उमा भारती यानी भारतीय राजनीति का वह चेहरा जो स्वयं अपनी बर्बादी की दास्तां समय-समय पर लिखती रहती हैं। उन्हें आज तक किसी से डर नहीं लगा लेकिन उनसे सभी डरते हैं। कारण है उनका जिददीपन। उमा भारती यानी दीदी ने अपनी ही बनायी पार्टी भारतीय जनशक्ति से इस्तीफा दे दिया है. 24 मार्च को पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संघप्रिय गौतम को लिखे पत्र में उमा भारती ने लिखा है कि वे स्वास्थ्य कारणों से पार्टी की जिम्मेदारियों को नहीं निभा पा रही हैं इसलिए वे पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे रही हैं.
अपने इस्तीफे में उमा भारती ने लिखा है कि अपने स्वास्थ्य की स्थितियों, पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों एवं आत्मचिंतन, आत्मनिरीक्षण की जरूरतों के हिसाब से संतुलन बिठाने में बेहद तनाव और बोझ का अनुभव कर रही हूं और पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों के साथ न्याय भी नहीं कर पा रही हूं. इसलिए मैं अपने को भारतीय जनशक्ति के अध्यक्ष पद एवं उससे जुड़ी जिम्मेदारियों से मुक्त कर रही हूं ताकि संपूर्ण स्थितियों के बारे में ठीक से आत्मनिरीक्षण, आत्मचिंतन कर सकूं एवं स्वास्थ्य लाभ कर सकूं.
उमाश्री भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया है। उन्होंने भाजश छोडी है, अथवा नहीं यह बात अभी साफ नहीं हो सकी है। गौरतलब होगा कि 2005 में भाजपा से बाहर धकिया दिए जाने के बाद अपने ही साथियों की हरकतों से क्षुब्ध होकर उमाश्री भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन किया था। उमाश्री ने उस वक्त भाजपा के शीर्ष नेता एल.के.आडवाणी को आडे हाथों लिया था। कोसने में माहिर उमाश्री ने भाजपा का चेहरा समझे जाने वाले अटल बिहारी बाजपेयी को भी नही ंबख्शा था। उमाश्री के इस कदम से भाजपा में खलबली मच गई थी। चूंकि उस वक्त तक उमाश्री भारती को जनाधार वाला नेता (मास लीडर) माना जाता था, अत: भाजपाईयों के मन में खौफ होना स्वाभाविक ही था।
उमाश्री को करीब से जानने वाले भाजपा नेताओं ने इस बात की परवाह कतई नहीं की। उमाश्री ने 2003 में मध्य प्रदेश विधान सभा के चुनावी महासमर का आगाज मध्य प्रदेश के छिन्दवाडा जिले में अवस्थित हनुमान जी के सिद्ध स्थल जाम सांवरी से किया था। जामसांवरी उमाश्री के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हुआ था, सो 2005 में भी उमाश्री ने हनुमान जी के दर्शन कर अपना काम आरम्भ किया। उमाश्री का कारवां आगे बढा और भाजपाईयों के मन का डर भी। शनै: शनै: उमाश्री ने अपनी ही कारगुजारियों से भाजश का उभरता ग्राफ और भाजपाईयों के डर को गर्त में ले जाना आरम्भ कर दिया।
कभी चुनाव मैदान में प्रत्याशी उतारने के बाद कदम वापस खीच लेना तो कभी कोई नया शिगूफा। इससे उमाश्री के साथ चलने वालों का विश्वास डिगना आरम्भ हो गया। पिछले विधानसभा चुनावों में भाजश कार्यकर्ताओं ने उमाश्री को चुनाव मैदान में कूदने का दबाव बनाया। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसा इसलिए किया गया था ताकि भाजश कम से कम चुनाव तक तो मैदान में डटी रहे। कार्यकर्ताओं को भय था कि कहीं उमाश्री फिर भाजपा के किसी लालीपाप के सामने अपने प्रत्याशियों को वापस लेने की घोषणा न कर दे। 2008 का मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव उमाश्री भारती के लिए आत्मघाती कदम ही साबित हुआ। इस चुनाव में उमाश्री भारती अपनी कर्मभूमि टीकमगढ से ही औंधे मुंह गिर गईं। कभी भाजपा की सूत्रधार रहीं फायर ब्राण्ड नेत्री उमाश्री भारती ने इसके बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में फिर एक बार भाजपा द्वारा उनके प्रति नरम रूख मात्र किए जाने से उन्होंने लोकसभा में अपने प्रत्याशियों को नहीं उतारा।
भारती का राजनैतिक इतिहास देखने पर साफ हो जाता है कि उनके कदम और ताल में कहीं से कहीं तक सामंजस्य नहीं मिल पाता है। वे कहतीं कुछ और हैं, और वास्तविकता में होता कुछ और नजऱ आता है। गुस्सा उमाश्री के नाक पर ही बैठा रहता है। बाद में भले ही वे अपने इस गुस्से के कारण बनी स्थितियों पर पछतावा करतीं और विलाप करतीं होंगी, किन्तु पुरानी कहावत अब पछताए का होत है, जब चिडिया चुग गई खेत से उन्हें अवश्य ही सबक लेना चाहिए।
मध्य प्रदेश में उनके ही दमखम पर राजा दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली दस साला सरकार को हाशिए में समेट पाई थी भाजपा। उमाश्री भारती मुख्य मन्त्री बनीं फिर झण्डा प्रकरण के चलते 2004 के अन्त में उन्हें कुर्सी छोडनी पडी। इसके बाद एक बार फिर नाटकीय घटनाक्रम के उपरान्त वे पैदल यात्रा पर निकल पडीं। मीडिया में वे छाई रहीं किन्तु जनमानस में उनकी छवि इससे बहुत अच्छी बन पाई हो इस बात को सभी स्वीकार कर सकते हैं।
