
हमारी भारतीय संस्कृति में राम और कृष्ण की भांति हनुमानजी भी संस्कृति के आधार स्तंभ तथा निष्ठा के केन्द्र हैं । प्रत्येक भारतीय के हृदयमें उनका प्रेम शासन अभी भी चल रहा है । हनुमानजी भक्तों में ज्येष्ठ , श्रेष्ठ तथा अपूर्व हैं । ‘‘नर अपनी करनी करे तो नर का नारायण हो जाए’’ । इस प्रकार हनुमानजी ने अपने अंदर देवत्व स्वयं निर्माण किया है । मानव भी उच्च ध्येय और आदर्श रखें तो देवत्व प्राप्त कर सकता है । हनुमानजी ने अपने कर्तव्य से देवत्व प्राप्त किया है । हनुमान जी की स्वतंत्र उपासना की जा सकती है और उनका स्वतंत्र मंदिर भी हो सकता है । जिस प्रकार भगवान शिव का शिवालय नंदी के बिना अधूरा रहता है । उसी प्रकार भगवान श्रीराम के देवालय की पूर्णता हनुमान के मूर्ति के बिना अधूरी रहती है । परन्तु हनुमानजी के मंदिर में रामजी की मूर्ति नहीं भी है तो भी चलेगा , ऐसी अलौकिकता हनुमानजी में है । जन-समुदाय में रामजी के समान ही आदरणीय स्थान हनुमानजी को प्राप्त हुआ है । हनुमानजी की रामजी के प्रति एकनिष्ठता और एकनिष्ठ भक्ति अपूर्व है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी को भगवान श्रीराम के दर्शन हनुमानजी की कृपासे ही प्राप्त हुए थे। इसीलिए गोस्वामीजी ने हनुमानजी को अपना गुरु माना है । तथा हनुमानजी के प्रति उनकी अपार श्रध्दा थी । तुलसीदासजी ने हनुमानजी पर कई रचनायें की है जैसे हनुमान चालीसा, बजरंगबाण, हनुमान बाहुक इत्यादि, उन्हीमें से हनुमान चालीसा एक है । ‘‘हनुमान चालीसा’’ उनके द्वारा रचित एक बहुत ही सिद्ध एवं लोकप्रिय ग्रंथ है ।
‘हनुमान चालीसा’ में उन्होने हनुमानजी के चरित्र तथा गुणों का वर्णन किया है । नियमित श्रध्दासे भक्ति-भावसे यदि हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो मनुष्य मनवांछित फल पाता है तथा उसकी मनोकामना पूर्ण होती है ।
आज मानव जीवन जड, भोगवादी तथा भावशून्य बनता जा रहा है । जहाँ थोडी बहुत धार्मिकता एवं अध्यात्मिकता है, वहाँ दम्भ तथा दिखावे का प्रदर्शन ज्यादा हो रहा है । ऐसी विषम स्थिति में मनुष्यमात्र के लिए विषेश तया युवकों और बालकों के लिए भक्त श्रेष्ठ श्री महावीर हनुमानजी की उपासना अत्यंत आवश्यक है । क्योंकि उनके चरित्र से हमें ब्रम्हचर्य व्रतपालन, चरित्र रक्षण, बल, बुध्दि, विद्या इत्यादि गुणों का विकास करने की शिक्षा प्राप्त होती है । हनुमानजी अपने भक्तों को बुध्दि प्रदान कर के उनकी रक्षा करतें है ।
हनुमानजी में राम का नाम और राम का काम, भक्ति और सेवा का अद्भुत समन्वय दिखायी देता है । विचारोंकी उत्तमता के साथ भगवान में अनुरक्ति और सेवा व्यक्ति के पूर्ण विकास की द्योतक है, जो हनुमानजी के चरित्र में देखी जा सकती है । जीवनमें केवल राम-राम रटने से काम नहीं चलता। रामका नाम और राम का काम दोनों का जीवनमें समन्वय होना चाहिए, यह हनुमानजी के चरित्र से हमें सीखने को मिलता है । हनुमानजी जिस तरह हर पल रामजी का ध्यान तथा स्मरण करते थे उसी प्रकार रामजी का काम करने को हर पल तैयार रहते थे । ‘‘राम काज करिबे को आतुर’’ ऐसा ‘हनुमान चालीसा’ में उल्लेख है । उसी प्रकार हमें भी भगवान के कार्य के लिए हरपल कटिबद्ध होना चाहिए । तथा हनुमानजी की भांति हमारे मन को सुंदर, सुगंधित, हृदय को मृदुल तथा बुद्धि को सुन्दर बनाना होगा ।
