सुरेंद्र किशोर
तोता रटंत की तरह लोहिया का नाम लेना तो आसान है,पर लोहियावादी बनना चुनाव लड़ने वाले आज के अधिकतर नेताओं के लिए बड़ा ही कठिन काम है।शायद इसीलिए लोहिया को मूर्त्तियों और चित्रों तक ही सीमित कर दिया गया है।
हालांकि मूर्त्तियों के बारे में डा.राम मनोहर लोहिया की यह राय थी कि किसी महा पुरूष की मूर्त्ति उसके निधन के सौ साल बाद ही लगनी चाहिए। तब तक उस महा पुरूष के बारे में इतिहास फैसला कर चुका होता है।यानी इतने समय बाद यह तय हो चुका होता है कि जिसे हमने महा पुरूष का दर्जा दे रखा है,उसने देश व समाज के लिए कुल मिलाकर अच्छा किया या बुरा।जब सोवियत क्रांति के 75 साल के भीतर ही सोवियत संघ में सर्वोच्च कम्युनिस्ट नेता की मूर्त्ति तोड़ दी गई तो कुछ लोगों को लोहिया की भविष्यवाणी की याद आई।
पर यहां के लोहियावादियों को देखिए।नब्बे के दशक में जब पटना में लोहिया की मूर्त्ति लगनी थी तो यह विवाद खड़ा हुआ था।पर मूर्त्ति लगाने वालों ने कहा कि लोहिया ने तो कहा था कि मरने के दस साल बाद मूर्त्ति लगवाई जा सकती है।चूंकि मूर्त्ति लगाने वालों को सिर्फ यही काम करना था,लोहिया के कहे पर चलना ही नहीं था,इसीलिए जल्दी- जल्दी मूर्त्ति वाला यह काम कर दिया गया।
यह तो मरने के बाद की बात हुई।लोहिया के जीवन काल में भी कई लोहियावादियों ने लोहिया की बात नहीं मानी।सत्ता लोलुपता इसका कारण रहा।सन 1967 में लोहियावादी विधायक जगदेव प्रसाद बिहार के करीब एक दर्जन बड़े लोहियावादियों में एक माने जाते थे।पर सत्ता के लिए उन्होंने उनके जीवन काल में ही लोहिया की इच्छा को ठोकर मार दी।
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर बी.पी.मंडल सन 1967 में लोक सभा के सदस्य चुने गये थे। डा.लोहिया संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता थे।पर लोहिया की इच्छा के खिलाफ जाकर बिहार में नवगठित महामाया मंत्रिमंडल के मंत्री बन गये।लोहिया चाहते थे कि जो जहां के लिए चुना गया है,वह वहीं जाकर काम करे।पर मंडल को यह मंजूर नहीं था।वे एम.एल.सी.बनना चाहते थे।पर लोहिया जी ने उन्हें कहा कि आप मंत्री द छोड़ो।उन्होंने पद छोड़ने के बदले महामाया मंत्रिमंडल को ही अपदस्थ करा दिया और खुद मुख्य मंत्री बन गये।दल बदल करा कर सरकार गिरवाई गई।दल बदल करने और कराने में जगदेव प्रसाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंडल मंत्रिमंडल के जगदेव प्रसाद भी सदस्य बने।
राजनीतिक ईमानदारी के साथ -साथ व्यक्तिगत ईमानदारी पर भी लोहिया जी बड़ा जोर देते थे।वे कहते थे कि इसी से जनता में समाजवादियों के प्रति विश्वास बढ़ेगा।समाजवादियों को यदि कांग्रेस का स्थायी विकल्प बनना है तो उन्हें जनता के बीच खुद को कांग्रेसियों से बिलकुल अलग दिखाना पड़ेगा।पर हुआ ठीक इसके उल्टा।व्यक्तिगत ईमानदारी के मामले में लोहिया का नाम लेने वाले बिहार व उत्तर प्रदेश के कुछ तथाकथित आधुनिक समाजवादी जितने बेशर्म साबित हुए है,उसकी कोई मिसाल ही नहीं है।
हां, राजनीति की मुख्य धारा से बाहर रह कर कुछ लोहियावादियों ने जरूर आले दर्जे की व्यक्तिगत ईमानदारी दिखाई जिनमें किशन पटनायक प्रमुख थे।