अबकी बार उमाश्री भारती ने अपने द्वारा ही बुनी गई पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया है। उन्होंने कार्यकारी अध्यक्ष संघप्रिय गौतम को त्यागपत्र सौंपते हुए कहा है कि वे स्वास्थ्य कारणों से अपना दायित्व निभाने में सक्षम नहीं हैं, सो वे अपने आप को समस्त दायित्वों से मुक्त कर रहीं हैं, इतना ही नहीं उन्होंने बाबूराम निषाद को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाने की पेशकश भी कर डाली है। उमाश्री की इस पेशकश से पार्टी में विघटन की स्थिति बनने से इंकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे चाहतीं तो संघप्रिय गौतम पर ही भरोसा जताकर उन्हें अध्यक्ष बनाने की पेशकश कर देतीं।
उधर भाजपा ने अभी भी उमाश्री भारती के मामले में मौन साध रखा है। यद्यपि भाजपा प्रवक्ता तरूण विजय का कहना है कि उन्हें पूरे मामले की जानकारी नहीं है, फिर भी भाजपा अपने उस स्टेण्ड पर कायम है, जिसमें भाजपा के नए निजाम ने उमाश्री भारती और कल्याण सिंह जैसे लोगों की घर वापसी की संभावनाओं को खारिज नहीं किया था। कल तक थिंक टेंक समझे जाने वाले गोविन्दाचार्य से पूछ पूछ कर एक एक कदम चलने वाली उमाश्री के इस कदम के मामले में गोविन्दाचार्य का मौन भी आश्चर्यजनक ही माना जाएगा।
यह बात सही है कि उमा भारती का स्वास्थ्य ठीक नहीं है और वे अपने घुटने की परेशानी से जूझ रही हैं. लेकिन इस्तीफे का कारण स्वास्थ्य कारण तो बिल्कुल नहीं है. भले ही उमा भारती इस्तीफे के लिए स्वास्थ्य कारणों और आत्मनिरीक्षण का हवाला दे रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि उनके भाजपा में जाने की कवायद पूरी हो चुकी है. इसीलिए जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी घोषित की जा रही थी तो उपाध्यक्ष के दो पदों को खाली रखा गया था. उन दिनों उमा भारती संघ के शीर्ष नेताओं और नितिन गडकरी से मेल मुलाकात कर रही थीं. उन्हें कह दिया गया था कि आपका भाजपा में आना तय है. इसीलिए कई मौकों पर उमा भारती भाजपा कार्यक्रमों में उपस्थित रहीं और संकेत दिया कि अब वे भाजपा के साथ हैं. उमा भारती के समर्थक लंबे समय से यह कोशिश कर रहे थे कि उमा भारती भाजपा में वापस आ जाएं क्योंकि उनके समर्थकों का मानना है कि उमा भारती मास लीडर हैं और उनकी एक राष्ट्रीय छवि है. अगर वे भाजपा में वापस लौटती हैं तो उनको भी फायदा होगा और भारतीय जनता पार्टी को भी लाभ पहुंचेगा.
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी उमा भारती के वापसी को हरी झण्डी दे चुके हैं और आडवाणी के खास एस गुरूमूर्ति ही भाजपा और उमा भारती के बीच वार्ताकार की भूमिका निभा रहे थे. अब इस बात की संभावना है कि अगले दो तीन दिनों में उमा भारती के भाजपा में वापसी की विधिवत घोषणा होगी और उन्हें पार्टी के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दे दी जाएगी. उमा भारती की वापसी को लेकर नितिन गडकरी ने भी प्रयास किया है क्योंकि नितिन गडकरी को लग रहा है कि अगर नयी टीम में उन्हें अपनी स्थिति को कमजोर नहीं होने देना है तो उमा भारती ही बेहतर विकल्प हो सकती हैं. इस बात की प्रबल संभावना है कि 27 को संघ की कुरुक्षेत्र में होनेवाली प्रतिनिधि सभा के आस पास उमा भारती के भाजपा में शामिल होने और उन्हें नयी जिम्मेदारी देने की घोषणा कर दी जाए.
उमा भारती की वापसी भाजपा की इंदौर कार्यकारिणी के वक्त ही प्रस्तावित थी लेकिन ऐन वक्त पर फैसला वापस ले लिया गया. और भाजपा की नयी कार्यकारिणी घोषित करने के बाद वापसी की घोषणा करने का फैसला किया गया.
सोमवार, 29 मार्च 2010
शुक्रवार, 26 मार्च 2010
अब क्या करेंगी दीदी ?
अब क्या करेंगी दीदी ?
उमा भारती यानी भारतीय राजनीति का वह चेहरा जो स्वयं अपनी बर्बादी की दास्तां समय-समय पर लिखती रहती हैं। उन्हें आज तक किसी से डर नहीं लगा लेकिन उनसे सभी डरते हैं। कारण है उनका जिददीपन। उमा भारती यानी दीदी ने अपनी ही बनायी पार्टी भारतीय जनशक्ति से इस्तीफा दे दिया है. 24 मार्च को पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संघप्रिय गौतम को लिखे पत्र में उमा भारती ने लिखा है कि वे स्वास्थ्य कारणों से पार्टी की जिम्मेदारियों को नहीं निभा पा रही हैं इसलिए वे पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे रही हैं.
अपने इस्तीफे में उमा भारती ने लिखा है कि अपने स्वास्थ्य की स्थितियों, पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों एवं आत्मचिंतन, आत्मनिरीक्षण की जरूरतों के हिसाब से संतुलन बिठाने में बेहद तनाव और बोझ का अनुभव कर रही हूं और पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों के साथ न्याय भी नहीं कर पा रही हूं. इसलिए मैं अपने को भारतीय जनशक्ति के अध्यक्ष पद एवं उससे जुड़ी जिम्मेदारियों से मुक्त कर रही हूं ताकि संपूर्ण स्थितियों के बारे में ठीक से आत्मनिरीक्षण, आत्मचिंतन कर सकूं एवं स्वास्थ्य लाभ कर सकूं.
