शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

अब चुनावों में विदेशी धन की चर्चा क्यों नहीं ?

इस देश के चुनावों में कभी विदेशी धन खूब लगते थे।अब नहीं लगते।या फिर कम लगते हैं।लगते भी हैं तो उनकी चर्चा नहीं होती।अब तो उल्टे यहां के अनेक नेताओं पर यह आरोप लगता है कि उनके अपार धन विदेशी बैंकों के गुप्त खातों में जमा हैं।

ऐसा नहीं है कि आजादी के तत्काल बाद के कुछ नेताओं में स्विस बैंक के गुप्त खातों में पैसे जमा करने की प्रवृति ही नहीं थी। इक्के दुक्के नेता ऐसा काम तब भी करते थे।अब यह सरेआम हो रहा है।यानी धारा उल्टी दिशा में बह रही है।हालांकि अब भी एन.जी.ओ.से जुड़े कुछ नेता एन.जी..ओ को अन्य उद्देश्यों के लिए मिले विदेशी धन का इस्तेमाल अपने चुनाव के लिए करते हैं।पर एक हद तक ही।वह व्यापक नहीं है।

पर और कई महत्वपूर्ण नेतागण विदेशों से पैसे प्राप्त करके उसे अपने चुनाव में लगाते थे।पर अब तो इस गरीब देश के दरिद्रों की रहनुमाई करने का दावा करने वाले कुछ राजनीतिक दल व उनके नेता गण भी इतने अमीर हो चुके हैं कि उनकी दौलत की तुलना बिजनेस घरानों से भी की जा सकती है।कुछ नेताओं की तुलना आसानी से किन्हीं उदयोगपति से की जा सकती है।ऐसे में चुनावों के लिए विदेशी धन की जरूरत भी लगभग समाप्त हो चुकी है।

इस देश के लगभग सभी दल किसी न किसी कालखंड में केंद्र व राज्य में सत्ता में रहे हैं।अनेक कं्रेद्रीय मंत्रियों को सरकार के लिए विदेशी सौदे करने पड़ते हैं।अधिकतर विदेशी सौदों में कमीशन मिलते हैं।कमीशन मांगने भी नहीं पड़ते।अपने आप मिल जाते हैं।यदा कदा एकाध ईमानदार मंत्री जरूर उसे लेने से जरूर इनकार कर देते रहे हैं।यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि सारे मंत्री कमीशन लेते ही हैं।पर जो भी लेते हैं उनके पैसे विदेशी बैंकों के गुप्त खातों में जमा हो जाते है।वैसे देश के भीतर भी जिस नेता को रिश्वत की बड़ी राशि मिलती है,उसे हवाला के जरिए आसानी से विदेश भिजवा दिया जाता है।इस तरह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते सरकारी भ्रष्टाचार के इस दौर में चुनाव के लिए विदेशी पैसे की जरूरत ही कहां है ?

पर पचास और साठ के दशकों में जब सोवियत लॉबी बनाम अमेरिकी लॉबी भारत में भी काफी सक्रिय थी ,तब विदेशी पैसों से यहां के चुनावों को भी प्रभावित करने की जरूरत थी।एक पक्ष पैसों के बल पर इस देश में साम्यवादी विचार को और भी फैलाना चाहता था तो दूसरा पक्ष पैसे के जरिए साम्यवाद के विस्तार को रोकना चाहता था।इसलिए पैसों का खेल जारी था।पर नब्बे के दशक में एक तरफ सोवियत संघ में साम्यवादी शासन का पतन हो गया और दूसरी ओर नई आर्थिक नीति के जरिए भारत की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति में बदलाव आने लगा।

राजनीति में तेज नैतिक पतन शुरू हो गया और अधिकतर नेताओं में पैसे और परिवार के प्रति बेशर्म झुकाव बढ़ने लगा।भ्रष्टाचार व अपराधीकरण का नंगा नाच शुरू होने लगा और किसी नेता को अपनी कोई गंदगी व बेशर्मी छुपाने की जरूरत ही नहीं रही।फिर यहीं के साधन से चुनावों में बेशुमार दौलत खर्च होने लगी।

पर पचास-साठ-सत्तर के दशकों के अधिकतर नेता निजी संपत्ति के संग्रह को लेकर आज की तरह आग्रही व लालची नहीं थे।हां,चंुनाव में जो खर्च होते थे,उसके लिए कुछ पैसे वे चोरी छिपे भी कहीं से मिल जाये तो उन्हें एतराज नहीं था।
देश के राजनीतिक व प्रशासनिक हलकों में भीतर-भीतर तो इस बात की चर्चा जरूर थी कि यहां के चुनावों में विदेशी धन लग रहे हैं,पर उस पर कम ही लोग ध्यान देते थे।हां,उन नेताओं व दलों के चाल-चरित्र के कारण कुछ को सोवियत एजेंट,कुछ को चीनी एजेंट तो कुछ को अमेरिकन एजेंट जरूर कहा जाता था।

पर सन 1967 के आम चुनावके बाद जब इस देश के नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गई और लोक सभा में भी कांग्रेसी सदस्यों की सख्या पहले की अपेक्षा कम हो गई तो तत्कालीन ंइदिरा गांधी सरकार के कान खड़े हो गये।उसे लगा कि शायद यह विदेशी पैसों के चुनाव में भारी इस्तेमाल के कारण ही हुआ है। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री वाई .बी.चव्हाण के निदेश पर 1967 के चुनाव के बाद केंद्रीय गुप्चर एजेंसी ने इसकी जांच की।जांच में यह पाया गया कि सिर्फ एक राजनीतिक दल को छोड़कर सारे प्रमुख दलों ने चुनाव के लिए विदेशों से पैसे लिये।

