
पंजाब में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रूक रहा है। पंजाब कृषि में अग्रणी राज्य है। सिर्फ संगरूर और बरनाला जिले में पिछले दशक में 3,000 से अधिक किसान अपमान से बचने के लिए संघातिक रास्ता अपना चुके हैं। बढ़ते कर्ज के बोझ तथा ऋणदाताओं द्वारा पैसे वसूलने के लिए किए जा रहे अपमान के कारण किसान खुद को हताश महसूस कर रहे हैं। खेती सम्बन्धी व्यथा का यदि यथार्थवादी और समग्रता से अध्ययन कराया जाए तो मैं पूर्ण रूप से आश्वस्त हूं कि पंजाब आत्महत्या के मामले में कुख्यात महाराष्ट्र के विदर्भ को भी पीछे छोड़ते हुए सबसे ऊपर होगा।
भारत खेती सम्बन्धी समस्याओं का सामना ऎसे समय कर रहा है जब हाल ही में कनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने खेती की आधुनिक तकनीक बेचने के लिए 50,000 करोड़ रूपए के समझौते किए हैं।
यह घोषणा चार दिन तक चंडीगढ़ में चले एग्री-टेक मेले के समापन पर की गई। कृषि मंत्री शरद पवार ने भी मेले में भाग लिया। पवार उन लोगों में से एक थे जिन्होंने खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने के लिए कृषि-व्यापार उद्योग की जमकर तारीफ की। उद्योगों के मुखिया, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ भी खर्चीले प्रौद्योगिकी उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए कतारबद्घ खड़े थे। इससे अधिक विरोधाभास और कुछ नहीं हो सकता। भारी-कर वाली कृषि मशीनरी ऎसे समय बेची जा रही है जब किसान खेती के मोर्चे पर पहले से कहीं अधिक संकट में जकड़े हुए हैं। इन सबसे ऊपर, पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने यह कहते हुए किसानों का कष्ट दूर करने में असमर्थता जता दी है कि राज्य के पास ऎसा कोई बजट नहीं है कि वह कृषि समुदाय की मदद के मुद्दे पर ध्यान दे सकें।
इतना ही नहीं, कृषि मेले में उन्होंने यह भी कहा कि कर्मचारियों के वेतन भुगतान और राज्य की विभिन्न योजनाओं में धन के आवंटन के बाद पंजाब सरकार के पास किसानों की मदद के लिए धन नहीं बचता है। किसान कितने समय तक व्यवस्थित तरीके से लूटे जाते रहेंगे? किसान न केवल बिचौलियों व साहूकारों द्वारा, अपितु कृषि वैज्ञानिकों , बीज-खाद आपूर्तिकर्ताओं, बीज कम्पनियों तथा सरकार के द्वारा भी लूटे जा रहे हैं। सरकार समर्थन मूल्यों का अनुचित तरीके से निर्धारण करती है। यही समय है जब किसान आर्थिक गुलामी के चंगुल से निकलकर आर्थिक आजादी के लिए नए चरण में प्रवेश करें। किसानों को प्रत्यक्ष आय मदद की मांग क्यों नहीं करना चाहिए। इसका मतलब यह है कि सरकार किसानों को प्रति एकड़ या बीघा हर माह एक निश्चित राशि दे। विदेशों में यह व्यवस्था है।
मेरा दृढ़ता से मानना है कि यही एकमात्र जरिया है जिसके सहारे खेती से जुडे समुदाय को उबारा जा सकता है। कर्ज के बोझ से पिसते किसान को मुक्ति दिलाने और भविष्य की उज्जवल तस्वीर दिखाने का सही तरीका भी यही है। अनाज से भरपूर पंजाब को यह रास्ता दिखाना है। मुझे नहीं मालूम कि पंजाब सरकार यह क्यों नहीं महसूस करती कि उसे किसानों को कम से कम सरकार के चपरासी के समकक्ष तो मानना ही चाहिए। कम से कम हम इतना तो देश के अन्नदाता के लिए कर ही सकते हैं। आप कहेंगे, चपरासी क्यों? बहुत ठीक, क्योंकि एक कृतघ्न राष्ट्र की यह मंशा भी नहीं है कि वह अपने एक चपरासी को जितना वेतन देती है, उसका एक चौथाई ही किसानों को मिले।
मुझसे अक्सर यह कहा जाता है कि मैं नीति-निर्माताओं से कहूं कि वह ऎसी व्यवस्था बनाएं कि एक किसान के परिवार की मासिक आय सरकार के क्लर्क के समकक्ष हो, यह सिफारिश बहुत अधिक की होगी। कम से कम शुरूआत तो होने दीजिए कि किसान सरकार के चपरासी के बराबर आ सके। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद सरकार के एक चपरासी की मासिक आय 15,000 रूपए है। इसके विपरीत नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) द्वारा वर्ष 2003-04 में किए गए सर्वे के अनुसार एक किसान की मासिक औसत आय लगभग 2,115 रूपए आंकी गई थी। किसानों की आय पर एनएसएसओ ने यह आकलन आखिरी बार किया था। इसके बाद सम्भवत: यह आकलन इस वजह से बन्द कर दिया गया कि सरकार जमीनी हकीकत से काफी उलझन महसूस करने लगी। पंजाब में एक कृषक परिवार की मासिक औसत आय प्रतिमाह 32,00 रूपए से अधिक नहीं है। केवल दो ही राज्य ऎसे हैं जहां किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से अधिक है। ये राज्य हैं जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसान एक माह में नरेगा मजदूर से अधिक नहीं कमा पाता। क्या यह दुखभरी बात नहीं है कि भारत का किसान, जो देश का अन्नदाता है, उसकी आय नरेगा मजदूर से भी कम है, लेकिन इससे भी अधिक दुखदायी त्रासदी तो यह है कि बौद्धिक वर्ग हो या कृषि वैज्ञानिक या फिर नीति-निर्माता, कोई भी किसानों की आय बढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं करता। गरीब किसान अपने परिवार समेत खेत में काम करता है, उसे उतने से ज्यादा नहीं मिलता, जितना कि घरेलू नौकरानी रोजाना के एक घंटे के काम में कमा लेती है। यही सचाई है। हम किस तरह का व्यवहार अपने किसान, अपने अन्नदाता के साथ करेंगे?
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