उमाश्री भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया है। उन्होंने भाजश छोडी है, अथवा नहीं यह बात अभी साफ नहीं हो सकी है। गौरतलब होगा कि 2005 में भाजपा से बाहर धकिया दिए जाने के बाद अपने ही साथियों की हरकतों से क्षुब्ध होकर उमाश्री भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन किया था। उमाश्री ने उस वक्त भाजपा के शीर्ष नेता एल.के.आडवाणी को आडे हाथों लिया था। कोसने में माहिर उमाश्री ने भाजपा का चेहरा समझे जाने वाले अटल बिहारी बाजपेयी को भी नही ंबख्शा था। उमाश्री के इस कदम से भाजपा में खलबली मच गई थी। चूंकि उस वक्त तक उमाश्री भारती को जनाधार वाला नेता (मास लीडर) माना जाता था, अत: भाजपाईयों के मन में खौफ होना स्वाभाविक ही था।
उमाश्री को करीब से जानने वाले भाजपा नेताओं ने इस बात की परवाह कतई नहीं की। उमाश्री ने 2003 में मध्य प्रदेश विधान सभा के चुनावी महासमर का आगाज मध्य प्रदेश के छिन्दवाडा जिले में अवस्थित हनुमान जी के सिद्ध स्थल जाम सांवरी से किया था। जामसांवरी उमाश्री के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हुआ था, सो 2005 में भी उमाश्री ने हनुमान जी के दर्शन कर अपना काम आरम्भ किया। उमाश्री का कारवां आगे बढा और भाजपाईयों के मन का डर भी। शनै: शनै: उमाश्री ने अपनी ही कारगुजारियों से भाजश का उभरता ग्राफ और भाजपाईयों के डर को गर्त में ले जाना आरम्भ कर दिया।
कभी चुनाव मैदान में प्रत्याशी उतारने के बाद कदम वापस खीच लेना तो कभी कोई नया शिगूफा। इससे उमाश्री के साथ चलने वालों का विश्वास डिगना आरम्भ हो गया। पिछले विधानसभा चुनावों में भाजश कार्यकर्ताओं ने उमाश्री को चुनाव मैदान में कूदने का दबाव बनाया। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसा इसलिए किया गया था ताकि भाजश कम से कम चुनाव तक तो मैदान में डटी रहे। कार्यकर्ताओं को भय था कि कहीं उमाश्री फिर भाजपा के किसी लालीपाप के सामने अपने प्रत्याशियों को वापस लेने की घोषणा न कर दे। 2008 का मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव उमाश्री भारती के लिए आत्मघाती कदम ही साबित हुआ। इस चुनाव में उमाश्री भारती अपनी कर्मभूमि टीकमगढ से ही औंधे मुंह गिर गईं। कभी भाजपा की सूत्रधार रहीं फायर ब्राण्ड नेत्री उमाश्री भारती ने इसके बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में फिर एक बार भाजपा द्वारा उनके प्रति नरम रूख मात्र किए जाने से उन्होंने लोकसभा में अपने प्रत्याशियों को नहीं उतारा।
भारती का राजनैतिक इतिहास देखने पर साफ हो जाता है कि उनके कदम और ताल में कहीं से कहीं तक सामंजस्य नहीं मिल पाता है। वे कहतीं कुछ और हैं, और वास्तविकता में होता कुछ और नजऱ आता है। गुस्सा उमाश्री के नाक पर ही बैठा रहता है। बाद में भले ही वे अपने इस गुस्से के कारण बनी स्थितियों पर पछतावा करतीं और विलाप करतीं होंगी, किन्तु पुरानी कहावत अब पछताए का होत है, जब चिडिया चुग गई खेत से उन्हें अवश्य ही सबक लेना चाहिए।
मध्य प्रदेश में उनके ही दमखम पर राजा दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली दस साला सरकार को हाशिए में समेट पाई थी भाजपा। उमाश्री भारती मुख्य मन्त्री बनीं फिर झण्डा प्रकरण के चलते 2004 के अन्त में उन्हें कुर्सी छोडनी पडी। इसके बाद एक बार फिर नाटकीय घटनाक्रम के उपरान्त वे पैदल यात्रा पर निकल पडीं। मीडिया में वे छाई रहीं किन्तु जनमानस में उनकी छवि इससे बहुत अच्छी बन पाई हो इस बात को सभी स्वीकार कर सकते हैं।
अबकी बार उमाश्री भारती ने अपने द्वारा ही बुनी गई पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया है। उन्होंने कार्यकारी अध्यक्ष संघप्रिय गौतम को त्यागपत्र सौंपते हुए कहा है कि वे स्वास्थ्य कारणों से अपना दायित्व निभाने में सक्षम नहीं हैं, सो वे अपने आप को समस्त दायित्वों से मुक्त कर रहीं हैं, इतना ही नहीं उन्होंने बाबूराम निषाद को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाने की पेशकश भी कर डाली है। उमाश्री की इस पेशकश से पार्टी में विघटन की स्थिति बनने से इंकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे चाहतीं तो संघप्रिय गौतम पर ही भरोसा जताकर उन्हें अध्यक्ष बनाने की पेशकश कर देतीं।
उधर भाजपा ने अभी भी उमाश्री भारती के मामले में मौन साध रखा है। यद्यपि भाजपा प्रवक्ता तरूण विजय का कहना है कि उन्हें पूरे मामले की जानकारी नहीं है, फिर भी भाजपा अपने उस स्टेण्ड पर कायम है, जिसमें भाजपा के नए निजाम ने उमाश्री भारती और कल्याण सिंह जैसे लोगों की घर वापसी की संभावनाओं को खारिज नहीं किया था। कल तक थिंक टेंक समझे जाने वाले गोविन्दाचार्य से पूछ पूछ कर एक एक कदम चलने वाली उमाश्री के इस कदम के मामले में गोविन्दाचार्य का मौन भी आश्चर्यजनक ही माना जाएगा।
यह बात सही है कि उमा भारती का स्वास्थ्य ठीक नहीं है और वे अपने घुटने की परेशानी से जूझ रही हैं. लेकिन इस्तीफे का कारण स्वास्थ्य कारण तो बिल्कुल नहीं है. भले ही उमा भारती इस्तीफे के लिए स्वास्थ्य कारणों और आत्मनिरीक्षण का हवाला दे रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि उनके भाजपा में जाने की कवायद पूरी हो चुकी है. इसीलिए जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी घोषित की जा रही थी तो उपाध्यक्ष के दो पदों को खाली रखा गया था. उन दिनों उमा भारती संघ के शीर्ष नेताओं और नितिन गडकरी से मेल मुलाकात कर रही थीं. उन्हें कह दिया गया था कि आपका भाजपा में आना तय है. इसीलिए कई मौकों पर उमा भारती भाजपा कार्यक्रमों में उपस्थित रहीं और संकेत दिया कि अब वे भाजपा के साथ हैं. उमा भारती के समर्थक लंबे समय से यह कोशिश कर रहे थे कि उमा भारती भाजपा में वापस आ जाएं क्योंकि उनके समर्थकों का मानना है कि उमा भारती मास लीडर हैं और उनकी एक राष्ट्रीय छवि है. अगर वे भाजपा में वापस लौटती हैं तो उनको भी फायदा होगा और भारतीय जनता पार्टी को भी लाभ पहुंचेगा.