इस चौंकानेवाली जांच रपट को दबा दिया गया।पर न्यूयार्क टाइम्स ने उस रपट के सारांश को छाप दिया।भारत की लोक सभा में इस पर हंगामा हो गया।पूरी रपट प्रकाशित करने की मांग की गई।पर गृह मंत्री ने इस मांग को ठुकराते हुए कहा कि ‘रपट के प्रकाशन से अनेक व्यक्तियों व दलों के हितों की हानि होगी।’आजादी के बाद से ही दुर्भाग्यवश हमारे देश के हुक्मरानों ने इसी नीति-रीति से देश को चलायां।यानी समर्थ व्यक्ति,पार्टी या व्यापारिक घराने चाहे जो भी कर्म-कुकर्म ं करते जाएं,उनके हितों को नुकसान नहीं पहुंचाना है,भले देश व उसके करोड़ों निरीह गरीब लोगों के हित चूल्हें भांड़ में जायें।

खैर विदेशी धन के भारतीय चुनावों में इस्तेमाल पर लोक सभा में एक से अधिक बार चर्चा हुई।सन 1966 में अमेरिकी समाचार पत्रों में यह खबर छपी थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी..आई.ए.देश-विदेश की कई संस्थाओं को धन देती है।जिन संस्थाओं को सी.आई.ए. द्वारा धन दिये जाने की चर्चा अमेरिकी अखबारों ने की,उनमें भारत की भी कुछ संस्थाएं शामिल थी।वैसे भारत की केंद्रीय गुप्तचर एजेंसी ने सन 1967 में कहा था कि भारत के कुछ दलों को सोवियत संघ,कुछ को चीन और कुछ को अमेरिका से पैसे मिले।एक बड़े दल के कुछ नेताओं को तो सोवियत संघ और कुछ अन्य को अमेरिका से धन मिले थे।पर न्यूयार्क टाइम्स की इस रपट को कुछ भारतीय नेताओं ने मनगढंत कहा था।कुछ ने इसकी जांच के लिए संसदीय समिति के गठन की मांग की थी।पर केंद्र सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की।

यह स्वाभाविक ही था कि शीत युद्ध के दौर में कोई पूजींपति देश किसी विकासशील देश में कम्युनिज्म के फैलाव को रोकने की कोशिश करे।दूसरी ओर कम्युनिस्ट तो खुद को राष्ट्रीय नहीं बल्कि ,अंतरराष्ट्रीय कहते हैं।वे पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट शासन चाहते थे।एक कम्युनिस्ट देश के पैसे से दूसरे देश में कम्युनिज्म के फैलाव यानी निर्यात को कई कम्युनिस्ट गलत भी नहीं मानते।उनके बारे में इस देश में कभी यह मजाक चलता था कि यदि मस्क्वा में वर्षा होती है,तो भारत के कुछ कम्युनिस्ट दिल्ली में छाता लगा लेते हैं।

पर सन 2005 में जब द मित्रोखिव अर्काइव -2 नामक पुस्तक सामने आई तो भारतीय कम्युनिस्टों की स्थिति परेशानीपूर्ण हो गई।उसमें पैसे की लेन देन का विवरण है।सी.पी.आई.नेता ए.बी..बर्धन ने तब कहा था कि यह जासूसी उपन्यास की कथा मात्र है।पर लोग पूछते हैं कि सोवियत कम्युनिस्टों के सत्ताच्युत होने के साथ- साथ ही भारत में सी..पी.आई क्यों मुरझाने लगी ?उनके प्रकाशन एक- एक करके क्यों बंद होने लगे।
पचास के दशक में खुद इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया था कि कम्युनिस्टों व प्रजा समाजवादी पार्टी को विदेशी धन मिला था।यह बात और है कि तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तब इस आरोप खंडन किया था।पर सन 1967 की गुप्तचर जांच और 2005 के मित्रोखिन अर्काइव -2 ने इंदिरा गांधी के आरोप को सही और नेहरू की सफाई को गलत साबित कर दिया।मित्रोखिन अर्काइव -2 पुस्तक में इस बात की विस्तृत चर्चा है कि किस तरह सोवियत पैसे भारत के मीडिया,राजनीति व अन्य क्षेत्रों में लगे।

खैर अब तो हमारे अधिकतर हुक्मरान इस देश को चंगेज खान की तरह लूटपाट कर खुद ही सपरिवार इतने अमीर हो चुके हैं और हो रहे हैं कि उनके पैसों से तो विदेशों में उदयोग व्यापार फल -फूल रहे हैं।भले इस देश के किसी गरीब को अपनी पत्नी की सर्जिकल डिलवरी कराने के लिए पैसे जुटाने के लिए अपने ही एक बेटे को बेचना पड़े।गत महीने यह खबर मध्य प्रदेश के अनूप पुर जिले के अगरियानार गांव से आई थी।इससे पहले इसी साल जुलाई में दिल्ली से यह खबर आई कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दो साल में सिर्फ जलपान पर 94 लाख रुपये से अधिक खर्च कर दिया।इसी के साथ दो अन्य खबरों को जोड़ दीजिए तो स्थिति और भी साफ हो जाएगी।एक खबर यह है कि हर एम.पी.पर सरकार हर साल 37 लाख रुपये खर्च करती है और दूसरी सूचना यह है कि निवर्तमान सर्त्तकता आयुक्त प्रत्युष सिंहा ने कहा है कि इस देश का हर तीसरा व्यक्ति भ्रष्ट है।यहां एम.पी.-विधायक क्षेत्रीय विकास फंडं की बात नहीं की जा रही है।अब भला किसी दल या नेता को चुनाव लड़ने के लिए विदेश धन की कितनी जरूरत ही रह गई है ?

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