माथेपर चंदन लगाकर आदमी अध्यात्मिक नहीं बनता और कोई गुरु बन कर प्रवचन देने से भी अध्यात्मिक नहीं बनता । अध्यात्मिकता जीवन का मानसिक और बौध्दिक विकास (Psychological and Intellectual development) है। दैवी गुणों से संपन्न हमारे उपास्य देवता के जीवनका अध्ययन कर उनके दिव्य गुणों को अपने जीवनमें लाने का प्रयत्न करना चाहिए ।
नैतिक मूल्योंपर अविचल निष्ठा रखनी पडती है । इस सृष्टिमें भगवान ने भेजा है यह मनुष्य को समझना चाहिए । इस सृष्टिमें हमारा आगमन होने पर शांति से जीवन व्यतीत करना, भक्तिपूर्ण अंत:करण से जीना और अंतमे सृष्टि से विदा लेना, यह अपना ध्येय होना चाहिए । मानव को प्रभु से मिली हुई दो शक्तियाँ है - मन और बुध्दि ! इन शक्तियों के विकास द्वारा मानव स्वयं को ऊपर ले जा सकता है । ‘मुझमें भी कंकड में से शंकर, नर से नारायण और जीव से शिव बनने की शक्ति है’ ऐसा विचार केवल मनुष्य को ही आ सकता है । अनंत जन्मों की साधना के बाद प्राप्त हुए इस चिंतामणि स्वरुप मानव देह को उज्वल बनाकर प्रभु के चरणों मे अर्पण करना ही श्रेष्ठ भक्ति है । इसलिए सृष्टि में कैसे रहें, किस तरह जीयें और प्रभु की तरफ कैसे जायें, यह हमारी संस्कृति हमें सिखाती है ।
जीवनमें ज्ञान-कर्म और भक्ति का समन्वय होना चाहिए । कर्मयोग का हाथ, ज्ञानी की आँख और भक्त का हृदय इन तीनों के समन्वय से त्रिवेणी संगम होता है । ऐसा त्रिवेणी संगम हमें हनुमानजी के चरित्र में दृष्टिगोचर होता है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘‘हनुमान चालीसा’’ में इन सभी गुणोंका चित्रण किया है, तथा गागरमें सागर रूपी अमृत उन्होने हनुमान चालीसा में भरा है । श्री हनुमानजी के चरित्र पर कुछ कहना हम जैसे साधारण मनुष्य के लिए असंभव है ।
हनुमानजी हमारे आदर्श हों तथा भगवान श्रीराम हमारे सहायक बने, इन दो महापुरूषोंके चरित्र को दृष्टि के सन्मुख रख कर अपने जीवन को सुयोग्य रीति से गढने के लिये भगवान हम सब की बुध्दि को वैसा बनायें तथा हमें योग्य शक्ति प्रदान करें यही प्रार्थना है ।
महत्त्व तो हमेशा से भक्ति का ही है जब भक्त भक्ति की पराकाष्ठा प्राप्त कर भगवान् में अपने को विलीन कर देता है तो उसमे ये क्षमता आ जाती है कि वो औरों को कुछ दे सके वो गुरु पद को प्राप्त कर लेते है | फिर उनकी स्तुति करके जो भक्ति के पथ पर चलना चाहते हैं उस मार्ग को प्राप्त कर सकते हैं |
हनुमान चालीसा भी हनुमान जी की स्तुति है और उसके अंत में हम प्रार्थना करते हैं कि हमपर गुरु के नाते कृपा करना | क्योंकि गुरु ही एक मात्र ऐसे है जो शिष्य को अपने सामान करता है | पारस भी लोहे को कंचन तो कर सकता है पर अपने सामान नहीं कर सकता | ये दयालुता केवल और केवल गुरु में ही होती है | हनुमान चालीसा में भी हम हनुमान जी की स्तुति करके यही मांगते हैं की हमें रघुवीर यानी प्रभु की भक्ति प्रदान करें भक्ति के मार्ग पर हमें हाथ पकड़ कर ले चलें | हमारे अंतर में भी आपकी तरह रघुबीर का वास हो जाए |
प्रथम दोहे में हम कह रहे हैं :
"श्री गुरु चरण सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि| बरनऊँ रघुबर बिमल जसु जो दायक फल चारि" |
अर्थात आप जैसे गुरु की चरण रज से अपने मन को पवित्र बकर मैं भी श्री रघुबीर के यश का वर्णन कर करूँ जो धर्म अर्थ काम मोक्ष रूपी चरों फल देने वाला है.