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी उमा भारती के वापसी को हरी झण्डी दे चुके हैं और आडवाणी के खास एस गुरूमूर्ति ही भाजपा और उमा भारती के बीच वार्ताकार की भूमिका निभा रहे थे. अब इस बात की संभावना है कि अगले दो तीन दिनों में उमा भारती के भाजपा में वापसी की विधिवत घोषणा होगी और उन्हें पार्टी के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दे दी जाएगी. उमा भारती की वापसी को लेकर नितिन गडकरी ने भी प्रयास किया है क्योंकि नितिन गडकरी को लग रहा है कि अगर नयी टीम में उन्हें अपनी स्थिति को कमजोर नहीं होने देना है तो उमा भारती ही बेहतर विकल्प हो सकती हैं. इस बात की प्रबल संभावना है कि 27 को संघ की कुरुक्षेत्र में होनेवाली प्रतिनिधि सभा के आस पास उमा भारती के भाजपा में शामिल होने और उन्हें नयी जिम्मेदारी देने की घोषणा कर दी जाए.
उमा भारती की वापसी भाजपा की इंदौर कार्यकारिणी के वक्त ही प्रस्तावित थी लेकिन ऐन वक्त पर फैसला वापस ले लिया गया. और भाजपा की नयी कार्यकारिणी घोषित करने के बाद वापसी की घोषणा करने का फैसला किया गया.
उमा भारती यानी भारतीय राजनीति का वह चेहरा जो स्वयं अपनी बर्बादी की दास्तां समय-समय पर लिखती रहती हैं। उन्हें आज तक किसी से डर नहीं लगा लेकिन उनसे सभी डरते हैं। कारण है उनका जिददीपन। उमा भारती यानी दीदी ने अपनी ही बनायी पार्टी भारतीय जनशक्ति से इस्तीफा दे दिया है. 24 मार्च को पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संघप्रिय गौतम को लिखे पत्र में उमा भारती ने लिखा है कि वे स्वास्थ्य कारणों से पार्टी की जिम्मेदारियों को नहीं निभा पा रही हैं इसलिए वे पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे रही हैं.
अपने इस्तीफे में उमा भारती ने लिखा है कि अपने स्वास्थ्य की स्थितियों, पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों एवं आत्मचिंतन, आत्मनिरीक्षण की जरूरतों के हिसाब से संतुलन बिठाने में बेहद तनाव और बोझ का अनुभव कर रही हूं और पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों के साथ न्याय भी नहीं कर पा रही हूं. इसलिए मैं अपने को भारतीय जनशक्ति के अध्यक्ष पद एवं उससे जुड़ी जिम्मेदारियों से मुक्त कर रही हूं ताकि संपूर्ण स्थितियों के बारे में ठीक से आत्मनिरीक्षण, आत्मचिंतन कर सकूं एवं स्वास्थ्य लाभ कर सकूं.
उमाश्री भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया है। उन्होंने भाजश छोडी है, अथवा नहीं यह बात अभी साफ नहीं हो सकी है। गौरतलब होगा कि 2005 में भाजपा से बाहर धकिया दिए जाने के बाद अपने ही साथियों की हरकतों से क्षुब्ध होकर उमाश्री भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन किया था। उमाश्री ने उस वक्त भाजपा के शीर्ष नेता एल.के.आडवाणी को आडे हाथों लिया था। कोसने में माहिर उमाश्री ने भाजपा का चेहरा समझे जाने वाले अटल बिहारी बाजपेयी को भी नही ंबख्शा था। उमाश्री के इस कदम से भाजपा में खलबली मच गई थी। चूंकि उस वक्त तक उमाश्री भारती को जनाधार वाला नेता (मास लीडर) माना जाता था, अत: भाजपाईयों के मन में खौफ होना स्वाभाविक ही था।
उमाश्री को करीब से जानने वाले भाजपा नेताओं ने इस बात की परवाह कतई नहीं की। उमाश्री ने 2003 में मध्य प्रदेश विधान सभा के चुनावी महासमर का आगाज मध्य प्रदेश के छिन्दवाडा जिले में अवस्थित हनुमान जी के सिद्ध स्थल जाम सांवरी से किया था। जामसांवरी उमाश्री के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हुआ था, सो 2005 में भी उमाश्री ने हनुमान जी के दर्शन कर अपना काम आरम्भ किया। उमाश्री का कारवां आगे बढा और भाजपाईयों के मन का डर भी। शनै: शनै: उमाश्री ने अपनी ही कारगुजारियों से भाजश का उभरता ग्राफ और भाजपाईयों के डर को गर्त में ले जाना आरम्भ कर दिया।
कभी चुनाव मैदान में प्रत्याशी उतारने के बाद कदम वापस खीच लेना तो कभी कोई नया शिगूफा। इससे उमाश्री के साथ चलने वालों का विश्वास डिगना आरम्भ हो गया। पिछले विधानसभा चुनावों में भाजश कार्यकर्ताओं ने उमाश्री को चुनाव मैदान में कूदने का दबाव बनाया। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसा इसलिए किया गया था ताकि भाजश कम से कम चुनाव तक तो मैदान में डटी रहे। कार्यकर्ताओं को भय था कि कहीं उमाश्री फिर भाजपा के किसी लालीपाप के सामने अपने प्रत्याशियों को वापस लेने की घोषणा न कर दे। 2008 का मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव उमाश्री भारती के लिए आत्मघाती कदम ही साबित हुआ। इस चुनाव में उमाश्री भारती अपनी कर्मभूमि टीकमगढ से ही औंधे मुंह गिर गईं। कभी भाजपा की सूत्रधार रहीं फायर ब्राण्ड नेत्री उमाश्री भारती ने इसके बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में फिर एक बार भाजपा द्वारा उनके प्रति नरम रूख मात्र किए जाने से उन्होंने लोकसभा में अपने प्रत्याशियों को नहीं उतारा।
