भोपाल। प्रदेश में 'सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसायटी' के आधार पर निगम मंडलों की स्थापना की गई थी। इनकी स्थापना के पीछे मूल उद्देश्य यह था कि राज्य में सुव्यवस्था, विकास, रोजगार और आम लोगों को सुख सुविधाएं मिले। लेकिन निगम मंडल अपने मूल उद्देश्य से भटक गए हैं। प्रदेश में संचालित 23 निगम मंडलों में से मात्र 2 ही निगम मंडल ऐसे हैं जो अपनी स्थापना से लेकर आज तक लाभ में चल रहे हैं। शेष 21 निगमों में से कुछ निगम पिछले पांच सालों में अच्छी स्थिति में आ पाए हैं तो कुछ निगम ऐसे भी हैं जो स्थापना से लेकर आज तक सफेद हाथी बने हुए हैं। आज वर्तमान परिदृश्य में कई निगमों के हालात इतने बदतर हैं कि अब उन्हें बंद करने के अतिरिक्त और कोई चारा सरकार के पास नहीं है।
निगम मंडलों के गठन के समय प्रबंध संचालकों को दैनिक कार्य और व्यवसाय को सुचारू रुप से संचालित करने और अध्यक्ष एवं बोर्ड ऑफ डायरेक्टर को निगम के नीति निर्धारण तथा महत्वपूर्ण निर्णय लेने का कार्य सौंपा गया था। देखा जाए तो यह व्यवस्था एक तरह से चैक-बैलेंस के लिए की गई थी, लेकिन धीरे-धीरे निगम मंडल के अध्यक्ष पद पर राजनीतिक लोगों का कब्जा होने लगा और इन लोगों ने संस्था के मूल उद्देश्यों के बजाय अपने राजनैतिक और व्यक्तिगत हितों को पूरा करने में रुचि ली साथ ही सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए निगमों के उत्पादों और सेवाओं को भी प्रभावित किया। इतना ही नहीं इन लोगों ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए समर्थकों और रिश्तेदारों को अनावश्यक रूप से भर्ती कर लिया। ऐसे में जहां एक ओर निगमों पर अनावश्यक स्थापना व्यय बढ़ा वहीं दूसरी ओर निगमों में अयोग्य और अकुशल कर्मचारियों की भर्ती होने से उनकी व्यवसायिक कुशलता भी कम हो गई। जिसके चलते निगमों में अपेक्षाकृत लाभ की बजाए हानि हो रही है। हालांकि यह भी सही है कि निगम मंडलों की स्थापना लाभ कमाने के लिए नहीं, बल्कि वस्तुओं, सेवाओं आधारभूत संरचनाओं का निर्माण एवं विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को ध्यान में रखकर की गई थी, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि निगम मंडलों को लाभ नहीं कमाना चाहिए। यदि निगम मंडल लाभ कमाते हैं तो वो ज्यादा अच्छी तरह से जनहित में कार्य कर पाएंगे और राज्य सरकार पर भी किसी प्रकार का बोझ नहीं रहेगा। वर्ष 2004 में राज्य योजना मंडल के तत्कालीन उपाध्यक्ष सोमपाल ने राज्य शासन को सभी निगम मंडलों के क्रियाकलापों, प्रबंधन एवं उद्देश्यों की एक बार फिर से नए सिरे से समीक्षा करने के लिए लिखा था। उन्होंने यह भी लिखा था कि जो निगम मंडल आवश्यक हैं उनका पुनर्गठन करने का प्रयास किया जाना चाहिए। जिससे वो अपने मौलिक उद्देश्यों की पूर्ति एवं पहले से बेहतर कार्य करने में सफल हो सकें। जिन निगम मंडलों के उद्देश्यों की पूर्ति हो चुकी है या वे अनावश्यक हो गए हैं उन्हें बन्द कर देना चाहिए। उन्होंने एक दर्जन से अधिक निगम मंडलों को अनुपयुक्त बताते हुए कुछ को बन्द करने और कुछ को एक-दूसरे में मर्ज करने की सलाह भी राज्य सरकार को दी थी, लेकिन निगम मंडल राजनीतिक लोगों के लिए पुनर्वास केन्द्र होने के कारण तत्कालीन उपाध्यक्ष सोमपाल की सलाह को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।
1981 में हुआ निगमों का गठन-
प्रदेश में निगम मंडलों का गठन 1 जुलाई 1981 को हुआ था। तब इन्हें सार्वजनिक उपक्रम ब्यूरो का नाम दिया गया था। छह साल बाद 18 जून 1986 को इसका नाम बदलकर सार्वजनिक उपक्रम विभाग रखा गया। प्रदेश में 27 निगम मंडलों का गठन किया गया था। वर्तमान में इन निगमों में से 23 निगम संचालित हैं शेष 4 निगमों को बंद कर दिया गया है, जिनमें मध्यप्रदेश राज्य भूमि विकास निगम, मध्यप्रदेश लेदर डेवलपमेंट कारपोरेशन, मध्यप्रदेश स्टेट टेक्सटाईल कारपोरेशन लिमिटेड एवं मध्यप्रदेश राज्य उद्योग निगम लिमिटेड शामिल हैं।
573 करोड़ की अंशपूंजी-
प्रदेश में संचालित इन 23 निगमों में कुल अंशपूंजी 57348.19 लाख रुपए हैं। जिसमें राज्य शासन की अंशपूंजी 54195.51 लाख, केन्द्र शासन की अंशपूंजी 428.96 लाख और अन्य स्रोतों की अंशपूंजी 2723.72 लाख रुपए इन निगम मंडलों में लगी हुई है।
