग में रखना चाहते हैं। कभी-कभी प्रतिभाशाली अधिकारी छांट दिये जाते हैं। इनकी जगह मंत्री भ्रष्ट, और निकम्मे अधिकारियों की मांग करते हैं।’

याद रहे कि यह उस समय की बात है जब कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री थे जो कहा करते थे कि हमारे मंत्रिमंडल का एक-एक सदस्य खुद को मुझसे अधिक ताकतवर समझता है। ऐसे बिगड़े बिहार प्रशासन में राइट टू सर्विस कानून बनाना और उसे लागू करना कितना मुश्किल मगर जरूरी काम है, इसका अनुमान कठिन नहीं है। ईश्वर व जनता नीतीश कुमार को शक्ति दे!

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