भारती का राजनैतिक इतिहास देखने पर साफ हो जाता है कि उनके कदम और ताल में कहीं से कहीं तक सामंजस्य नहीं मिल पाता है। वे कहतीं कुछ और हैं, और वास्तविकता में होता कुछ और नजऱ आता है। गुस्सा उमाश्री के नाक पर ही बैठा रहता है। बाद में भले ही वे अपने इस गुस्से के कारण बनी स्थितियों पर पछतावा करतीं और विलाप करतीं होंगी, किन्तु पुरानी कहावत अब पछताए का होत है, जब चिडिया चुग गई खेत से उन्हें अवश्य ही सबक लेना चाहिए।
मध्य प्रदेश में उनके ही दमखम पर राजा दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली दस साला सरकार को हाशिए में समेट पाई थी भाजपा। उमाश्री भारती मुख्य मन्त्री बनीं फिर झण्डा प्रकरण के चलते 2004 के अन्त में उन्हें कुर्सी छोडनी पडी। इसके बाद एक बार फिर नाटकीय घटनाक्रम के उपरान्त वे पैदल यात्रा पर निकल पडीं। मीडिया में वे छाई रहीं किन्तु जनमानस में उनकी छवि इससे बहुत अच्छी बन पाई हो इस बात को सभी स्वीकार कर सकते हैं।
अबकी बार उमाश्री भारती ने अपने द्वारा ही बुनी गई पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया है। उन्होंने कार्यकारी अध्यक्ष संघप्रिय गौतम को त्यागपत्र सौंपते हुए कहा है कि वे स्वास्थ्य कारणों से अपना दायित्व निभाने में सक्षम नहीं हैं, सो वे अपने आप को समस्त दायित्वों से मुक्त कर रहीं हैं, इतना ही नहीं उन्होंने बाबूराम निषाद को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाने की पेशकश भी कर डाली है। उमाश्री की इस पेशकश से पार्टी में विघटन की स्थिति बनने से इंकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे चाहतीं तो संघप्रिय गौतम पर ही भरोसा जताकर उन्हें अध्यक्ष बनाने की पेशकश कर देतीं।
उधर भाजपा ने अभी भी उमाश्री भारती के मामले में मौन साध रखा है। यद्यपि भाजपा प्रवक्ता तरूण विजय का कहना है कि उन्हें पूरे मामले की जानकारी नहीं है, फिर भी भाजपा अपने उस स्टेण्ड पर कायम है, जिसमें भाजपा के नए निजाम ने उमाश्री भारती और कल्याण सिंह जैसे लोगों की घर वापसी की संभावनाओं को खारिज नहीं किया था। कल तक थिंक टेंक समझे जाने वाले गोविन्दाचार्य से पूछ पूछ कर एक एक कदम चलने वाली उमाश्री के इस कदम के मामले में गोविन्दाचार्य का मौन भी आश्चर्यजनक ही माना जाएगा।
यह बात सही है कि उमा भारती का स्वास्थ्य ठीक नहीं है और वे अपने घुटने की परेशानी से जूझ रही हैं. लेकिन इस्तीफे का कारण स्वास्थ्य कारण तो बिल्कुल नहीं है. भले ही उमा भारती इस्तीफे के लिए स्वास्थ्य कारणों और आत्मनिरीक्षण का हवाला दे रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि उनके भाजपा में जाने की कवायद पूरी हो चुकी है. इसीलिए जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी घोषित की जा रही थी तो उपाध्यक्ष के दो पदों को खाली रखा गया था. उन दिनों उमा भारती संघ के शीर्ष नेताओं और नितिन गडकरी से मेल मुलाकात कर रही थीं. उन्हें कह दिया गया था कि आपका भाजपा में आना तय है. इसीलिए कई मौकों पर उमा भारती भाजपा कार्यक्रमों में उपस्थित रहीं और संकेत दिया कि अब वे भाजपा के साथ हैं. उमा भारती के समर्थक लंबे समय से यह कोशिश कर रहे थे कि उमा भारती भाजपा में वापस आ जाएं क्योंकि उनके समर्थकों का मानना है कि उमा भारती मास लीडर हैं और उनकी एक राष्ट्रीय छवि है. अगर वे भाजपा में वापस लौटती हैं तो उनको भी फायदा होगा और भारतीय जनता पार्टी को भी लाभ पहुंचेगा.
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी उमा भारती के वापसी को हरी झण्डी दे चुके हैं और आडवाणी के खास एस गुरूमूर्ति ही भाजपा और उमा भारती के बीच वार्ताकार की भूमिका निभा रहे थे. अब इस बात की संभावना है कि अगले दो तीन दिनों में उमा भारती के भाजपा में वापसी की विधिवत घोषणा होगी और उन्हें पार्टी के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दे दी जाएगी. उमा भारती की वापसी को लेकर नितिन गडकरी ने भी प्रयास किया है क्योंकि नितिन गडकरी को लग रहा है कि अगर नयी टीम में उन्हें अपनी स्थिति को कमजोर नहीं होने देना है तो उमा भारती ही बेहतर विकल्प हो सकती हैं. इस बात की प्रबल संभावना है कि 27 को संघ की कुरुक्षेत्र में होनेवाली प्रतिनिधि सभा के आस पास उमा भारती के भाजपा में शामिल होने और उन्हें नयी जिम्मेदारी देने की घोषणा कर दी जाए.
उमा भारती की वापसी भाजपा की इंदौर कार्यकारिणी के वक्त ही प्रस्तावित थी लेकिन ऐन वक्त पर फैसला वापस ले लिया गया. और भाजपा की नयी कार्यकारिणी घोषित करने के बाद वापसी की घोषणा करने का फैसला किया गया.