लाभ में संचालित निगम -
म.प्र. पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन वर्ष 2005-06 से, म.प्र. बीज एवं फार्म विकास निगम वर्ष 2007-08 से, म.प्र. नागरिक आपूर्ति निगम वर्ष 2005-06 से, म.प्र. वेयर हाउसिंग एवं लाजिस्टिक कारपोरेशन निरंतर, म.प्र. पर्यटन विकास निगम वर्ष 2004-05 से, म.प्र. पशुधन एवं कुक्कट विकास निगम वर्ष 2006-07, म.प्र. हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम वर्ष 2005-06 से, म.प्र. खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड 2004-05 से, म.प्र. वन विकास निगम वर्ष 1975 से, म.प्र. लघु उद्योग निगम वर्ष 2005-06 से, म.प्र. ट्रेड एंड इंवेस्टमेंट फेसिलिटेशन कारपोरेशन वर्ष 2005-06 से, द प्राविडेंट इन्वेस्टमेंट कम्पनी, म.प्र. खनिज विकास निगम निरंतर एवं म.प्र. वित्त निगम इंदौर वर्ष 2005-06 से लाभ में चल रही हैं।
हानि मे संचालित निगम-
मध्यप्रदेश स्टेट एग्रो इण्डस्ट्रीज डवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड, मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड, मध्यप्रदेश महिला वित्त एवं विकास निगम एवं मध्यप्रदेश स्टेट इण्डस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड हानि में चल रहे हैं।
इन निगमों में है ऑडिट लंबित-
प्रदेश में संचालित 23 निगम मंडलों में 12 निगम मंडल ऐसे हैं जिनमें ऑडिट लंबित हैं, वे हैं म.प्र. ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट फेसिलिटेशन कारपोरेशन, म.प्र. राज्य औद्योगिक विकास निगम, म.प्र. औद्योगिक केन्द्र विकास निगम, म.प्र. पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन लिमिटेड, द प्राविडेंट इन्वेस्टमेंट कम्पनी लि. मुंबई, म.प्र. राज्य इलेक्ट्रोनिक विकास निगम, म.प्र. स्टेट एग्रो इण्डस्ट्रीज डवलपमेंट कारपोरेशन लि., म.प्र. राज्य पर्यटन विकास निगम, हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम, म.प्र. आदिवासी वित्त एवं विकास निगम, म.प्र. पिछड़ा वर्ग तथा अल्प संख्यक वित्त एवं विकास निगम, म.प्र. राज्य सड़क परिवहन निगम एवं म.प्र. ऊर्जा नियामक आयोग ।
कर्मचारियों की फजीहत-
निगम मंडलों के हालात जैसे-जैसे बिगड़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे कर्मचारियों की फजीहत होती जा रही है। हालात यह हैं कि निगम मंडल कर्मचारियों के ऊपर निगम बंद होने की तलवार हमेशा लटकती रहती है। पता नहीं कब कौन सा निगम बंद हो जाए। हाल ही में कुछ ऐसा ही माहौल राज्य सड़क परिवहन निगम का बना हुआ है। पता नहीं कब उसमें ताले लग जाएं। प्रदेश के 23 निगमों में से मात्र 6 निगम ही ऐसे हैं जिन्होंने अपने कर्मचारियों को छटवां वेतनमान दिया है। इनमें मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाईज कारपोरेशन, मध्यप्रदेश पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन, मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम, मध्यप्रदेश वेयर हाउसिंग एण्ड लॉजिस्टिक्स कारपोरेशन शामिल हैं। कई निगम ऐसे भी हैं जहां अभी चौथा वेतनमान ही चल रहा है।
निगमों को एबीसी ग्रेड देने की तैयारी-
निगमों की स्थिति में सुधार लाने के लिए सार्वजनिक उपक्रम द्वारा इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। इसके चलते निगमों को अब ए,बी और सी ग्रेड में बांटा जाएगा। ए ग्रेड में निरंतर लाभ वाले निगम, बी ग्रेड में विगत तीन वर्षाें से अधिक लाभ में रहे निगम मंडल और सी ग्रेड में वर्तमान में लाभ में चल रहे निगम मंडलों को शामिल किया जाएगा। वाणिज्य, उद्योग एवं सार्वजनिक उपक्रम मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सार्वजनिक उपक्रम विभाग को निर्देश दिए हैं कि निगमों में आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार की तर्ज पर मिनी रत्न और नवरत्न पुरस्कार देने की योजना बनाएं। इस योजना के अनुसार जो निगम तीन वर्ष से लगातार लाभ में है उन्हें मिनी रत्न और जो निगम तीन वर्ष से अधिक से लाभ में चल रहे हैं उन्हें नवरत्न पुरस्कार देने की योजना बनाई जा रही है।
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