"बुद्धि हीन तनु जानिके सुमिरों पवन कुमार| बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार ||
अर्थात हे पवन कुमार मैं आपका स्मरण करता हूँ मुझे बलहीन जान कर मुझ पर कृपा कर मुझे ल बुद्धि विद्या प्रदान करें और मेरे दोषों का नाश करें.
इस तरह हनुमान चालीसा में शुरुवात से लेकर अंत तक उनसे सिर्फ भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने की प्रार्थना की है इसीलिए इसका महत्त्व है की हनुमान जी को मन में गुरुपद पर आसीन करके जब हम उनकी स्तुति करते हैं तो हमारे सारे दोषों को वो हर कर हमें भक्ति के मार्ग पर प्रशस्त कर देते हैं |
दोहा:- श्रीगुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारि ।
बरनऊं रघुवर बिमल जसु जो दायक फल चारि ।।
अर्थ : श्रीगुरुजी महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं , जो चारों फल ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) देने वाला है ।
गूढार्थ : तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा का प्रारंभ गुरु वंदना से किया है । भारतीय संस्कृति में गुरु को बहुत अधिक महत्व दिया गया है । निर्जीव वस्तु को उपर फेंकने के लिए जिस तरह सजीव की जरुरत होती है, उसी प्रकार लगभग जीवन हीन और पुश तुल्य बने मानव को देवत्व की ओर ले जाने के लिए जिस तेजस्वी व्यक्ति की आवश्यकता रहती है, वह गुरु ही है । गुरु याने जो लघु नहीं है और लघु को गुरु बनाता है ।गुरु का अर्थ है वाह जिससे हम कुछ सीखते है या ज्ञान प्राप्त करते हैं | अज्ञान के अंधकार को दूर करने के लिए ज्ञान की ज्योति जलानेवाले गुरु होतें है । कहते हैं कि :
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: ।
गुरु: साक्षात् परब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नम: ।।
ब्रम्हा की तरह सद्गुणोंका सर्जक, विष्णु की तरह सद्वृत्ति के पालक और महादेव की तरह दुर्गूण और दुवृत्ति के संहारक और जीव-शिव का मिलन करानेवाले गुरु साक्षात् परब्रम्ह के समान हैं। ऐसे गुरु का पूजन भारतीय संस्कृति का सुमधुर काव्य है ।
गुरु अनेक प्रकार के होतें है, जैसे कि मार्गदर्शक गुरु, पृच्छक गुरु, दोष विसर्जक गुरु, चंदन गुरु, विचार गुरु, अनुग्रह गुरु, स्पर्श गुरु, वात्सल्य गुरु, कुर्मगुरु, चंद्रगुरु, दर्पण गुरु इत्यादि | प्रत्येक गुरु की अपनी अपनी विशिष्टता है ।
तुलसीदासजी के गुरु श्री नरहरि जी शिक्षा गुरु, तथा हनुमानजी मार्गदर्शक गुरु थे, जिनके मार्गदर्शन तथा कृपा से ही उन्हे भगवान श्रीराम के दर्शन प्राप्त हुए । जो सामान्य विद्या देता है वह गुरु ही है, परन्तु जो विद्याओंमें श्रेष्ठ विद्या, अध्यात्म विद्या देता है, वही सच्चा गुरु है ।
गुरु शिक्षक अथवा आचार्य नहीं है । शिक्षक तथा आचार्य कुछ विषय हमें समझाते हैं, परन्तु गुरु हमें ज्ञान के गर्भागार में ले जाते हैं । गुरु हमें जीवन के प्रांगण में ले जाते है । हिन्दी में एक कहावत है -
‘पीना पानी छानके और गुरु करना जानके’।
गुरु सोच समझकर ही बनाना चाहिए । संस्कृत में एक सुभाषित है ।
बहवो गुरुवो लोके शिष्य वित्तापहारका: ।
क्वचितु तत्र दृशन्ते शिष्यचित्तापहारका: ।।