बुधवार, 24 मार्च 2010
बिहार में बिछने लगी चुनावी चौसर
कहते हैं राजनीति और प्रशासन में हर समय और हर किसी को खुश नहीं रखा जा सकता। कुछ ऐसा ही नजारा है बिहार में। राज्य में विधान सभा चुनाव होने को एक वर्ष से भी कम समय रह गया है और कई ऐसे सवाल हैं जो सत्ताधारी पार्टियों को फिर से सत्ता में काबिज होने पर प्रश्नचिह्न् लगाते हैं।
इसमें भी शक नहीं कि वर्तमान सरकार ने आशातीत कार्य किए हैं। लेकिन जब हम सरकारी आँकड़ों से उसकी तुलना करते हैं, तो आम जनता जहाँ आज भी करीब 40 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं, को समझना सरकार के लिए कठिन होगा। इसके अलावा जदयू और भाजपा के आंतरिक कलह भी अब जगजाहिर हैं।
विकास की बात करें तो वर्तमान सरकार के पास आँकड़ों की कमी नहीं है, पर यह भी सच है कि यह कई बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में अक्षम रही है। भूख से होने वाली मौतें, नरेगा में भ्रष्टाचार और कई ऐसी अनियमितताएं सरकार को कटघरे में ला खड़ी करती हैं।
वहीं शहरी क्षेत्रों में हुए भौतिक विकास यानी सड़क, पानी, बिजली आदि में सुधार सरकार की उपलब्धि कही जा सकती है। लेकिन आज भी 70 प्रतिशत जनता गांवों में ही रहती है और वोट डालने का प्रतिशत भी उन्हीं का ज्यादा होता है। शायद यही कारण है कि वर्तमान सरकार ने रामविलास पासवान की दलित राजनीति में सेंध लगाते हुए महादलित की श्रेणी में पासवान जाति को छोड़ कर लगभग सभी दलित जातियों को शामिल कर लिया है।
महादलित का यही फार्मूला कितना कारगर होता है, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान सरकार ने बिहार की राजनीतिक जातीय समीकरण को बिगाड़ दिया है। आम सभाओं में विकास के नाम पर मुख्यमंत्री अक्सर वोट रूपी मेहताना मांगते नजर आते हैं, फिर भी जातीय वोट बैंक की कितनी आवश्यकता है।
पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान टिकट नहीं मिलने के कारण नागमणि सिंह जदयू से बाहर हो गए थे। उनके जाने के बाद कोइरी जाति के किसी सक्षम प्रतिनिधि की आवश्यकता थी, जो उपेन्द्र कुशवाहा के पार्टी में शामिल करने से पूरी हो गई। ध्यान देने लायक है कि उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कई पार्टियों का भ्रमण करते हुए अंतत: जदयू में आना ही उचित समझा। पिछले साल उन्होंने एक पार्टी की स्थापना भी की थी, जो उनके राजनीतिक प्रहसन का अंतिम दृष्य था।
जहां तक भाजपा और जदयू के ताल-मेल का सवाल है, तो अक्सर भाजपा के नेताओं का आरोप रहता है कि इस सरकार की सारी उपलब्धियां मुख्यमंत्री अपने और अपनी पार्टी के नाम कर देते हैं और जहां भी आरोपों का सामना करना होता है, वहां भजपा को आगे कर दिया जाता है। इस कारण भाजपा की राजनीति में स्थिरता भी नजर आने लगी है। हलांकि, इसके कई आंतरिक कारण है, जिसमें नेताओं का अनेक गुटों में बंटना सर्वप्रमुख है। यही कारण है कि समय-समय पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को हटाने की भी मांग उठती रही है।
पिछले लोक सभा चुनावों के नतीजे से नीतीश कुमार जिस अतिविश्वास और अतिमहत्वाकांक्षा से लबरेज थे, हालिया 17 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में सिर्फ 3 सीटों पर उनकी पार्टी और 2 सीटों पर भाजपा की जीत ने पानी फेर दिया। इससे यह भी साबित हो गया कि आज भी ग्रामीण इलाकों में रामविलास पासवान और लालू यादव की पकड़ ढ़ीली नहीं पड़ी है। न्याय के साथ विकास की बात करने वाले मुख्यमंत्री को यह तो सोचना ही होगा कि उनके द्बारा किए जा रहे न्याय और विकास की पहुंच कितनी व्यापक है। क्या वे अपने कार्यों को उन लोगों तक पहुंचाने में सक्षम रहे हैं, जो सही मायने में वोटदाता हैं?
बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय राजनीति अपने चरम पर है। पिछले कई वर्षों से यहां कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां हाशिए पर नजर आ रही हैं। हलांकि इस बार अकेले चुनाव लडऩे के कांग्रेस के फैसले ने पार्टी के लिए उत्प्रेरक का काम तो किया है, लेकिन अभी भी उसे राज्य में एक ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो कांग्रेस को फिर से जीवंत कर सके।
जहां तक भाजपा की प्रांतीय राजनीति का सवाल है, तो इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि जदयू ने स्थानीय स्तर पर अपने कद से उसे प्रभावित किया है। पिछले वर्षों के इतिहास को देखते हुए रामविलास पासवान की राजनीति की टोह लेना थोड़ी मुश्किल है। अब तो चुनाव विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं अंतिम समय में पासवान किस करवट होंगे, यह कहना कठिन है।
बहरहाल, पिछले चार वर्षों र्में बिहार के विकास की बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है। फिलवक्त, क्षेत्र विशेष में ही सही नीतीश कुमार की सरकार ने समेकित और समावेशी विकास कि उम्मीद तो जगा ही दी है, जिसके आधार पर जनता उन्हें, एक और मौका दे सकती है।
बिहार में भाजपा जद (यू) के साथ मिलकर सत्ता में है। लेकिन सत्ता में रहते हुए संगठन के स्तर पर पार्टी बेहद कमजोर हो चुकी है। नवनिर्वाचित भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए बिहार में भाजपा को दोबारा सत्ता में लाना जितनी बड़ी चुनौती होगा उससे बड़ी चुनौती साबित हो रही है वहां नये पार्टी अध्यक्ष का चुनाव।