औरत-मर्द का सवाल हो या फिर हिंदू मुस्लिम का प्रश्न।अनेक सरकारी या यूं कहें कि वोट-बाज लोहियावादियों ने लोहिया की नीतियों के बिलकुल खिलाफ काम किया है और विरोधी रुख अपनाया है।लोहिया जी हिंदू सांप्रदायिकता और मुस्लिम सांप्रदायिकता को समान रूप से खराब मानते थे।पर आज के चुनाव लड़ने वाले अधिकतर समाजवादी ऐसे मामले में बिलकुल एकतरफा रवैया अपनाते हैं जो कभी -कभी देशहित के खिलाफ भी लगता है।समाजवादियों के इस एकतरफा रवैऐ से भाजपा को राजनीति में बढ़त मिल जाती है।
डा.लोहिया सभी जातियों की महिलाओं को पिछड़ा मानते थे।पर आधुनिक सरकारी व वोटबाज लोहियावादियों ने महिलाओं को भी जातियों के चश्मे से देख कर अपना रवैया तय किया हैं।राजनीति में परिवारवाद का सवाल हो या फिर कांग्रेस के प्रति समाजवादियों के रुख-रवैये का प्रश्न हो,समाजवादियों ने लोहिया की बातों को साफ भुला दिया है।
12 अक्तूबर 1967 को मात्र 57 साल की उम्र में डा.राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया था।पर, इतनी ही कम उम्र में उन्होंने इस देश की राजनीति को जितना प्रभावित किया,वह अनेक समकालीन नेताओं के लिए ईर्ष्या का विषय बना। आखिर वे लोगों को इतना अधिक प्रभावित क्यों कर पाये ?
उनकी इस पुण्य तिथि के अवसर पर भी लोगबाग उनके गुणों को याद करेंगे ही।
पर ऐसे अवसर पर अधिकतर मामलों में अधिकतर नेता लोग और उनमें से भी अधिकतर लोग भी जो खुद को लोहियावादी कहते हैं,उनके गुणों का तोता रटंत मात्र ही करते हैं। पैसा- वाद,पद -वाद और परिवार-वाद के जंजाल में फंसी आज की मुख्य धारा की राजनीति और उसके नेतागण इसके अलावा कुछ कर भी नहीं सकते।यदि इक्के दुक्के कोई नेता आज भी इस जाल-जंजाल से बचना चाहता है और सरकार में रह कर या फिर प्रतिपक्ष में भी भरसक बेहतर राजनीति करना चाहता है तो उसे राजनीति में शून्य बना देने की चौतरफा कोशिश शुरू हो जाती है।
ऐसे तो डा.राम मनोहर लोहिया में अनेक गुण थे,पर उनमें से एक गुण ने उन्हें सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र बनाया।वह गुण यह था कि वे जो कहते थे,वही करते भी थे।
यदि आज के नेतागण भी लोहिया जी के इस गुण का अनुसरण करते हुए अपनी कथनी और करनी का फर्क मिटा दें तो जनता देर -सवेर उन्हें हाथों -हाथ ले लेगी।आज इस देश की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यह है कि अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेतागण अपनी ही बातों और वायदों को खुद ही बाद में चबा जाते हैं।यानी जनता को जो सब्ज बाग दिखा कर वे सत्ता में आते हैं,अपने स्वार्थ में अंधे होकर व गद्दी मोह में पड़ कर उन वायदों को बेहिचक तोड़ देते हैं।
यदि किसी नेता का राजनीतिक जीवन तीस साल का है तो आप जरा उस तीस साल के स्थानीय अखबारों की फाइलें उलटिए। उसके बयानों व भेंट वार्ताओं को देख कर पाइएगा कि ऐसा झूठा नेता तो इस धरती पर पैदा ही नहीं हुआ।चुनावों के अवसरों पर अधिकतर नेताओं के झूठ और भी खुल कर सामने आते हैं।चूंकि अखबारों के पाठकों की स्मृति छोटी होती है,इसलिए उस नेता पर गुस्सा समय के साथ कम हो जाता है।या फिर इस बीच कोई दूसरा नेता उससे भी अधिक बड़ी गलती करके पिछले नेता की गलती के असर को धुंधला कर दिया होता है।
ओर स्वतंत्रता सेनानी ,विचारक और समाजवादी डा.लोहिया के जीवन में ऐसा प्रकरण शायद ही मिले ! इसीलिए आज भी लोग उन्हें श्रद्धा के साथ याद करते हैं।उनकी करनी और कथनी में फर्क नहीं था।क्योंकि वे न तो पद के पीछे थे और न पैसे के। उनका कोई परिवार तो था ही नहीं।डा.लोहिया अविवाहित थे।
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