जगतमें अनेक गुरु शिष्यका वित्त हरण करनेवाले होते हैं, परन्तु शिष्यका चित्त हरण करनेवाले गुरु क्वचित ही दिखायी देते हैं ।
‘गुरु’ शब्द का अर्थ क्या है ? ‘गु’ शब्द का अर्थ है ‘अंधकार’ और ‘रु’ शब्द का अर्थ है - निवर्तक - निकालनेवाला । अंधकार का जो निवारण करता है वह गुरु है ।
जीवन क्या है ? किसलिए है ? इस सम्बन्धमें सब के मन में अंधकार है । अंधकार में प्रकाश कौन देगा ? कोई कहेगा प्रकाश सूर्य देता है । सच बात है । सूर्य ही अंधकार का नाश करता है । वह अंधकार अलग है, परंतु जीवन के सम्बन्ध में जो अंधकार है वही ‘गु’ है । इस अंधकार को हटाकर जीवन का अर्थ समझानेवाला गुरु है । जीवन का लक्ष्य क्या है ? ‘भगवद्प्राप्ती हमारे जीवन का लक्ष्य है । अदृश्य के पास जाना है अदृश्य शक्ति पर प्रेम करना है तो जीवनमें मार्गदर्शक गुरु की आवश्यकता पडेगी ही । तुलसीदासजी को भगवान श्रीराम के दर्शन हनुमानजी की कृपा तथा मार्गदर्शन से ही प्राप्त हुए थे ।
अध्यात्म में गुरु की आवश्यकता होती है । क्योंकि गुरु तथा संतो के चरण रज की महिमा अनंत बतायी गयी है । गुरु तथा संतों की महत्ता, श्रेष्ठता से हम शुध्द होतें है, पवित्र होते हैं । इसीलिए हमारी संस्कृति में संतों के चरणरज की महिमा अनंत गायी गई है।
एक समय भक्त पुंडलिक अपने माता पिता को लेकर उत्तर भारत में तीर्थयात्रा के लिए गये । तीर्थयात्रा करते करते वे एक दिन कुकुट ऋषि के आश्रम पहुँचे । रात्रि के समय ब्रम्ह मुहूर्तमें चित्त एकाग्र करने पुंडलिक उठे । उस समय उन्होने देखा तीन कुरुप स्त्रियाँ आश्रम की ओर आ रही है । उन्होने सोंचा इस पवित्र जगह यह कुरुप स्त्रियाँ किसलिए आती होगी ? । पुंडलिक ने देखा तीनों स्त्रियोंने समूचा आश्रम झाडकर स्वच्छ किया और वे अतिशय सुंदर रुपवती बनकर चली गई । ऐसा रोज 2-3 दिन उन्होने देखा, तीसरे दिन वे स्त्रियाँ जब बाहर जाने लगी कि पुंडलिक ने भागते हुए उनके चरण पकड लिये तथा पूछा कि मातायें आप कौन है ? । मैं सतत तीन दिन से देख रहा हूँ आप तीनों कुरुप, मलिन ऐसी स्थितमें आती है और सुन्दर रुपवती बनकर जाती हैं । उन्होने कहा हम गंगा, यमुना और सरस्वती हैं । सब लोग स्वत: के पाप हममें धोतें है इसलिए हम काली, कुरुप और मलिन हो जाती हैं, इन पापों से आयी यह मलिनता हम कहाँ धोयें ? । कुकुट ऋषि के यहाँ नित्य हजारों लोगों को ऋषी महाराज भक्ति मार्ग समझाकर कर्मयोग की दीक्षा देते हैं । भगवान का काम करनेवाले, प्रेरणा देनेवाले कुकुट ऋषी के चरण-रज से इस आश्रम की धूलि पवित्र हो गयी है । हम जब झाडू लगाती हैं तो यह पवित्र रज कण हमारे शरीर पर पडते हैं जिससे हम सुंदर बन जाती है । ऐसी महत्ता है संतोंके चरण रज की ।
इसलिए तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा के प्रारंभ में गुरु के चरण रज से मन रुपी दर्पण को स्वच्छ करने की प्रार्थना की है ।
