कहते हैं राजनीति और प्रशासन में हर समय और हर किसी को खुश नहीं रखा जा सकता। कुछ ऐसा ही नजारा है बिहार में। राज्य में विधान सभा चुनाव होने को एक वर्ष से भी कम समय रह गया है और कई ऐसे सवाल हैं जो सत्ताधारी पार्टियों को फिर से सत्ता में काबिज होने पर प्रश्नचिह्न् लगाते हैं।
इसमें भी शक नहीं कि वर्तमान सरकार ने आशातीत कार्य किए हैं। लेकिन जब हम सरकारी आँकड़ों से उसकी तुलना करते हैं, तो आम जनता जहाँ आज भी करीब 40 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं, को समझना सरकार के लिए कठिन होगा। इसके अलावा जदयू और भाजपा के आंतरिक कलह भी अब जगजाहिर हैं।
विकास की बात करें तो वर्तमान सरकार के पास आँकड़ों की कमी नहीं है, पर यह भी सच है कि यह कई बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में अक्षम रही है। भूख से होने वाली मौतें, नरेगा में भ्रष्टाचार और कई ऐसी अनियमितताएं सरकार को कटघरे में ला खड़ी करती हैं।
वहीं शहरी क्षेत्रों में हुए भौतिक विकास यानी सड़क, पानी, बिजली आदि में सुधार सरकार की उपलब्धि कही जा सकती है। लेकिन आज भी 70 प्रतिशत जनता गांवों में ही रहती है और वोट डालने का प्रतिशत भी उन्हीं का ज्यादा होता है। शायद यही कारण है कि वर्तमान सरकार ने रामविलास पासवान की दलित राजनीति में सेंध लगाते हुए महादलित की श्रेणी में पासवान जाति को छोड़ कर लगभग सभी दलित जातियों को शामिल कर लिया है।
महादलित का यही फार्मूला कितना कारगर होता है, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान सरकार ने बिहार की राजनीतिक जातीय समीकरण को बिगाड़ दिया है। आम सभाओं में विकास के नाम पर मुख्यमंत्री अक्सर वोट रूपी मेहताना मांगते नजर आते हैं, फिर भी जातीय वोट बैंक की कितनी आवश्यकता है।
पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान टिकट नहीं मिलने के कारण नागमणि सिंह जदयू से बाहर हो गए थे। उनके जाने के बाद कोइरी जाति के किसी सक्षम प्रतिनिधि की आवश्यकता थी, जो उपेन्द्र कुशवाहा के पार्टी में शामिल करने से पूरी हो गई। ध्यान देने लायक है कि उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कई पार्टियों का भ्रमण करते हुए अंतत: जदयू में आना ही उचित समझा। पिछले साल उन्होंने एक पार्टी की स्थापना भी की थी, जो उनके राजनीतिक प्रहसन का अंतिम दृष्य था।
जहां तक भाजपा और जदयू के ताल-मेल का सवाल है, तो अक्सर भाजपा के नेताओं का आरोप रहता है कि इस सरकार की सारी उपलब्धियां मुख्यमंत्री अपने और अपनी पार्टी के नाम कर देते हैं और जहां भी आरोपों का सामना करना होता है, वहां भजपा को आगे कर दिया जाता है। इस कारण भाजपा की राजनीति में स्थिरता भी नजर आने लगी है। हलांकि, इसके कई आंतरिक कारण है, जिसमें नेताओं का अनेक गुटों में बंटना सर्वप्रमुख है। यही कारण है कि समय-समय पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को हटाने की भी मांग उठती रही है।
पिछले लोक सभा चुनावों के नतीजे से नीतीश कुमार जिस अतिविश्वास और अतिमहत्वाकांक्षा से लबरेज थे, हालिया 17 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में सिर्फ 3 सीटों पर उनकी पार्टी और 2 सीटों पर भाजपा की जीत ने पानी फेर दिया। इससे यह भी साबित हो गया कि आज भी ग्रामीण इलाकों में रामविलास पासवान और लालू यादव की पकड़ ढ़ीली नहीं पड़ी है। न्याय के साथ विकास की बात करने वाले मुख्यमंत्री को यह तो सोचना ही होगा कि उनके द्बारा किए जा रहे न्याय और विकास की पहुंच कितनी व्यापक है। क्या वे अपने कार्यों को उन लोगों तक पहुंचाने में सक्षम रहे हैं, जो सही मायने में वोटदाता हैं?
बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय राजनीति अपने चरम पर है। पिछले कई वर्षों से यहां कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां हाशिए पर नजर आ रही हैं। हलांकि इस बार अकेले चुनाव लडऩे के कांग्रेस के फैसले ने पार्टी के लिए उत्प्रेरक का काम तो किया है, लेकिन अभी भी उसे राज्य में एक ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो कांग्रेस को फिर से जीवंत कर सके।
जहां तक भाजपा की प्रांतीय राजनीति का सवाल है, तो इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि जदयू ने स्थानीय स्तर पर अपने कद से उसे प्रभावित किया है। पिछले वर्षों के इतिहास को देखते हुए रामविलास पासवान की राजनीति की टोह लेना थोड़ी मुश्किल है। अब तो चुनाव विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं अंतिम समय में पासवान किस करवट होंगे, यह कहना कठिन है।
बहरहाल, पिछले चार वर्षों र्में बिहार के विकास की बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है। फिलवक्त, क्षेत्र विशेष में ही सही नीतीश कुमार की सरकार ने समेकित और समावेशी विकास कि उम्मीद तो जगा ही दी है, जिसके आधार पर जनता उन्हें, एक और मौका दे सकती है।
बिहार में भाजपा जद (यू) के साथ मिलकर सत्ता में है। लेकिन सत्ता में रहते हुए संगठन के स्तर पर पार्टी बेहद कमजोर हो चुकी है। नवनिर्वाचित भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए बिहार में भाजपा को दोबारा सत्ता में लाना जितनी बड़ी चुनौती होगा उससे बड़ी चुनौती साबित हो रही है वहां नये पार्टी अध्यक्ष का चुनाव।
कयास यह लगाये जा रहे हैं कि आने वाले छह महीनों के बाद कभी भी बिहार में विधानसभा का चुनाव कराया जा सकता है। अगर नितिश कुमार ने राजनीतिक चतुराई और समझदारी दिखाई तो चुनाव इसके पूर्व भी हो सकता है। लेकिन राजनैतिक स्थिति भाजपा के एकदम खिलाफ होता जा रहा है। राजनीतिक उहापोह की स्थिति में बिहार भाजपा उदासीन भाव में है। उसका अपना परंपरागत वोट काफी कम बचा है। कई उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों और मुसलमानों का बड़ी तेजी से ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो रहा है। भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष राधामोहन सिंह सिर्फ अपने क्षेत्र और जिले के नेता बनकर रह गए हैं। पार्टी को ठीक से न चलाने में वहां के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार काफी मदद कर रहे हैं। बची-खुची कसर वहां के उप-मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी ने पूरी कर दी है। मोदी द्वारा पाटी और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के कारण उनका काफी विरोध हो रहा है। मोदी में अब पार्टी और कार्यकर्ताओं के साथ पहले जैसा लगाव भी नहीं रहा। वे पार्टी और कार्यकर्ताओं को अपनी जेब में रखना चाहते हैं। इसी कारण मोदी की खूबियों का लाभ भी पार्टी को नहीं मिल पा रहा है। उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का उदाहरण भाजपा के सामने है जहां गठबंधन सरकारों का लाभ लेकर बीजद, बसपा सपा और जनता दल यू जैसी पार्टियां तो फली-फूली लेकिन भाजपा लोगों और कार्यकर्ताओं से दूर होती गई।
बिहार में भी कमोबेश यही स्थिति है। भाजपा-जदयू गठजोड़ सरकार की मदद से नीतिश कुमार और उनकी पार्टी तो फायदे में है, लेकिन भाजपा घाटे में। भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता, परंपरागत मतदाता और समर्थक अब पार्टी से दूरियां बनाने लगे हैं। पिछड़ी जातियों में जनता दल यू और राजद का दबदबा बढ़ रहा है, वहीं मुस्लिम मतों के लिए राजद, जनता दल यू के साथ ही कांग्रेस भी भारी मशक्कत कर रही है। ब्राह्मण कांग्रेस का परंपरागत समर्थक रहा है, कुछ समय तक वह कांग्रेस से दूर होकर भाजपा के साथ आ गया था, नेतृत्व के आभाव में वह फिर से कांग्रेस की ओर मुखातिब है। राहुल की टीम ने बिहार में उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों और मुसलमानों को लामबंद करने की रणनीति बनाई है। भाजपा उहापोह में है। उसके पास न तो दमदार जातीय पकड़ वाला नेता है और न ही हिन्दुत्व का चेहरा।
भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का पहला फिल्ड टेस्ट बिहार में होना है। बिहार वह प्रदेश है जहां भाजपा अध्यक्ष के रूप में नितिन गडकरी को पहला चुनाव फेस करना होगा। यहां की सरकार में भाजपा भागीदार है। पार्टी के वरिष्ठ और जुझारू नेता सुशील कुमार मोदी बिहार के उप-मुख्यमंत्री हैं। गौरतलब है कि मोदी के खिलाफ लंबे अरसे से विरोध की आवाज उठती रही है, लेकिन मोदी भी भरसक प्रयास करते रहे हैं कि उनका कुनबा, गुट और गिरोह कमजोर न पड़े। बिहार में भाजपा इन्हीं सवालों से जूझ रही है। आपसी खींचतान और गुटबाजी कम नहीं हुई। जनाधार भी लगातार खिसक रहा है। ऐसे में युवा और कुशल नेतृत्व की दरकार प्रदेश भाजपा को है। ऐसा नेतृत्व जो पुराने को साध सके, नए में उत्साह भर सके और आम जनता को अपनी ओर आकर्षित कर सके।
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