कयास यह लगाये जा रहे हैं कि आने वाले छह महीनों के बाद कभी भी बिहार में विधानसभा का चुनाव कराया जा सकता है। अगर नितिश कुमार ने राजनीतिक चतुराई और समझदारी दिखाई तो चुनाव इसके पूर्व भी हो सकता है। लेकिन राजनैतिक स्थिति भाजपा के एकदम खिलाफ होता जा रहा है। राजनीतिक उहापोह की स्थिति में बिहार भाजपा उदासीन भाव में है। उसका अपना परंपरागत वोट काफी कम बचा है। कई उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों और मुसलमानों का बड़ी तेजी से ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो रहा है। भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष राधामोहन सिंह सिर्फ अपने क्षेत्र और जिले के नेता बनकर रह गए हैं। पार्टी को ठीक से न चलाने में वहां के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार काफी मदद कर रहे हैं। बची-खुची कसर वहां के उप-मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी ने पूरी कर दी है। मोदी द्वारा पाटी और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के कारण उनका काफी विरोध हो रहा है। मोदी में अब पार्टी और कार्यकर्ताओं के साथ पहले जैसा लगाव भी नहीं रहा। वे पार्टी और कार्यकर्ताओं को अपनी जेब में रखना चाहते हैं। इसी कारण मोदी की खूबियों का लाभ भी पार्टी को नहीं मिल पा रहा है। उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का उदाहरण भाजपा के सामने है जहां गठबंधन सरकारों का लाभ लेकर बीजद, बसपा सपा और जनता दल यू जैसी पार्टियां तो फली-फूली लेकिन भाजपा लोगों और कार्यकर्ताओं से दूर होती गई।
बिहार में भी कमोबेश यही स्थिति है। भाजपा-जदयू गठजोड़ सरकार की मदद से नीतिश कुमार और उनकी पार्टी तो फायदे में है, लेकिन भाजपा घाटे में। भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता, परंपरागत मतदाता और समर्थक अब पार्टी से दूरियां बनाने लगे हैं। पिछड़ी जातियों में जनता दल यू और राजद का दबदबा बढ़ रहा है, वहीं मुस्लिम मतों के लिए राजद, जनता दल यू के साथ ही कांग्रेस भी भारी मशक्कत कर रही है। ब्राह्मण कांग्रेस का परंपरागत समर्थक रहा है, कुछ समय तक वह कांग्रेस से दूर होकर भाजपा के साथ आ गया था, नेतृत्व के आभाव में वह फिर से कांग्रेस की ओर मुखातिब है। राहुल की टीम ने बिहार में उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों और मुसलमानों को लामबंद करने की रणनीति बनाई है। भाजपा उहापोह में है। उसके पास न तो दमदार जातीय पकड़ वाला नेता है और न ही हिन्दुत्व का चेहरा।
भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का पहला फिल्ड टेस्ट बिहार में होना है। बिहार वह प्रदेश है जहां भाजपा अध्यक्ष के रूप में नितिन गडकरी को पहला चुनाव फेस करना होगा। यहां की सरकार में भाजपा भागीदार है। पार्टी के वरिष्ठ और जुझारू नेता सुशील कुमार मोदी बिहार के उप-मुख्यमंत्री हैं। गौरतलब है कि मोदी के खिलाफ लंबे अरसे से विरोध की आवाज उठती रही है, लेकिन मोदी भी भरसक प्रयास करते रहे हैं कि उनका कुनबा, गुट और गिरोह कमजोर न पड़े। बिहार में भाजपा इन्हीं सवालों से जूझ रही है। आपसी खींचतान और गुटबाजी कम नहीं हुई। जनाधार भी लगातार खिसक रहा है। ऐसे में युवा और कुशल नेतृत्व की दरकार प्रदेश भाजपा को है। ऐसा नेतृत्व जो पुराने को साध सके, नए में उत्साह भर सके और आम जनता को अपनी ओर आकर्षित कर सके।
इसमें भी शक नहीं कि वर्तमान सरकार ने आशातीत कार्य किए हैं। लेकिन जब हम सरकारी आँकड़ों से उसकी तुलना करते हैं, तो आम जनता जहाँ आज भी करीब 40 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं, को समझना सरकार के लिए कठिन होगा। इसके अलावा जदयू और भाजपा के आंतरिक कलह भी अब जगजाहिर हैं।
विकास की बात करें तो वर्तमान सरकार के पास आँकड़ों की कमी नहीं है, पर यह भी सच है कि यह कई बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में अक्षम रही है। भूख से होने वाली मौतें, नरेगा में भ्रष्टाचार और कई ऐसी अनियमितताएं सरकार को कटघरे में ला खड़ी करती हैं।
वहीं शहरी क्षेत्रों में हुए भौतिक विकास यानी सड़क, पानी, बिजली आदि में सुधार सरकार की उपलब्धि कही जा सकती है। लेकिन आज भी 70 प्रतिशत जनता गांवों में ही रहती है और वोट डालने का प्रतिशत भी उन्हीं का ज्यादा होता है। शायद यही कारण है कि वर्तमान सरकार ने रामविलास पासवान की दलित राजनीति में सेंध लगाते हुए महादलित की श्रेणी में पासवान जाति को छोड़ कर लगभग सभी दलित जातियों को शामिल कर लिया है।
महादलित का यही फार्मूला कितना कारगर होता है, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान सरकार ने बिहार की राजनीतिक जातीय समीकरण को बिगाड़ दिया है। आम सभाओं में विकास के नाम पर मुख्यमंत्री अक्सर वोट रूपी मेहताना मांगते नजर आते हैं, फिर भी जातीय वोट बैंक की कितनी आवश्यकता है।
पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान टिकट नहीं मिलने के कारण नागमणि सिंह जदयू से बाहर हो गए थे। उनके जाने के बाद कोइरी जाति के किसी सक्षम प्रतिनिधि की आवश्यकता थी, जो उपेन्द्र कुशवाहा के पार्टी में शामिल करने से पूरी हो गई। ध्यान देने लायक है कि उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कई पार्टियों का भ्रमण करते हुए अंतत: जदयू में आना ही उचित समझा। पिछले साल उन्होंने एक पार्टी की स्थापना भी की थी, जो उनके राजनीतिक प्रहसन का अंतिम दृष्य था।
जहां तक भाजपा और जदयू के ताल-मेल का सवाल है, तो अक्सर भाजपा के नेताओं का आरोप रहता है कि इस सरकार की सारी उपलब्धियां मुख्यमंत्री अपने और अपनी पार्टी के नाम कर देते हैं और जहां भी आरोपों का सामना करना होता है, वहां भजपा को आगे कर दिया जाता है। इस कारण भाजपा की राजनीति में स्थिरता भी नजर आने लगी है। हलांकि, इसके कई आंतरिक कारण है, जिसमें नेताओं का अनेक गुटों में बंटना सर्वप्रमुख है। यही कारण है कि समय-समय पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को हटाने की भी मांग उठती रही है।
पिछले लोक सभा चुनावों के नतीजे से नीतीश कुमार जिस अतिविश्वास और अतिमहत्वाकांक्षा से लबरेज थे, हालिया 17 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में सिर्फ 3 सीटों पर उनकी पार्टी और 2 सीटों पर भाजपा की जीत ने पानी फेर दिया। इससे यह भी साबित हो गया कि आज भी ग्रामीण इलाकों में रामविलास पासवान और लालू यादव की पकड़ ढ़ीली नहीं पड़ी है। न्याय के साथ विकास की बात करने वाले मुख्यमंत्री को यह तो सोचना ही होगा कि उनके द्बारा किए जा रहे न्याय और विकास की पहुंच कितनी व्यापक है। क्या वे अपने कार्यों को उन लोगों तक पहुंचाने में सक्षम रहे हैं, जो सही मायने में वोटदाता हैं?
बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय राजनीति अपने चरम पर है। पिछले कई वर्षों से यहां कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां हाशिए पर नजर आ रही हैं। हलांकि इस बार अकेले चुनाव लडऩे के कांग्रेस के फैसले ने पार्टी के लिए उत्प्रेरक का काम तो किया है, लेकिन अभी भी उसे राज्य में एक ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो कांग्रेस को फिर से जीवंत कर सके।
जहां तक भाजपा की प्रांतीय राजनीति का सवाल है, तो इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि जदयू ने स्थानीय स्तर पर अपने कद से उसे प्रभावित किया है। पिछले वर्षों के इतिहास को देखते हुए रामविलास पासवान की राजनीति की टोह लेना थोड़ी मुश्किल है। अब तो चुनाव विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं अंतिम समय में पासवान किस करवट होंगे, यह कहना कठिन है।
बहरहाल, पिछले चार वर्षों र्में बिहार के विकास की बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है। फिलवक्त, क्षेत्र विशेष में ही सही नीतीश कुमार की सरकार ने समेकित और समावेशी विकास कि उम्मीद तो जगा ही दी है, जिसके आधार पर जनता उन्हें, एक और मौका दे सकती है।
बिहार में भाजपा जद (यू) के साथ मिलकर सत्ता में है। लेकिन सत्ता में रहते हुए संगठन के स्तर पर पार्टी बेहद कमजोर हो चुकी है। नवनिर्वाचित भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए बिहार में भाजपा को दोबारा सत्ता में लाना जितनी बड़ी चुनौती होगा उससे बड़ी चुनौती साबित हो रही है वहां नये पार्टी अध्यक्ष का चुनाव।
कयास यह लगाये जा रहे हैं कि आने वाले छह महीनों के बाद कभी भी बिहार में विधानसभा का चुनाव कराया जा सकता है। अगर नितिश कुमार ने राजनीतिक चतुराई और समझदारी दिखाई तो चुनाव इसके पूर्व भी हो सकता है। लेकिन राजनैतिक स्थिति भाजपा के एकदम खिलाफ होता जा रहा है। राजनीतिक उहापोह की स्थिति में बिहार भाजपा उदासीन भाव में है। उसका अपना परंपरागत वोट काफी कम बचा है। कई उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों और मुसलमानों का बड़ी तेजी से ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो रहा है। भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष राधामोहन सिंह सिर्फ अपने क्षेत्र और जिले के नेता बनकर रह गए हैं। पार्टी को ठीक से न चलाने में वहां के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार काफी मदद कर रहे हैं। बची-खुची कसर वहां के उप-मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी ने पूरी कर दी है। मोदी द्वारा पाटी और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के कारण उनका काफी विरोध हो रहा है। मोदी में अब पार्टी और कार्यकर्ताओं के साथ पहले जैसा लगाव भी नहीं रहा। वे पार्टी और कार्यकर्ताओं को अपनी जेब में रखना चाहते हैं। इसी कारण मोदी की खूबियों का लाभ भी पार्टी को नहीं मिल पा रहा है। उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का उदाहरण भाजपा के सामने है जहां गठबंधन सरकारों का लाभ लेकर बीजद, बसपा सपा और जनता दल यू जैसी पार्टियां तो फली-फूली लेकिन भाजपा लोगों और कार्यकर्ताओं से दूर होती गई।
बिहार में भी कमोबेश यही स्थिति है। भाजपा-जदयू गठजोड़ सरकार की मदद से नीतिश कुमार और उनकी पार्टी तो फायदे में है, लेकिन भाजपा घाटे में। भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता, परंपरागत मतदाता और समर्थक अब पार्टी से दूरियां बनाने लगे हैं। पिछड़ी जातियों में जनता दल यू और राजद का दबदबा बढ़ रहा है, वहीं मुस्लिम मतों के लिए राजद, जनता दल यू के साथ ही कांग्रेस भी भारी मशक्कत कर रही है। ब्राह्मण कांग्रेस का परंपरागत समर्थक रहा है, कुछ समय तक वह कांग्रेस से दूर होकर भाजपा के साथ आ गया था, नेतृत्व के आभाव में वह फिर से कांग्रेस की ओर मुखातिब है। राहुल की टीम ने बिहार में उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों और मुसलमानों को लामबंद करने की रणनीति बनाई है। भाजपा उहापोह में है। उसके पास न तो दमदार जातीय पकड़ वाला नेता है और न ही हिन्दुत्व का चेहरा।
भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का पहला फिल्ड टेस्ट बिहार में होना है। बिहार वह प्रदेश है जहां भाजपा अध्यक्ष के रूप में नितिन गडकरी को पहला चुनाव फेस करना होगा। यहां की सरकार में भाजपा भागीदार है। पार्टी के वरिष्ठ और जुझारू नेता सुशील कुमार मोदी बिहार के उप-मुख्यमंत्री हैं। गौरतलब है कि मोदी के खिलाफ लंबे अरसे से विरोध की आवाज उठती रही है, लेकिन मोदी भी भरसक प्रयास करते रहे हैं कि उनका कुनबा, गुट और गिरोह कमजोर न पड़े। बिहार में भाजपा इन्हीं सवालों से जूझ रही है। आपसी खींचतान और गुटबाजी कम नहीं हुई। जनाधार भी लगातार खिसक रहा है। ऐसे में युवा और कुशल नेतृत्व की दरकार प्रदेश भाजपा को है। ऐसा नेतृत्व जो पुराने को साध सके, नए में उत्साह भर सके और आम जनता को अपनी ओर आकर्षित कर सके।
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