हमें यदि भगवान का बनना है तो प्रथम हमारे मन को स्वच्छ करना होगा इसलिए तुलसीदासजी ने लिखा है ‘निज मन मुकूरु सुधारि’ मानव जीवन में मन का असाधारण स्थान है । मन को शक्तिशाली, संस्कारी, संवेदनशील और प्रतिकार क्षम बनाना चाहिये । यह केवल स्वाध्याय से हो सकता है । मन प्रभुकी विभूति है, और मानव जीवन का परिवर्तन करनेवाला गुरु है । अत: मन को जितना उँचा ले जायेंगे उतना ही जीवन उच्च बनेगा। मन चाहे तो मनुष्य को भगवान भी बना सकता है और चाहें तो पशु बना सकता है। मनुष्य को कहीं भी ले जाने की शक्ति मन के पास है । मन और बुध्दि शरीर के वाहक हैं अत: उनको स्वाध्याय से शक्तिशाली बनाना चाहिये । जिस प्रकार घुडदौड की स्पर्धा में प्रशिक्षित घोडा प्रथम आता है और न सिखाया घोडा चाबुक मारने पर भी ठीक नहीं चलता, उसी प्रकार मन और बुध्दिको जितना सुसंस्कृत करेंगे, जीवन उतना ही उन्नत होगा ।
स्नान से शरीर स्वच्छ बनता है और प्रार्थना से मन । हमारे जीवनमें मन काफी महत्वपूर्ण है । जीवन की प्रत्येक क्रिया में मन आवश्यक है । गीतामें भी भगवान ने जीवात्मा से मन ही मांगा है । ‘‘मन्मना भव’’ या ‘‘मय्येव मन आधत्स्व’’ परन्तु हमारा मन तो मलिन और कलुषित है, काला बना हुआ है, ऐसे मन को भगवान को कैसे अर्पण करें इसीलिए ‘निज मन मुकुरु सुधारि’
जीवन विकास के लिए मन का शुध्दिकरण आवश्यक है। तथा भगवान को भी मन देना है तो उसको शुध्द स्वच्छ करके देना होगा । अस्वच्छ, काला कलूटा मन भगवान कैसे स्वीकार करेंगे? मन को स्वच्छ कैसे करेंगे ? मन का रंग कैसे बदला जा सकता है ? और यदि हमें कोयले का रंग बदलना हो तो हम कैसे बदलेंगे ? कोयले को साबून और पानी से धोयेंगे तो पानी और साबून दोनों ही समाप्त हो जायेंगे लेकिन कोयला कोयला ही रहेगा । कोयले का रंग नही बदलेगा । कोयले का रंग बदलने का एक ही रास्ता है कि उसे अग्नि में डाल दो, दो मिनट में उसका रंग बदल जाएगा, लाल हो जाएगा । इसी प्रकार हमारा मन जहाँ से हमें मिला है वहाँ याने परमात्मा में जोड देने से उसका रंग बदल जाएगा । स्वच्छ, निर्मल, तथा पवित्र बन जाएगा । इसीलिए तुलसीदासजी ने मन को स्वच्छ करने के लिए परमात्मा में मन को जोडने के लिये लिखा है, ‘निज मन मुकुरु सुधारि’ तथा भगवान के गुणोंका यशगान करने से मनुष्यको चारों फल की प्राप्ति होती है। चारों फल यानी चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) ।
हमारी भारतीय संस्कृति में चार पुरुषार्थ बताये गये है । चार पुरुषार्थ में प्रथम धर्म है, तथा अन्तमें मोक्ष है । अर्थात धर्म और मोक्ष के बीचमें जो अर्थ और काम का विवेकपूर्ण उपभोग करता है वही सबसे बडा बुध्दिमान है । तथा वही मानव जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । वही सफल जिज्ञासु है । इसके विपरीत जो दिन रात अर्थ एवं काम के पीछे दौड लगाते है, उनका धर्म एवं अंतिम मोक्ष का लक्ष्य भी निष्क्रिय हो जाता है, क्योंकि अर्थ और काम की ऐसी मार है कि आदमी जीवन भर उपभोग करते करते स्वयं को काल के हवाले कर देता है तथा सदा के लिये चौरासी के चक्कर में फंस जाता है ।
भगवान विष्णु को चतुर्भुज बताया गया है । विष्णु भगवान के चार हाथ है । एक-एक हाथ में एक-एक बात पुरुषार्थ देने के लिए है । धर्मको ही लेकर बैठेंगे तो आप भक्त नही है, उसी प्रकार केवल अर्थ का ही विचार करेंगे, सुबह से रात्रि तक पैसे का ही विचार, मंदिर में भी पैसे के लिए ही जाना, तो भी आप भक्त नही है । धर्म, अर्थ और काम सममेव सेव्य: । कितनी सुंदर व्यवस्था दी है हमारे धर्मशास्त्र ने तीनों के लिये समान समय देना चाहिये । और धर्म, अर्थ , काम का मुँह मोक्ष की ओर रखना चाहिये ।
धर्म शास्त्रों और ऋषियों ने धर्म, अर्थ, काम तथा प्रभुकार्य के लिए समय का समान निर्धारण किया है। अर्थात् दिन-रात के चौबीस घंटों में से प्रत्येक को छ घंटे देने चाहिए । यह मानव जीवन की आदर्श समय-सारिणी है ।
तुलसीदासजी कहते है कि पौरुष हमें भगवान से भेंट रुपमें मिलता है । ‘‘बरनऊं रघुवर बिमल जसु जो दायक फल चारि’’ यहॉँ गोस्वामीजी का लिखने का अभिप्राय यह है कि पौरुष हमें भगवान से मिली हुयी भेंट है, परन्तु हमने पौरुष का उपयोग किया है या नही उसका विचार करना पडेगा । प्रत्येक को उपभोग लेना है । उपभोग के साधन कमाने और संभालने के लिए पौरुष है । जगतमें कुछ भी मुफ्त में नही मिलता सब कमाना पडता है । किये बिना कुछ नहीं मिलता, बोने पर ही अनाज मिलता है, खोदनेपर ही पानी मिलता है अन्न तथा पानी के लिए भी कर्म करने पडते है। मनुष्य को पौरुष का उपयोग करना चाहिये।
जीवन विकास के लिए भी पौरुष चाहिए । मनुष्य को विचार करना चाहिए कि अपने पौरुष का एक दशांश भाग भी क्या मैने अपने विकास के लिए इस्तेमाल किया है ? लोगों के पास कितना पौरुष होता है ? क्या उसमे से थोडा भी उन्होने भगवद्कार्य के लिए उपयोग किया है ? भारतीय संस्कृति ने काम को भी पुरुषार्थ माना है। संस्कृतिमें तीन बातें आती है
1) जीवन प्रणाली (Way of Life)
२) विचार प्रणाली (Way of Thinking),
3) भक्ति प्रणाली (Way of Worship)
इन तीनो के संयोग से संस्कृति खडी होती है । भारतीय संस्कृतिमें बौध्दिक, भावनात्मक और लैंगिक इन तीनों स्तरपर विचार करके काम को पुरुषार्थ माना है । आज काम का अर्थ केवल शारीरिक सुख माना जाता है । बुध्दि, भावना और लिंग देह मिलकर वश: होता है । एक दुसरे के लिए परस्पर आकर्षण को वश: कहते हैं, उसे उन्नत करना चाहिए। भगवान ने स्त्री-पुरुष के बीच जो आकर्षण रखा है उसे भगवान तक ले जाना है । उसीको मधुराभक्ति कहते हैं । इससें पता चलता है कि ऋषि मुनियों ने इसका कितना विचार किया होगा तभी उसे पुरुषार्थ माना गया है । सहजीवन से तात्विक जीवन और आध्यात्मिक जीवन श्रेष्ठ बनते हैं ।
जीवन क्या है, कैसा है, मेरे पास कौन कौनसी बातें है और भगवान ने मुझे क्यों दी है ? इन्हे समझकर उपयोग मे लाना चाहिए, इसलिए आत्म निरीक्षण (Introspection) की जरुरत है । सभी ज्ञानेन्द्रिय, कामेंद्रियोंको पौरुष युक्त बनाना चाहिए । आज ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेंद्रिय भोग से पतित हो गयी है । उनमें से पौरुष चला गया है, किसी के मनमें बुध्दिमें, इन्द्रियोंमें तथा उपभोगमें भी पौरुष नही है । हमने पौरुष का उपयोग नही किया है । समर्थ शरीर तथा समर्थ मन बनाना जरुरी है इसीलिए आगे के दोहे में तुलसीदास जी हनुमानजी से बल, बुध्दि और विद्या प्रदान करने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं |
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